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वन्दे मातरम्

वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रगीत है। बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा संस्कृत बांग्ला मिश्रित भाषा में रचित इस गीत का प्रकाशन 1882 में उनके उपन्यास ‘आनंद मठ’ में अंतर्निहित गीत के रूप में हुआ। इस उपन्यास में यह गीत कुछ संन्यासीयों द्वारा गाया गया है। इसकी धुन
 
कहत कबीरा...सुन भई साधो
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वन्दे मातरम् ?

वन्दे मातरम् बंगला भाषा के प्रसिद्ध उपन्यासकार बंकिमचंद्र चटर्जी की उपन्यास 'आनंदमठ' मैं शामिल है। मूल रूप में यह उपन्यास इस्लाम शत्रुता पर आधारित है और उसमें अंग्रेज़ों को अपना सुरक्षक और मसीहा सिद्ध किया गया है। वन्दे मातरम् उपन्यास का एक भाग है।
 
safat alam taimi
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देश प्रेमी क्यों न गाएँ वन्दे मातरम् ? डा0 अनवर जमाल

राष्ट्रगीत के खि़लाफ जो फतवे जारी कर रहे हैं, वे देशद्रोही नहीं, बुद्धिद्रोही हैं’ यह कथन है कि वेद प्रताप वैदिक जी का (लेख- ''मुसलमान क्यों न गाएं वंदे मातरम्, हिन्दुस्तान, हिन्दी दैनिक-5 नवम्बर, 2009'' डा. अनवर जमालः eshvani@gmail.com लेखकः दयानन्‍
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माँ को इज्जत देनें मे अगर शर्म आती है तो कहीं डुब मरो

जी हाँ बिल्कुल सही सुना आपने। अगर ऐसा वाकया आपको देखने को मिले जहाँ कोई अपनी माँ को माँ कहने में शर्म महसुस करता हो और पुछने पर कहता हो ये बताने के लिए कि ये माँ है,माँ कहना जरुरी नहीं है। जरा सोचिए कितनी शर्मसार करने वाली घटना है। मेरा ये कहना उनके
 
Mithilesh dubey