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घर और महानगर

घर (१.) शाम ढलते ही पंछी लौटते हैं अपने नीड़ लोग अपने घरों को, बसों और ट्रेनों में बढ़ जाती है भीड़ पर वो क्या करें ? जिनके घर हर साल ही बसते-उजड़ते हैं, यमुना की बाढ़ के साथ. (२.) चाह है एक छोटे से घर की जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो, ताकि हवाएँ
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घर-बाज़ार

घर में देर-सबेर भी जब पहुँचेंगे आप हर चेहरे पर पाएँगे अपनेपन की छाप । अपनेपन की छाप मगर बाज़ार अलग है । मोल-भाव या हानि-लाभ व्यापार अलग है । कहँ दधीचि क्या यह सुधार है जीवन-स्तर में ? संभलो, अब बाज़ार घुसा आता है घर में !
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सोचो

सोचो, सही-ग़लत को ले कर नोक कलम की पैनी क्यों है ? बाज़ अगर है बेकुसूर, तो चिड़ियों में बेचैनी क्यों है ?
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छोड़ो छोड़ो

खानपान पहनावा लहजा चाल-चलन 'ग्लोबल' हों; पिछड़ेपन का दामन छोड़ो । प्रेमचंद टैगोर भारती औ' ग़ालिब इनको भूलो, तुलसी औ' कम्बन छोड़ो । यानी ज़िन्दा रहने को बेशक रह लो -- लेकिन साँसें दिलो-जिगर धड़कन छोड़ो ।
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विष्णु जी के लिए...

कलाकार के संघर्षों के साक्षी, तुमने - अमर मसीहा आवारा की कथा कही है। गहन विचारों के शिल्पी अप्रतिम अनूठे, नहीं रहे तुम; 'धरती अब भी घूम रही है' !
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नारी है या....?

चकाचौंध विज्ञापन की साबुन-क्रीम प्रसाधन की देखी, तो 'दधीचि' बोले-- "कोई तो रहस्य खोले, सदा स्नान-रत आधुनिका नारी है या सिर्फ़ त्वचा ?"
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खिलते हैं फूल

फागुनी हवाओं की जो रुनझुन धुन सुनी खिलते हैं फूल , भँवरे भी मंडराते हैं । अब के बरस भँवरे तो परे जा रहे हैं रूठते हैं और फूल उनको मनाते हैं । चुन - चुन बुनते हैं मीठे - मीठे सपने - से उनके कानों में गीत नए - नए गाते हैं -- " अच्छा है शगुन , सुन , गुन