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भाषा प्रवाह मतलब “मन का रेडियो बजने दे ज़रा!”

वैचारिक प्रवाह लहर है उसकी अपनी गतिक ऊर्जा है जिसमे बहना होता है! फ़िर जब शब्दों और भावों का कनेक्शन जुड जाता है – अभिव्यक्ति का बल्ब का जल जाता है. फ़िर उसमे आप बाकी तानें-मुरकियां (रस/उपमाएं/अलंकार) मिला सकते हैं. मैने भी की हैं कुछ कोशिशें.
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सचिन!

अगस्त २००८ में सचिन एक दिवसीय बल्लेबाजों की सूची में नीचे खिसकते-खिसकते २३वें क्रमांक तक जा पहुंचे थे. तब उनके लगातार गिरते प्रदर्शन के चलते मैने हताश और निराश ही हो कर एक लेख लिखा था “सचिन तेंडुलकर, अब बस कर!” जिसमें कहा था की लगातार खराब प्रदर्शन स
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‘ओबामा को शान्ति नोबल’ अमरीकी नेतृत्व का छवि प्रबंधन?

आज ओबामा की आस्तीन पर नोबल शान्ति पुरुस्कार का बिल्ला चमकाना एक कूटनीति जरूरत है अन्यथा इनके बढाए हाथों से कोई मरहम तो क्या जहर ना ले!
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गांधी के इफ़ेक्ट्स और साईड-इफ़ेक्ट्स

ओबामा और गूगल को आज गांधी याद आए हैं – वही गूगल जो हिन्दी में टेक्स्ट एड व्यवसाय नही करता! वही ओबामा जो लगतार पाकिस्तान को सामरिक मदद देते आ रहे हैं. ये है गांधी की सही-सही प्रासंगिकता!