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मैं हूँ आलू का पापड़

मैं हूँ आलू का पापड़ रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ मैं हूँ आलू का पापड़। मैं छोटे-छोटे बीज के रूप में था। किसान ने खेत की जुताई करके मुझे जमीन में दबा दिया। मेरा दम घुटने लगा। मुझे लगा मेरे प्राण पखेरू उड़ जाएँगे। किसान ने सिंचाई की। मुझसे अंकुर निकलने लगे
 
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मुन्ना :मेरा दोस्त - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

जब से जंगल कटने शुरू हुए , हमारी तो मुसीबत ही हो गई । जंगल में शिकार नहीं मिलता तो बाघ और भेड़िए गाँव में घुस आते हैं। जो मिला ,उसे ही मारकर खा जाते हैं । चाहे बछड़ा मिले चाहे भेड़-बकरी , चाहे कुत्ता बिल्ली। हमारे गाँव में पिछले कई दिनों से कई वारदात हो
 
सीमा सचदेव
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विश्व पुस्तक -दिवस के अवसर पर विशेष

धनेश के बच्चे ने उड़ना सीखा लेखक: दिलीप कुमार बरूआ ,अनुवाद : पंकज चतुर्वेदी ,चित्रांकन:पार्थ सेनगुप्ताखरगोश और कछुए की दौड़ लेखक: किरण तामूली ,अनुवाद : पंकज चतुर्वेदी ,चित्रांकन:समरज्योति दास प्रथम संस्करण: 2010 , मूल्य : 16 रुपये , पृष्ट :20 (आवरण सहित)
 
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