“रचनाएँ रचवाती हो!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
रोज-रोज सपनों में आकर, छवि अपनी दिखलाती हो! शब्दों का भण्डार दिखाकर, रचनाएँ रचवाती हो!! कभी हँस पर, कभी मोर पर, जीवन के हर एक मोड़ पर, भटके राही का माता तुम, पथ प्रशस्त कर जाती हो! शब्दों का भण्डार दिखाकर, रचनाएँ रचवाती हो!! मैं हूँ मूढ़, निपट अज्ञानी,
May 27 2010 07:31 PM



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