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ग़म

ग़म एक ग़म जो तुमसे मिला उसके मिलने का अब क्या गिला एक रहबर जो मुझे मिला उसके बिन अब क्या काफिला अब तो यूँ ही चलेगा गम का सिलसिला सुकून मिला, मिला, न मिला, न मिला उसके न मिलने का भी अब क्या गिला अब तो है यह सिर्फ ग़मों का काफिला इसमें फिर एक ग़मगीन फ
 
रचना दीक्षित
टैग: रहबर