पसंद करें
9
नापसंद करें

The night जिसने कंजूसी की और (लोगों की समस्याओं से) बेपरवाह रहा और भलाई को झुठलाया तो ‘हम‘ उसको कठिन मार्ग की सुविधा देंगे और उसका माल उसके काम न

आरम्भ परमेश्वर के नाम से जो अनन्त दयावान और सदा कृपाशील हैसाक्षी है रात जबकि वह छा जाये और साक्षी है दिन जबकि वह रौशन हो और साक्षी है उसकी बनाई सृष्टि, नर और मादा कि तुम्हारी कोशिशें अलग अलग हैं। सो जिसने दिया और वह डरा और उसने भलाई को सच माना तो ‘हम‘
 
DR. ANWER JAMAL
टैग: रात
पसंद करें
7
नापसंद करें

कितने तो उन मयखानों में रात गुजारा करते हैं....

पशे चिलमन वो बैठे हैं हम दूर से नज़ारा करते हैंगुस्ताख हमारी आँखें हैं आँखों से पुकारा करते हैंकोताही हो तो कैसे हो, इक ठोकर मुश्किल काम नहीं  मेरी राह के पत्थर तक मेरी ठोकर को पुकारा करते हैंपीते हैं बस आँखों से और बदनाम हुए हम जाते है कितने तो उन
टैग: रात
पसंद करें
3
नापसंद करें

रात साढ़े तीन बजे

(1)नींद टूटती रह रहस्वप्न माशुकाएँ कर फुरफुरी कानों मेंखिलखिलाएँ - इतनी सारी !(2) शाम - प्रगल्भ वासना निर्वसन - मुझे भोगो।(3) ईश्वर नाम सुमिरन -छपते समाचार पत्र लाखों रोज, रोज का टंटावही पुरानी मशीनें -वही रोज कटते पेंड़। (4) सुराही हुई औंधीतुम्हारी
 
गिरिजेश राव
टैग: रात
पसंद करें
6
नापसंद करें

रात भर....

जागा रात भर, सोया  न बिस्तर बेगाना मेरा, हर करवट सदाएँ देता था सपना पुराना  तेरा. सोचा रात भर, वजहें तेरी बज़्म में आने की, काश मुझको मालूम न होता ठिकाना  तेरा चर्चा रात भर, चलता रहा महफ़िल मे
 
Sudhir (सुधीर)
टैग: रात
पसंद करें
3
नापसंद करें

रात के 12 बजे, एक हिंदुस्तानी जगे

आपने करप्ट पुलिसवाले देखे होंगे, लापरवाह पुलिसवाले देखे होंगे, बदतमीज़ पुलिसवाले भी देखे होंगे, लेकिन लाचार पुलिसवाले देखे हैं कभी ? नहीं, मैं पॉलिटिशंस के सामने उनकी लाचारी की बात नहीं कर रहा हूं। उनके सामने तो वे लाचार हैं ही, खासकर रूलिंग पार्टी क
 
नीरेंद्र नागर
पसंद करें
0
नापसंद करें

वह

घोषित 'विराम' से थोड़ा विराम मिला तो ब्लॉगवाणी पर गया। पहली दृष्टि गई वर्तिका नन्दा की कविताओं पर आनन्द राय की एक पोस्ट पर। आनन्द जी की पोस्ट के बजाय मैं वर्तिका नन्दा के ब्लॉग पर गया तो वहाँ टिप्पणी के रूप में मुझे यह कविता दिखी, जो मैंने उन्हीं के
 
गिरिजेश राव
टैग: रात
पसंद करें
1
नापसंद करें

झोंके का इंतजार, मेंढक, पसीना और चंद आवाजें

रात हो गई है. पास की नाली के पास रहता मेंढकों का परिवार एक लय में चीख रहा है. नहीं नहीं गा रहा है. शायद उनका कोई दुख उनसे छूट गया है. उस मेंढकी के परिवार में कितने लोग होंगे नहीं कह सकता पर वह अकेली नहीं होगी. प्यास होंठों को सुखाने लगी है और मैं अंध
 
सचिन ..........
टैग: रात