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मेरा गम है मेरा हम सफर

मेरा गम है मेरा हम सफर, क्यों गम से मुझ को निजात होजब दोस्ती मुझे गम से है, तो खुशी से क्यों मुलाक़ात हो।मैंने जो भी चाहा न मिल सका, मुझे इस का कुछ न मलाल हैमेरे दिल में जब हसरत नहीं, क्यों ख्वाहिशों की बात हो।कोई रेशमी आँचल मिले, न लिखा था मेरे नसीब
 
गजेन्द्र बिष्ट
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" वजूद"

अब, कितना कठिन हो चला है.. कतरा-कतरा कर के पल बिताना. पल दो पल ऐसे हों , जब काम की खट-पट ना हो..इसके लिए हर पल खटते रहे.. बचपन की नैतिक-शिक्षा, जवानी की मजबूरी और अधेड़पन की जिम्मेदारियों से उपजी सक्रियता ने.. एक व्यक्तित्व तो दिया..पर... पल दो पल ठहरकर,
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
टैग: वजूद