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राजा इल की कथा - उत्तरकाण्ड (21)

जब लक्ष्मण ने अश्‍वमेघ यज्ञ के विशेष आग्रह किया तो श्री रामचन्द्र जी अत्यन्त प्रसन्न हुये और बोले, "हे सौम्य! इस विषय में मैं तुम्हें राजा इल की कथा सुनाता हूँ। प्रजापति कर्दम के पुत्र इल वाह्लीक देश के राजा थे। एक समय शिकार खेलते हुये वे उस स्थान पर जा
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वृत्रासुर की कथा - उत्तरकाण्ड (20)

एक दिन श्रीरामचन्द्रजी ने भरत और लक्ष्मण को अपने पास बुलाकर कहा, "हे भाइयों! मेरी इच्छा राजसूय यज्ञ करने की है क्योंकि वह राजधर्म की चरमसीमा है। इस यज्ञ से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा अक्षय और अविनाशी फल की प्राप्ति होती है। अतः तुम दोनों विचारकर कहो
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राजा दण्ड की कथा - उत्तरकाण्ड (19)

महर्षि अगस्त्य से श्‍वेत की कथा सुनकर श्रीरामचन्द्र ने पूछा, "मुनिराज! कृपया यह और बताइये कि जिस भयंकर वन में विदर्भराज श्‍वेत तपस्या करते थे, वह वन पशु-पक्षियों से रहित क्यों हो गया था?"रघुनाथ जी की जिज्ञासा सुनकर महर्षि अगस्त्य ने बताया, "सतयुग की बात
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राजा श्‍वेत की कथा - उत्तरकाण्ड (18)

इन्द्र से वर प्राप्त करके रघुनन्दन राम महर्षि अगस्त्य के आश्रम में पहुँचे। वे शम्बूक वध की कथा सुनकर बहुत प्रसन्न हुये और उन्होंने विश्‍वकर्मा द्वारा दिया हुआ एक दिव्य आभूषण श्रीराम को अर्पित किया। वह आभूषण सूर्य के समान दीप्तिमान, दिव्य, विचित्र तथा
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ब्राह्मण बालक की मृत्यु - उत्तरकाण्ड (17)

एक दिन श्रीराम अपने दरबार में बैठे थे तभी एक बूढ़ा ब्राह्मण अपने मरे हुये पुत्र का शव लेकर राजद्वार पर आया और 'हा पुत्र!' 'हा पुत्र!' कहकर विलाप करते हुये कहने लगा, "मैंने पूर्वजन्म में कौन से पाप किये थे जिससे मुझे अपनी आँखों से अपने इकलौते पुत्र की
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कुत्ते का न्याय - उत्तरकाण्ड (12)

श्रीराम के शासन में न तो किसी को शारीरिक रोग होता था, न किसी की अकाल मृत्यु होती थी, न कोई स्त्री विधवा होती थे और न माता पिताओं को सन्तान का शोक सहना पड़ता था। सारा राज्य सब प्रकार से सुख-सम्पन्न था। इसलिये कोई व्यक्‍ति किसी प्रकार का विवाद लेकर राजदरबार
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राजा ययाति की कथा - उत्तरकाण्ड (11)

इस आश्‍चर्यजनक कथा को सुनकर सुमित्रानन्दन बोले, "हे प्रभो! ऐसे ही शाप की कोई और कथा हो तो सुनाइये।"लक्ष्मण के जिज्ञासा देखकर कौशल्यानन्दन बोले, "नहुष के पुत्र राजा ययाति के दो पत्‍नियाँ थीं - एक शर्मिष्ठा और दूसरी देवयानी। शर्मिष्ठा दैत्यकुल के वृषपर्वा
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राजा नृग की कथा - उत्तरकाण्ड (9)

एक दिन लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा, "महाराज! आप राजकाज में इतने व्यस्त रहते हैं कि अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं रखते।"यह सुनकर रामचन्द्रजी बोले, "लक्ष्मण! राजा का कर्तव्य होता है राजकाज में पूर्णतया लीन रहना। तनिक सी असावधानी हो जाने पर उसे राजा नृग की
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पुरवासियों में अशुभ चर्चा - उत्तरकाण्ड (6)

जब अयोध्या में शासन करते हुये बहुत समय बीत गया तब एक दिन रामचन्द्रजी सीता के गर्भवती होने का समाचार पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुये। वे सीता से बोले, "विदेहनन्दिनी! अब तुम शीघ्र इक्ष्वाकुवंश को पुत्ररत्न प्रदान करोगी। इस समय तुम्हारी क्या इच्छा है? मैं
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अभ्यागतों की विदाई - उत्तरकाण्ड (5)

अब श्री रामचन्द्र जी नियमपूर्क प्रतिदिन राजसभा में बैठकर राजकाज संभालकर शासन चलाने लगे। कुछ दिन पश्‍चात् राजा जनक विदा होकर मिथिला के लिये प्रस्थान किया। इसके पश्‍चात् कैकेय नरेश युधाजित, काशिराज प्रतर्दन तथा अन्य आगत राजा महाराजा भी विनयपूर्वक अयोध्या
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हनुमान के जन्म की कथा - उत्तरकाण्ड (4)

यह कथा सुनकर श्रीराम हाथ जोड़कर अगस्त्य मुनि से बोले, "ऋषिवर! निःसन्देह वालि और रावण दोनों ही भारी बलवान थे, परन्तु मेरा विचार है कि हनुमान उन दोनों से अधिक बलवान हैं। इनमें शूरवीरता, बल, धैर्य, नीति, सद्‍गुण सभी उनसे अधिक हैं। यदि मुझे ये न मिलते तो भला
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ढोल गवार शुद्र पशु नारी या फिर यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता...

आज तो हमारे प्रिय मित्र नीरज भाई में अपने ऑरकुट में अपना संदेश लिखा... ढोल गवार शुद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी... उत्तर में मैंने लिखा यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता... अब साहब दोनों में से किसी भी दल में जाइए उलटी ही पड़ेगी | अब साहब
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रावण के पूर्व के राक्षसों के विषय में - उत्तरकाण्ड (1)

श्रीराम का राज्य अयोध्या में स्थापित हो गया तो एक दिन समस्त ऋषि-मुनि श्रीरघुनाथजी का अभिनन्दन करने के लिये अयोध्यापुरी में आये। श्रीरामचन्द्रजी ने उन सबका यथोचित सत्कार किया। वार्तालाप करते हुये अगस्त्य मुनि कहने लगे, "युद्ध में आपने जो रावण का संहार
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शूर्पनखा प्रसंग व सीता हरण ---एक विस्तृत दृष्टि से व्याख्या .....

---लक्षमण ने जब दंड स्वरुप शूर्पनखा की नाक काट ली , इसका अर्थ यह है कि राम-लक्षमण -सीता द्वारा किये गए प्रगति पूर्ण कार्य से स्थानीय निवासियों द्वारा आर्थिक समृद्ध , स्वतंत्र वअधिकारों के प्रति सचेष्ट और ज्ञान वान होकर शूर्पनखा व खर आदि के स्वामित्व को,
 
Dr. shyam gupta
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रामनवमी के अवसर पर

चाहता है वंश-वृद्धि, कोई सुख-समृद्धि, चाँदी-सोना करे कोई धारण जहान में .नीचे अपमान दुख सहता है इनसान, ऊँचे पद घेर खड़े चारण जहान में .करे इंतज़ाम सारे, मन को आराम नहीं, सुख बने दुखों का भी कारण जहान में .चाहो जो निवारण, तरीका असाधारण है रामजी के नाम का
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राम नवमी पर विशेष ---डा श्याम गुप्त

सीता का निर्वासनरात सपने में, श्री राम आये,अपनी मोहक मुद्रा में -मुस्कुराए, बोले -वत्स , प्रसन्न हूँ -वर मांगो ;मैंने कहा,-प्रभु, कलयुगी तार्किक भक्त हूँ,शंका रूपी एक गुत्थी सुलाझादों |राम ! तुम्ही थे, जिसने-समाज द्वारा ठुकराई हुई,छले जाने पर ,किंकर्तव्य
 
Dr. shyam gupta
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उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना ... प्रभु की यह मुस्कान ही तो माया है

रामनवमी पर विशेषराम ...दो अक्षरों का एक ऐसा नाम जिस पर संसार का प्रत्येक हिन्दू की अथाह श्रद्धा है। राम हिन्दुओं के आराध्य देव हैं और राम का नाम उनके लिये भवसागर से मुक्ति देने वाला मन्त्र है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में राम के नाम को
 
जी.के. अवधिया
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नव संवत्सर पर एक भेंट:गर्व कीजिए अपने भारतीय होने पर

जय श्री राम ........... | आदरणीय मित्रो,वैसे तो आप के साथ होने वाली प्रत्येक चर्चा महत्त्वपूर्ण ही होती है,मगर जो चर्चा हम आज करने जा रहे हैं;उस से आप की 'भारतीय' होने की गर्वीली भावना आसमान छू लेगी | यूँ तो वैश्विक समुदाय को 'भारत की देन' की बात
 
डॉ.कुमार गणेश 369
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हनुमान का रामचन्द्र को सीता का संदेश देना - सुन्दरकाण्ड (16)

समस्त वृतान्त सुनने के पश्चात् सुग्रीव सभी आगत वानरों सहित विचित्र कानों से सुशोभित प्रस्रवण पर्वत पर श्री रामचन्द्र जी के पास गये। करबद्ध हनुमान ने रामचन्द्र जी को सीता जी का समाचार देते हुए विनयपूर्वक कहा, "प्रभो! रावण ने जानकी जी को क्रूर राक्षसियों
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लंका दहन - सुन्दरकाण्ड (15)

राक्षसों की भीड़ भयभीत होकर भाग गई। हनुमान जी के समस्त मनोरथ पूर्ण हो गये थे। वे विचार करने लगे कि मैंने अशोकवाटिका को नष्ट कर दिया, बड़े-बड़े राक्षसों का भी मैने वध कर डाला और रावण की काफी बड़ी सेना का सँहार भी कर दिया। तो फिर लंका के इस दुर्ग को भी क्यों न
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रावण के दरबार में - सुन्दरकाण्ड (14)

हनुमान रावण के भव्य दरबार को विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखने लगे। रावण का ऐश्वर्य अद्भुत था। वे सोचने लगे, अद्भुत रूप और आश्चर्यजनक तेज का स्वामी राजोचित लक्षणों से युक्त में यदि प्रबल अधर्म न होता तो यह राक्षसराज इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवलोक का संरक्षक हो
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हनुमान राक्षस युद्ध - सुन्दरकाण्ड (12)

सीता से विदा ले कर जब हनुमान चले तो वे सोचने लगे कि जानकी का पता तो मैंने लगा लिया, उनको रामचन्द्र जी का संदेश देने के अतिरिक्त उनसे भी राघव के लिये संदेश प्राप्त कर लिया। अब शत्रु की शक्ति का भी ज्ञात कर लेना चाहिये। राक्षसों के प्रति साम, दान और भेद
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हनुमान का सीता को अपना विशाल रूप दिखाना - सुन्दरकाण्ड (11)

वानरश्रेष्ठ हनुमान के मुख से यह अद्भुत वचन सुनकर सीता जी ने विस्मयपूर्वक कहा, "वानरयूथपति हनुमान! तुम्हारा शरीर तो छोटा है तुम इतनी दूरी वाले मार्ग पर मुझे कैसे ले जा सकोगे? तुम्हारे इस दुःसाहस को मैं वानरोचित चपलता ही समझती हूँ।"सीता का अपने प्रति
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हनुमान का सीता को धैर्य बँधाना - सुन्दरकाण्ड (10)

पति के हाथ को सुशोभित करने वाली उस मुद्रिका को लेकर सीता जी उसे ध्यानपूर्वक देखने लगीं। उसे देखकर जानकी जी को इतनी प्रसन्नता हुई मानो स्वयं उनके पतिदेव ही उन्हें मिल गये हों। उनका लाल, सफेद और विशाल नेत्रों से युक्त मनोहर मुख हर्ष से खिल उठा, मानो
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हनुमान का सीता को मुद्रिका देना - सुन्दरकाण्ड (9)

सीता के वचन सुनकर वानरशिरोमणि हनुमान जी ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा, "देवि! मैं श्री रामचन्द्र का दूत हनुमान हूँ और आपके लिये सन्देश लेकर आया हूँ। विदेहनन्दिनी! श्री रामचन्द्र और लक्ष्मण सकुशल हैं और उन्होंने आपका कुशल-समाचार पूछा है। रामचन्द्र जी
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हनुमान सीता भेंट - सुन्दरकाण्ड (8)

पराक्रमी हनुमान जी विचार करने लगे कि सीता का अनुसंधान करते करते मैंने गुप्तरूप से शत्रु की शक्ति का पता लगा लिया है तथा राक्षसराज रावण के प्रभाव का भी निरीक्षण भी कर लिया है। जिन सीता जी को हजारों-लाखों वानर समस्त दिशाओं में ढूँढ रहे हैं, आज उन्हें मैंने
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जानकी राक्षसी घेरे में - सुन्दरकाण्ड (7)

राक्षसराज रावण के चले जाने के बार भयानक रूप वाली राक्षसियों ने सीता को घेर लिया और उन्हें अनेक प्रकार से डराने धमकाने लगीं। वे सीता की भर्त्सना करते हुए कहने लगीं, "हे मूर्ख अभागिन! हे नीच नारी! तीनों लोकों और चौदह भुवनों को अपने पराक्रम से पराजित करने
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रावण-सीता संवाद (2) - सुन्दरकाण्ड (6)

सीता के ये कठोर वचन सुनकर राक्षसराज रावण ने उन प्रियदर्शना सीता को यह अप्रिय उत्तर दिया, "लोक में पुरुष जैसे-जैसे अनुनय-विनय करता है, वैसे-वैसे ही वह उनका प्रिय होता जाता है किन्तु मैं तुमसे ज्यों-ज्यों मीठे वचन बोलता हूँ त्यों-त्यों तुम मेरा तिरस्कार
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रावण-सीता संवाद - सुन्दरकाण्ड (5)

इस प्रकार फूले हुए वृक्षों से सुशोभित उस वन की शोभा देखते और विदेहनन्दिनी का अनुसंधान करते हुए हनुमान जी की वह सारी रात प्रायः व्यतीत हो चली। रात्रि जब मात्र एक प्रहर बाकी रही तो रात के उस पिछले प्रहर में छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदों के विद्वान तथा
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हनुमान जी अशोकवाटिका में - सुन्दरकाण्ड (4)

हनुमान जी सीता की खोज के अपने निश्चय पर अडिग हो गये। उन्होंने प्रण कर लिया कि जब तक मैं यशस्विनी श्री रामपत्नी सीता का दर्शन न कर लूँगा तब तक इस लंकापुरी में बारम्बार उनकी खोज करता ही रहूँगा। इधर यह अशोकवाटिका दृष्टिगत हो रही है जिसके भीतर अनेक विशाल
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लंका में सीता की खोज - सुन्दरकाण्ड (3)

इस प्रकार से सुग्रीव का हित करने वाले कपिराज हनुमान जी ने लंकापुरी में प्रवेश कर मानो शत्रुओं के सिर पर अपना बायाँ पैर रख दिया। वे राजमार्ग का आश्रय ले उस रमणीय लंकापुरी की और चले। वहाँ पर स्वर्ण निर्मित विशाल भवनों में दीपक जगमगा रहे थे। कहीं नृत्य हो
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हनुमान जी का लंका में प्रवेश - सुन्दरकाण्ड (२)

चार सौ योजन अलंघनीय समुद्र को लाँघ कर महाबली हनुमान जी त्रिकूट नामक पर्वत के शिखर पर स्वस्थ भाव से खड़े हो गये। कपिश्रेष्ठ ने वहाँ सरल (चीड़), कनेर, खिले हुए खजूर, प्रियाल (चिरौंजी), मुचुलिन्द (जम्बीरी नीबू), कुटज, केतक (केवड़े), सुगन्धपूर्ण प्रियंगु
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इनके राम ऑफलाइन?

इनके राम भला ऑन लाइन क्यों न हों? अब ऑफ लाइन रहने से रामानन्दियों का संसार में गुजारा कैसे चलेगा? इसमें कोई संदेह नहीं कि वे सीधे-सादे और सहज हैं, लेकिन मुझे ऐसा लगा कि अध्ययन व ज्ञान-विज्ञान के बारे में समय के हिसाब से सिद्ध नहीं हैं। मेरा मानना रहा है
 
ज्ञानेश उपाध्याय (gyanesh upadhyay)
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हनुमान का सागर पार करना - सुन्दरकाण्ड (1)

बड़े बड़े गजराजों से भरे हुए महेन्द्र पर्वत के समतल प्रदेश में खड़े हुए हनुमान जी वहाँ जलाशय में स्थित हुए विशालकाय हाथी के समान जान पड़ते थे। सूर्य, इन्द्र, पवन, ब्रह्मा आदि देवों को प्रणाम कर हनुमान जी ने समुद्र लंघन का दृढ़ निश्चय कर लिया और अपने शरीर को
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मंदिर में रावण मधुशाला में राम हूँ मैं - दीपक 'मशाल'

वफ़ा जो नहीं बेवफा ही सहीचलो याद तो रखोगे तुम,मेरी खूबी नहीं खता ही सहीचलो याद तो रखोगे तुम.मंदिर में रावण मधुशाला में राम हूँ मैंहालात ना पहचानता इसलिए बदनाम हूँ मैंघात को मैं प्यार दूँ प्यार को देता हूँ घातरण
 
दीपक 'मशाल'
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“गांधी जी कहते हे राम!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

राम नाम है सुख का धाम। राम सँवारे बिगड़े काम।। असुर विनाशक, जगत नियन्ता, मर्यादापालक अभियन्ता, तुलसी के आराधक राम। राम सँवारे बिगड़े काम।। मात-पिता के थे अनुगामी,, चौदह वर्ष रहे वनगामी, किया भूमितल पर विश्राम। राम सँवारे बिगड़े काम।। कपटी रावण मार दिया
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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भगवान राम की सहायता से पर्यावरण सुधार

चौंक गए न आप ! मैं भी चौंक गया था शीर्षक पढ़ के . लेख पढ़ा तो समझ आया की कितना अभिनव प्रयास कर रही एक संस्था धर्म के सहारे . जहाँ लोग धर्म के नाम पर न जाने अपने कितनी दुकानदारी चला रहे हैं वहीं एक संगठन "रौनक एवं जागरूक समाज संस्था " ने लखनऊ से 250
 
डॉ महेश सिन्हा
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तिवारीसाहब के विचार दशहरे पर आज के सन्दर्भ में

आज सुबह सुबह पन्डताईन ने सब्जी मंडी की लिस्ट पकडा दी ! दशहरे की बड़ी रौनक है ! बच्चे भी रावण जलाने की जोगाड़ में लकडी वगैरह कबाड़ने के चक्कर में हैं ! अनेक वृक्षों की बली आज पक्की है ! आजकल तिवारी साहब ओशो की "प्रीतम छवि नैनन बसी " पढ़ रहे हैं ! रात
 
दीपक "तिवारी साहब"
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नजर टिकाओ राम-तत्व पर!

आज सुबह ही मुझे किसी मित्र ने सावधान किया कि मैं अपनीए ट्टिपणियों में किसी व्यक्ति का, किसी पोर्टल का या किसी वेब साईट का नामोल्लेख ना करूँ. बताया कि इससे वे नाराज हो सकते हैं. पहले तो मैं चौंका, कि लेखक या संस्थायें क्या इतनी असहिष्णु हो सकती हैं कि
 
Ummed Singh Baid "Saadhak "
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हर वर्ष वही-वही विचार

राजनीतिक पार्टियाँ क्या सोचती है, हिन्दू संगठन क्या सोचते है, कैसे अपने मत बदलते है…मुझे इससे कोई सरोकार नहीं, मगर यह सदा से मानता आया हूँ कि अयोध्या में राम-मन्दिर का न होना....
 
संजय बेंगाणी