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नन्ही इशिता से सीखिए वंदे मातरम...

आज कल के आधुनिक युग में जहाँ देशप्रेम महज एक शब्द बन रह गया है, वहीँ ये नन्ही पारी इशिता से हमें सीखना चाहिए, कुछ जो सो-काल्ड मोडर्न युवक, युवतियां हैं जिन्हें अपने देश का राष्ट्र गान, गीत पाता नहीं वो सीखें इस नन्ही सी प्यारी सी इशिता से...इशिता 
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२३ मार्च १९३१ !!!

२३ मार्च १९३१ रोजी भारतमातेसाठी आपल्या जीवाचं हसत हसत बलिदान देणार्‍या निधड्या छातीच्या तीन तडफदार वाघांना सहस्त्रकोटी प्रणाम !!जय हिंद ! वंदे मातरम ! भारतमाता की जय !
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मुस्लिम धोखेबाज़ होते हैं--वंदे मातरम !!!

मैंने हिंदुस्तान के दर्द (blog) पर देखा एक जनाब अपने दर्द का इज़हार कर रहे थे, एक नहीं दो नहीं अनेक पोस्ट एक साथ करके यानि जैसे जैसे दर्द उठा उन्होंने बयां कर दिया, दर्द होना भी चाहिए लेकिन उनका एक दर्द बड़ा ही ख़तरनाक उठा जिस पर मुझे यहाँ अपनी बात र
 
स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़
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लघुकथा वन्देमातरम आचार्य संजीव 'सलिल'

लघुकथा वन्दे मातरम -'मुसलमानों को 'वन्दे मातरम' नहीं गाना चाहिए, वज़ह यह है की इस्लाम का बुनियादी अकीदा 'तौहीद' है। मुसलमान खुदा के अलावा और किसी की इबादत नहीं कर सकता।' -मौलाना तकरीर फरमा रहे थे। 'अल्लाह एक है, वही सबको पैदा करता है। यह तो हिंदू भी
 
दिव्य नर्मदा