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“नारी-दिवस पर जूती पुत्रों को सलाम” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

प्रश्न- क्या महिला पाँव की जूती है? उत्तर- जी हाँ! प्रश्न- और पुरुष? उत्तर- ……  प्रश्नकर्ता- मैं बताऊँ? उत्तरदाता- बताइए! जूती पुत्र- प्रश्नकर्ता ने उत्तर दिया!
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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गाथा दाढी-मिश्यांची (माझ्या)

मला दाढी-मिशी खुप वर्षांपासुन वाढवायची होती. म्हणजे बघा, मला चेहर्‍यावर एकही केस नव्हता तेंव्हापासुन. आमचे आजोबा जुन्या पद्धतीने अंगणात सकाळी उन्हात आरसा समोर ठेउन दाढी करत असत. त्यांच्या दाढी करण्याला एक वेगळीच नजाकत होती. आधी सगळी तयारी करायची मग चहा
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लघु-कथा (एक बहिन ऐसी भी) डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

मैं उस समय ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ता था। जीवविज्ञान विषय की क्लास में मेरे साथ कुछ लड़कियाँ भी पढ़तीं थीं। परन्तु मैं बेहद शर्मीला था। इसी लिए कक्षाध्यापक ने मेरी सीट लड़कियों की बिल्कुल बगल में निश्चित कर दी थी। कक्षा में सिर्फ एक ही लड़का मेरा दोस्त था।
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘हमने चाचा की चाची देख ली।’’ (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

कल ही की तो बात है। मेरे छोटे पुत्र के लिए एक सज्जन अपनी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव लेकर आये। मैंने उनसे पूछा- ‘‘अपनी बिटिया का फोटो और बायोडाटा तो लाये होंगे।’’ उन्होंने कहा- ‘‘ जी सर! आपके यहाँ नेट हो तो अभी दिखा देता हूँ।’’ मैं उन्हे अपने पी.सी.
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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घर

मी आणि बाबा अमरावतीहुन येत होतो. अमरावतीला माझी आत्या रहात असे. बाबांची सगळ्यात मोठी बहिण. अमरावतीचा रस्ता फारच दळिद्री होता. बर्‍याच वर्षात रस्त्याची डागडुजी झाली नव्हती. त्यामुळे साधारण चार तासाच्या प्रवासाला सहा तास आरामात लागत असत. आम्ही सकाळची बस