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अग्नि कोण के रोड़

अग्नि कोण के रोड़अग्नि कोण के रोड़ में, घटे बैंक बेलेन्स ।घट-घट प्राणेश्वर घटे, वाईफ नाॅनसेन्स ।।वाईफ नाॅनसेन्स, फाइनल डिसिजन देवे ।पति की हो प्रजेन्स, कन्सल्ट कभी न लेवे ।।कह ’वाणी’ कविराज, रहे श्रीमानजी मौन ।लेय पत्नी क्रेडिट, रोड़ हो अग्नि कोण ।।
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पूरब-पश्चिम रोड़

पूरब-पश्चिम रोड़ पूरब-पश्चिम रोड़ हो , हो मर्दों की बात । प्राणेश्वरियाँ प्राण दे, रखे आपकी बात ।। रखे आपकी बात, बढ़े बुजुर्गों का मान । खा मालपुआ खीर , वे दिन-भर चबाय पान ।। कह ’वाणी’ कविराज, जरा करले जोड़-तोड़ । नाज करता समाज , रख पूरब-पश्चिम रोड़ ।।
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उत्तर-दक्षिण रोड़

उत्तर-दक्षिण रोड़ उत्तर-दक्षिण रोड़ का, फिफ्टी-फिफ्टी जान ।वहाँ सभी है मतलबी, बचाय अपनी जान ।।बचाय अपनी जान, पड़ते जान के लाले ।वर किचन देखे ना, वधू दुकान के ताले ।।कह ’वाणी’ कविराज, यूँ करो दुर्गा-शंकर ।अपने-अपने हाल, वे दक्षिण आप उत्तर ।। शब्दार्थ:
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रखलो रोड़ पूरब

रखलो रोड़ पूरब पूरब राखे रोड़ जो, रोड़ा मेटे रोड़।निरोग राखे आपको, धन देवेगा जोड़।।धन देवेगा जोड़, रख बिजली का सामान ।सोना-पीतल बेच, लाल कलर के सामान ।।कह ’वाणी’ कविराज, खुश राखे हमेशा रब ।निकले पूत सपूत, तुम रखलो रोड़ पूरब ।। शब्दार्थ: राखे = रखना, रोड़ा =
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