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सफ़र ही मंज़िल है

लौट आया…वैसे बुद्धु हो या होशियार लौट के घर तो आता ही है। क्या जगह है सिक्किम! इतनी प्यारी, इतनी आत्मीय,इतनी ख़ूबसूरत। ख़ुद को ही आदर्श मानने वाले हम कितना कुछ सीख सकते हैं उनसे। सबसे पहले तो यही कि ज़मीन कब्ज़ा करने से दिल कब्ज़ा नही होते। समझ ही नही आय
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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तैयारी एक लम्बी यात्रा की !

हर यात्रा में शामिल है लौटना अपने-अपने तरीके से लौटता है कोई रोज़ द़फ़्तर से पीठ पर लादे अपमानो की गठरी और पोस्टडेटेड चेक़ों में क़तरा-क़तरा बिकी सुरक्षा ओढ़कर सो जाता हैं स्वप्नहीन नींद में । कोई लौटता है प्यार की भरपूर तलाश के बाद गले में बांधे शर्तों का
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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