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पं.डी.के.शर्मा "वत्स" उर्फ ‘बनवारी लाल’ -तुमको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ?

  आदरणीय पंडित जी,प्रणाम अभी कुछ घंटे पहले ही फोन पर आपसे सोहाद्रपूर्ण तरीके से बतियाने के बाद आपकी ये ताज़ी पोस्ट   बुद्धिमानों का सम्मेलन और बनवारी लाल जी की मन की पीडा   अनायास ही पढ़ने को मिली …जान कर अच्छा लगा कि आप तो पूरे
 
राजीव तनेजा
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नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे वाले जोधपुर के सक्रिय ब्लॉगर श्री हरी शर्मा जी से माईक्रो मुलाकात …

  नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे वाले जोधपुर के सक्रिय  ब्लॉगर श्री हरी शर्मा जी से माईक्रो मुलाकात …माईक्रो इसलिए कि आने से ज्यादा उन्हें वापिस जाने की जल्दी थी ..वो कब आए?…और कब वापिस चले गए?…पता भी ना चला…अब इसे समयाभाव कहें या फिर द्वारका में किसी
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आयम स्टिल वेटिंग फॉर यू, शची (लघु उपन्यास) -- 12

अभिषेक, किताबों में डूबने की पुरजोर कोशिश करता पर कहाँ मिल पाती कामयाबी? मन भटकता रहता और वह किताबें छोड़ कोई रेकॉर्ड  लगाने लगता. दो मिनट भी  नहीं सुनता कि खीझ होने लगती. सोचता छत पर टहलना ठीक रहेगा. पर वहाँ मन इतना बेचैन और परेशान हो जाता कि
 
rashmi ravija
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अवतार और लेखक

हिंदी भाषा का दुर्भाग्य है कि इसमें सभी भावों के लिए प्रथक शब्दों का विकास नहीं किया गया है, जबकि भाषा के आदि पुरुषों ने वैदिक संस्कृत में शब्द विकास के अभूतपूर्व प्रयास किये थे. आधुनिक संस्कृत में वैदिक शब्दों के अर्थ विकृत किये जाने और हिंदी विकास का
 
देवसूफी राम कु० बंसल
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गगन गिल

एक अनवरत आत्मालाप का कवि : हरिभजन सिंह कवि हरिभजन सिंह की कविताएं
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सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' अधुनिक हिन्दी साहित्य के महान महान स्तन्भ थे। वे एक कवि, उपन्यासकार, निबन्धकार और कहानीकार थे। उन्होंने कई रेखाचित्र भी बनाये। उनके जीवन काल में उनकी प्रतिभा को पहचाना नहीं गया। उनके क्रान्तिकारी और स्वच्छन्द लेखन के कारण
 
सारिका सक्सेना
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यह कौन-सी नई पॉलिटिकल इकोनॉमी है कॉमरेड...?

विश्वस्त कहे और समझे जा सकने वाले सूत्रों से पता चला कि कुमार मुकुल जसम यानी जन संस्कृति मंच ज्वायन कर चुके हैं। पुष्टि के लिए कुमार मुकुल को फोन लगाया। उन्होंने हामी भरी। इस पर मेरी अत्यंत सहज-स्वाभाविक (जिसे बिना सोचे बोलना कहा जा सकता है) प्रतिक्रिया
 
राजू रंजन
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"हट ज्या…सुसरी…पाच्छे ने"

हट ज्या…सुसरी…पाच्छे  ने” ***राजीव तनेजा***                       “बधाई हो”…. “किस बात की?”…
 
राजीव् तनेजा
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जयशंकर प्रसाद

जिस समय खङी बोली और आधुनिक हिन्दी साहित्य किशोरावस्था में पदार्पण कर रहे थे; काशी के 'सुंघनी साहू' के प्रसिद्व घराने में श्री जयशंकर प्रसाद का जन्म ३० जनवरी १८९० (संवत१९४६) में हुआ। व्यापार में कुशल और साहित्य सेवी , अपके पिता श्री देवी प्रसाद पर लक्
 
सारिका सक्सेना
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प्रेमचंद

आधुनिक हिन्दी और उर्दू कथा साहित्य के पथ प्रदर्शक, मुंशी प्रेमचन्द का असली नाम धनपत राय था। उनका जन्म ३१ जुलाई १८८० को वाराणासी के निकट एक गांव लमही में हुआ था।उनके पिता मुंशी अजायबलाल डाक घर में अत्यन्त मामूली वेतन पाने वाले एक कर्मचारी थे। आठ वर्ष
 
सारिका सक्सेना
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जवाहर सिंह

जन्म : छपरा (बिहार) के एक गा विष्णु पुरा- जलाल पुर बाजार में। शिक्षा : एम.ए., पी.एह.डी. । हिन्दी के आधुनिक कथा लेखन में एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर। आज के बदले हुये ग्रामीण यथार्त और मध्यवर्गीय जीवन की त्रासद विसंगतियों की परख और पकङ के लिय अपने समकालीन
 
सारिका सक्सेना
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श्री शरद आलोक

श्री शरद आलोक जी का वास्तविक नाम सुरेश चन्द्र शुक्ल है। वे गत २१ वर्षों से नार्वे में हिन्दी की पत्रिकाओं 'परिचय' और 'स्पाइल' का संपादन कर रहे हैं।वे हिन्दी के सुपरिचित कवि, लेखक, और पत्र कार हैं। डा. शुक्ल अनेक भाषाओं में लिखते रहे हैं। हिन्दी में आ
 
सारिका सक्सेना
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और अंत में प्रार्थना" (जिसके नाट्य रूपांतर के मंचन पर कई शहरों में सांप्रदायिक तत्वों ने हमले किए) लिखने वाले मेरे प्रिय कथाकार (आज शाम तक)एवं कबाड़ी उदय प्रकाश ने पांच जुलाई को गोरखपुर में गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी, भाजपा सांसद योगी आदित्य नाथ के हा
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मेरा खुला पत्र योगेश समदर्शी के नाम

समदर्शी जी नमस्कार…. ये खुला पत्र मैँ आपको इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि मेरे पास लिफाफा खरीदने के लिए खुले पैसे नहीं हैँ। एक्चुअली क्या है कि मेरे पास लिफाफे को बन्द करने लायक ज़रूरी गोंद नहीं थी तो मैँने सोचा कि…….अब आप कहेंगे कि गोंद
 
राजीव् तनेजा
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चारोळ्या

बरेच दिवस झाले, येथे काही लिहीले नाही. कारण साधं-सोपं अाहे, पण थोडं विचित्र. मॅक घेतल्या पासुन मराठीत लिहीणं अवघड झाले अाहे. एका ब्रौझर मध्ये अक्षरं व्यवस्थीत दिसत नाहीत, तर दुसऱ्यात व्यवस्थीत लिहीता येत नाहीत. वर आणि स्पेलचेक नाही. बोंबला! ह्या चार ओळी