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निवारण/बलराम अग्रवाल

राजनीतिक-गर्दिश का दौर था। संकट-निवारण के उद्देश्य से पिता ने हवन का आयोजन किया। उसमें अपने कुल-देवता की प्रतिमा को उसने हवन-स्थल पर स्थापित किया। और, प्रतिमा के एकदम बाईं ओर उसके बेटों ने एक विचित्र-सा मॉडल लाकर रख दिया। “यह क्या है?” पिता ने पूछा।
 
बलराम अग्रवाल
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एक वोट की मौत

नगरपालिका के लिए मतदान हो रहा था। धूप बहुत तेज थी। मतदान-केंद्र के बाहर मतदाताओं की लंबी कतार लगी थी। शोर मच रहा था। धक्कम-धक्का चल रहा था। दो-तीन लोग तो गरमी सहन न कर सकने के कारण बेहोश होकर गिर चुके थे। दो उम्मीदवारों के बीच बहुत सख्त मुकाबला था। ऐसे
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माँ नहीं जानती फ्रायड/बलराम अग्रवाल

“माँ…ऽ…!” जैसे कुछ देखा ही न हो वैसे पुकारते हुए वह माँ के कमरे की ओर बढ़ा, ताकि उसके पहुँचने तक माँ सँभलकर बैठ जाए। लेकिन माँ ज्यों की त्यों बैठी रही। “श्श्श्श्श…!” अपने होठों पर तर्जनी को खड़ी करने के बाद उसने हथेली के इशारे से उसे आवाज को धीमी रखने का
 
बलराम अग्रवाल
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14. औरत के विरोध

लघुकथाकार - डॉ॰ राज नारायण, 227/II, पंडितवाड़ी, देहरादून'दीदी ! ई का करइत ह ? बड़का गो बढ़ियाँ फोटो हइ । ओकरा जरावइत हहूँ ?' - पड़ोसिन के बाइस साल के बेटी कमला चउखट पार करके घर में घुँसइते पुछलक ।'बुन्नी, रख के का करवई ?' माथा पर घाव के दाग आउ चेहरा उदासी
 
नारायण प्रसाद
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सुंदरता/बलराम अग्रवाल

लड़की ने काफी कोशिश की लड़के की नजरों को नजर-अन्दाज करने की। कभी वह दाएँ देखने लगती, कभी बाएँ। लेकिन जैसे ही उसकी नजर सामने पड़ती, लड़के को अपनी ओर घूरता पाती। उसे गुस्सा आने लगा। पार्क में और भी स्टुडैंट्स थे। कुछ ग्रुप्स में तो कुछ अकेले। सब के सब आपस की
 
बलराम अग्रवाल
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13. अनपढ़ के अनुवाद

लघुकथाकार - अरुण कुमार सिन्हाहाकिम अप्पन चपरासी से बोललन - 'भीखू, अभी बहिरसिये जाके बइठऽ ।'भीखू पूछलक - 'की बात हे, हुजूर ?'हाकिम बतइलका - 'राम बाबू अभिये आवे वला हथ । हुनखे से हमरा 'कनफिडेंशियल' बात करे के हे ।'भीखू जब बहिरसी इकसल त कलुआ चपरासी टोक देलक
 
नारायण प्रसाद
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जानवर/बलराम अग्रवाल

लॉन में बैठे वे आसमान को ताक रहे थे। इस हालत में उनसे कुछ अर्ज़ करने की जुर्रत ननुआ नहीं कर सकता था। ध्यान भंग करने से उस पर वे पूरी तरह झल्ला पड़ते। अनजाने ही ऐसा करके उनकी झल्लाहट को वह कई बार झेल चुका था। उसका दुखी मन इस समय वह सब झेलने की हालत में नहीं
 
बलराम अग्रवाल
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युद्धखोर मुर्दे/बलराम अग्रवाल

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बलराम अग्रवाल
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वापसी

“अपने काम से थोड़ा समय निकाल कर, घर पर ज़रूर होकर आना। मम्मी का हालचाल पूछना और अगर रात रुकना ही पड़े तो घर पर ही ठहरना।” पत्नी ने सफर के लिए तैयार होते पति से कहा।“कोशिश करुंगा,” कहते हुए वह मन ही मन हँस रहा था कि पगली तेरे मायके तेरी छोटी बहन सुमन से
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मुलाकातें/बलराम अग्रवाल

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बलराम अग्रवाल
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मां का कमरा

छोटे-से पुश्तैनी मकान में रह रही बुज़ुर्ग बसंती को दूर शहर में रहते बेटे का पत्र मिला- ‘मां, मेरी तरक्की हो गई है। कंपनी की ओर से मुझे बहुत बड़ी कोठी मिली है, रहने को। अब तो तुम्हें मेरे पास शहर में आकर रहना ही होगा। यहां तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी।
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संतू

प्रोढ़ उम्र का सीधा-सा संतू बेनाप बूट डाले पानी की बालटी उठा जब सीढ़ियां चढ़ने लगा तो मैने उसे सचेत किया, “ध्यान से चढ़ना! सीढ़ियों में कई जगह से ईंटें निकली हुई हैं। गिर न पड़ना।” “चिंता न करो, जी! मैं तो पचास किलो आटे की बोरी उठाकर सीढ़ियां चढ़ते ह
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तीस वर्ष बाद

आज फिर सुखविंदर की माँ का फोन आया था।” पत्नी ने बताया तो नरेश व्याकुल हो उठा, “तीसरे दिन ही फोन आ जाता है किसी न किसी का। दिमाग खराब कर रखा है।” सुखविंदर इंजनियरिंग कालेज में उनकी बेटी बबली का सहपाठी रहा था। दोनों एक-दूसरे को चाहते थे। न लड़का कहीं औ
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यादगार

विरसा सिंह बस से उतर, गाँव वाली सड़क पर पहुँच कर रुक गया। विलायत से आने के पश्चात, वह अपने मामा के लड़के से मिल कर आ रहा था। उस गाँव के बाहर बने बहुत बड़े एवं सुंदर गेट को देख कर उसने सोचा कि वह भी अपनी माँ की स्मृति में अपने गाँव के बाहर एक वैसा ही
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वापसी-1

पत्नी के त्रिया हठ के आगे मेरी एक न चली। अपने खोये हुए सोने के झुमके के बारे पूछने के लिए, उसने मुझे ‘डेरे वाले बाबा’ के पास जाने को बाध्य कर दिया। पत्नी का झुमका पिछले सप्ताह छोटे भाई की शादी के अवसर पर घर में ही कहीं खो गया था। बहुत तलाश करने पर भी
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अनमोल ख़ज़ाना

अपनी अलमारी के लॉकर में रखी कोई वस्तु जब पत्नी को न मिलती तो वह लॉकर का सारा सामान बाहर निकाल लेती। इस सामान में एक छोटी-सी चाँदी की डिबिया भी होती। सुंदर तथा कलात्मक डिबिया। इस डिबिया को वह बहुत सावधानी से रखती। उसने डिबिया को छोटा-सा ताला भी लगा रख
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एक उज्जवल लड़की

रंजना, उसकी प्रेयसी, उसकी मंगेतर दो दिन बाद आई थी। आते ही वह कुर्सी पर सिर झुका कर बैठ गई। इस तरह चुप-चाप बैठना उसके स्वभाव के विपरीत था। “क्या बात है मेरी सरकार! कोई नाराजगी है?” कहते हुए गौतम ने थोड़ा झुक कर उसका चेहरा देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। ऐ
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गोभोजन कथा

याद आया, ” गऊशाला से भी निराश निकलते इन्दर ने पत्नी को बताया, “ अपना बशीर था न…वही, जो हाल के दंगों में मारा गया। उसकी गाय शायद गर्भिणी है। ” “ छि:! ” “ कमाल करती हो! ” इन्दर तमतमा गया, “ बशीर के खूँटे से बँधकर गाय, गाय नहीं रही, बकरी हो गयी? याद है,
 
बलराम अग्रवाल
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अलाव के इर्द-गिर्द

ट खनों तक खेत में धँसे मिसरी ने सीधे खड़े होकर पानी से भरे अपने पूरे खेत पर निगाह डाली। नलकूप की नाली में बहते पानी में उसने हाथ-पाँव और फावड़े को धोया और श्यामा के बाद अपना खेत सींचने के इन्तजार में अलाव ताप रहे बदरू के पास जा बैठा। “ बोल भाई मिसरी, क
 
बलराम अग्रवाल
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बिना नाल का घोड़ा

उसने देखा कि आफ़िस के लिए तैयार होते - होते वह चारों हाथ - पैरों पर चलने लगा है । तैयार होने के बाद वह घर से बाहर निकला । जैसे ही सड़क पर पहुँचा , घोड़े में तब्दील हो गया । अपने जैसे ही साधारण कद और काठी वाले चमकदार काले घोड़े में । माँ , पिता , पत्नी और
 
बलराम अग्रवाल
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अकेला कब तक लड़ेगा जटायु

ल गभग चौथे स्टे शन तक कम्पार्टमेंट से सभी यात्री उतर गये। रह गया मैं और बढ़ती जा रही ठंड के कारण रह-रह क़ र सि हरती , सहमी आँखों वाली वह लड़की। कम्पार्टमेंट में अनायास उपजे इस एकांत ने अनेक कल्पनाएँ मेरे म न में भर दीं — काश! पत्नी इन दिनों मायके में र
 
बलराम अग्रवाल
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अज्ञात गमन

चौ राहे के घंटाघ र से दो बजने की आवाज़ घनघनाती है। बंद कोठरी में लिहाफ के बीच लिपटे दिवाकर आँखें खोलकर जै से अँधेरे में ही सब - कुछ देख लेना चाहते हैं — दो जवान बेटों में से एक , बड़ा , अपनी शादी के तुरंत बाद ही बहू को लेकर नौकरी पर चला गया था। राजी -
 
बलराम अग्रवाल
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ज़हर की जड़ें

द फ्तर से लौटकर मैं अभी खाना खाने के लिए बैठा ही था कि डॉली ने रोना शुरू कर दिया। “ अरे-अरे-अरे, किसने मारा हमारी बेटी को? ” उसे दुलारते हुए मैंने पूछा। “ डैडी, हमें स्कूटर चाहिए। ” सुबकते हुए ही वह बोली। “ लेकिन तुम्हारे पास तो पहले ही बहुत खिलौने ह
 
बलराम अग्रवाल
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कंधे पर बेताल

गा रा - मजदूरी करके थोड़ी - बहुत कमाई के बाद शाम को रूपलाल घर की ओर लौट रहा था। अपनी ही धुन में मस्त। बीड़ी सुट्याता हुआ। रास्ते में , एक झाड़ी के पीछे से कूदकर एक लुटेरा अचानक उसके सामने आ खड़ा हुआ। रूपलाल अचकचा गया। लुटेरे ने उसको सँभलने का मौका नहीं द
 
बलराम अग्रवाल
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एल्बो

बच्ची चीजों को ठीक-से अभी समझने लायक बड़ी नहीं हुई थी। बोलने में भी तुतलाहट थी। लेकिन भाभी ने अभी से उस पर मेहनत करना शुरू कर दिया था। वे शायद जता देना चाहती थीं कि न तो वह साधारण माँ हैं और न ही रेखा साधारण बच्ची। अपने इस प्रोजेक्ट पर उन्होंने कितने
 
बलराम अग्रवाल
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यही होना है आखिरकार

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बलराम अग्रवाल
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सरकारी अमला

आरोप है कि तुमने सरकारी अमले पर हमला किया और उसके काम में बाधा डाली। ” फाइल के पन्नों को पलटते हुए मजिस्ट्रेट ने मुलजिम से कहा। “ वे लोग मेरे मकान पर बुलडोजर चला रहे थे जनाब...! ” “ लेकिन उनका कहना है कि उनके पास मकान नम्बर डी-फाइव को तोड़्ने का सरकार
 
बलराम अग्रवाल
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एक और देवदास

सु नो मिस्टर! ” कंधे पर खादी का थैला लटकाए घूमते चश्माधारी महाशय को उस नवयुवती ने अपनी ओर आने का इ शारा किया। “ जी। ” पास आक र वह बोले। “ मुझे ताकते हुए मेरे आसपास मँडराते रहने का तुम्हारा मक़सद क्या है ? ” “ जी, कुछ खास नहीं। आपके बारे में सोचते रहना
 
बलराम अग्रवाल
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कसमसाहट

हूँ … ऽ… ! ” चरणों में चढ़ाए गए पचास रुपए के नोट को कुर्ते की जेब के हवाले करते पंडितजी के गले से आवाज निकली। पूछा, “ कितने बजे के करीब हुआ? ” “ बजे तो ठीक-ठीक नहीं मालूम… ” पहली बार पिता ब ने का ले -धूसर नौजवान ने उनसे यथेष्ट दूरी पर उकड़ू बैठते हुए ब
 
बलराम अग्रवाल
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कुंडली

बि टिया का बायो - डाटा और फोटो उसके पिता ने लड़के की माँ के हाथ में थमा दिया। फोटो को अपने पास रोककर बायो - डाटा उसने पति की ओर बढ़ा दिया। पति ने सरसरी तौर पर उसको पढ़ा और कन्या के पिता से पूछा _ “ कुंडली लाए हैं ?” “ हाँ जी , वह तो मैं हर समय ही अपने स
 
बलराम अग्रवाल
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गाँव एक गहरा घड़ा है

य ह कौन- सा चारा है, सर? ” ट्रक से गिराई जा रही पत्थर की रोड़ी की ओर इशारा करके चमचे ने सांसद महोदय से पूछा। “ चारा नहीं, ये कंकड़ है गिरधर। ” नेताजी ने मुस्कराकर जवाब दिया, “ यहाँ से गाँव तक सड़क बनवा देने का वादा…। ” “ सो तो मैं देख ही रहा हूँ, सर। ”
 
बलराम अग्रवाल
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दु:ख के दिन

बा की बची माँ — सो चार-चार महीना वह बारी-बारी से सबके साथ रह लेगी। ” सम्पत्ति के मौखिक बँटवारे के बाद बड़े ने माँ के प्रति तीनों भाइयों की जिम्मेदारी तय करते हुए सुझाया। “ यह तो माँ को अलग-अलग खूँटों से बाँधनेवाली बात हुई! ” मँझले ने टोका , “ तर्क के
 
बलराम अग्रवाल
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सेक्यूलर

गाँव में पता नहीं किस बात पर दो परिवारों में लाठियाँ चल गयीं। खूब सिर फूटे , हड्डियाँ टूटीं। औरतों के कपड़े फटे और...। पुलिस पहुँची। कुछ को अस्पताल में डाल आई , कुछ को हवालात में डाल दिया। दोनों ओर के बचे-खुचे लोग अपने-अपने आकाओं की ओर दौड़े। एक ने ‘ इ
 
बलराम अग्रवाल
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गिरावट

राज-मिस्त्री ठीक आठ बजे पहुँच गया था। मजदूर, एक वह खुद था और दूसरी उसकी बीवी। शाम तक दो तरफ की दीवारें करीब आधी-आधी खड़ी हो चुकी थीं। तभी, एक ट्रक उसके प्लॉट के आगे आ रुका। उसमें से, गरदन में रामनामी दुपट्टा डाले पच्चीस-तीस नौजवान धड़ाधड़ नीचे आ कूदे। “
 
बलराम अग्रवाल
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देश का सिपाही

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बलराम अग्रवाल
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महाप्रलय में औरत

ऊपर, लरजते-गरजते, पानी बरसाते और बिजलियाँ गिराते काले-कलूटे बादलों के झुण्ड थे। नीचे, चारों ओर पानी ही पानी था , लेकिन न पीने लायक । फलों से लदे पेड़ थे , लेकिन प्रलय के पानी में शीर्षासन करते…अँधेरे आसमान से मदद की उम्मीद में जड़ें ऊपर उठाए , बहे जाते
 
बलराम अग्रवाल
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ਮੁਖੌਟੇ

। ਇੱਥੋਂ ਤਕ ਕਿ ਦੋਹਾਂ ਨੇ ਇਕ ਦੂਜੇ ਦੀ ਸ਼ਕਲ ਤਕ ਨਾ ਵੇਖਣ ਦੀ ਸਹੁੰ ਖਾਈ ਹੋਈ ਸੀ। ਰਿਸ਼ਤੇਦਾਰਾਂ, ਮਿੱਤਰਾਂ ਤੇ ਜਾਣਕਾਰਾਂ ਦੀਆਂ   ਉਹਨਾਂ ਵਿਚ ਮੇਲਜੋਲ ਕਰਾਉਣ ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ਾਂ ਅਸਫਲ ਰਹੀਆਂ। ਵੱਡਾ ਭਰਾ ਗੰਭੀਰ ਬੀਮਾਰੀ ਕਾਰਨ ਹਸਪਤਾਲ ਵਿਚ ਭਰਤੀ ਰਿਹਾ। ਤਦ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਸਮਝਾਉਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਵੀ ਛ
 
सहज साहित्य
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दिल्ली वाले

भ ले ही उसने ‘ शराब न पी रखी हो, लेकिन हाव-भाव से वह नशे में ही नजर आ रहा था। आँखें बाहर को उबली पड़ रही थीं। चेहरे पर तनाव था और शरीर में कम्पन। सभा-भवन में घुसते ही वह चिल्लाया —“ ओए…,तुम में दिल्ली से आया हुआ कौन-कौन है? ” हालाँकि वह खाली हाथ था। न
 
बलराम अग्रवाल
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12. जरल पर नीमक

लघुकथाकार - डॉ॰ सी॰ रा॰ प्रसाद स्कूटर पर सवार एगो पति-पत्नी जाइत हलन । पीछे से एगो कार वाला रगड़ते पार हो गेल । दुन्नो फेंका गेलन । स्कूटर डैमेज हो गेल । पति के ठेहुना फूटल, शर्ट-पैंट रगड़ा के फट गेल । पत्नी के सलवार-समीज फट गेल । कमर-पीठ में चोट लगल
 
नारायण प्रसाद
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11. फर्ज

लघुकथाकार - हरीन्द्र विद्यार्थी पटना टीसन पर अन्हेरा गहराय लगल हल । अइसे तो टीसन पर अनदिनो अँटान न रहे, बाकि एक जगह कुछ जादे भीड़ देख के चन्दू ठुमक गेल। दूगो वर्दीधारी पुलिस के खड़ा देख के ओकर उत्सुकता आउ बढ़ गेल । बीच में एगो गोर सुन्नर महिला आउ बगल
 
नारायण प्रसाद