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मेरी मम्मी

आज मदर्स डे है। यानी मां का दिन। मां, जिसने हमारे अस्तित्व में आने की प्रक्रिया की पहली अवस्था से लेकर आज के दिन तक हर पल हमारे लिए और सिर्फ हमारे लिए जीवन जिया है। परिवार के लोगों की हर जरूरत का ध्यान रखने में भी उसकी नजर कहीं न कहीं से हमारी ही ओर
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कुछ बहुएं भी ना!

गंदे कपड़ेजूठे बरतनबूढ़ी सास के आगे पटकसहेली के साथ फिल्म देखने निकलीमिसेज शर्मापरदे परबहू के सास पर अत्याचार देखफूट-फूट कर रोईसहेली के कंधे पर सिर रखकरसिसकते हुए बोली-कुछ बहुएं भी ना!-शिवराज गूजर
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बदलाव

बेटे की शादी के बाद उसमें बड़ा बदलाव आयादहेज के विरोध मेंउसने बड़ा आंदोलन चलायासोई हुई उसकी आत्माअचानक! जाग गई थीबेटी जो उसकी शादी के लायक हो गई थी।बेटे की शादी के बाद उसमें बड़ा बदलाव आयादहेज के विरोध मेंउसने बड़ा आंदोलन चलायासोई हुई उसकी आत्माअचानक!
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प्रिया शर्मा की कविता

यह कविता जयपुर से प्रिया शर्मा ने भेजी है। यह उनका पहला प्रयास है, इसलिए इसमें हो सकता है कि कहीं कच्चापन नजर आए, लेकिन यह रचना एक संभावना जगाती है। चलना सीखने से पहले सभी लडख़ड़ाते हैं। दुआ कीजिए कि ये साहित्य संसार में ये अपना एक मुकाम बनाएं। इनकी और भी
 
shivraj gujar
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मै जानता हूं

हमें पता थाहम हो नहीं सकेंगेएक-दूजे केफिर भीफूट ही गईं कोंपलेंप्यार की।बिछुडऩे का गमरुला जाता था जब कभीतुम कहती थीचिंता मत करोकहीं भी हो मेरा ब्याहमैं अपने उनकोले आऊंगी उसी शहरजहां तुम रह रहे होंगेमजे की बात देखोतुम्हारी डोली जिस शहर में आईनौकरी मुझे भी
 
shivraj gujar
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गुडिय़ा का ब्याह

दोपहर का वक्त था। रोज की तरह चिड़कली छोटी बहन पंखी के साथ मिलकर अपनी गुडिय़ा का ब्याह रचाने में मशगूल थी। पास ही बैठी नाथी देवी रस्सी बटने के साथ-साथ शादी के सभी आयोजनों में शरीक थीं। विदाई की बेला थी। दहेज का सामान रखा जा रहा था। अन्य सामानों के साथ जब
 
shivraj gujar
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अलविदा

उसने कहामैं जा रही हूंहमेशा-हमेशा के लिएतुमसे दूरबस, जो बचे हैं पलवो गुजार लोहंसी-खुशीमेरे संगक्या-खोयाक्या-पायाइसका हिसाबलगा लेनाकलअभी तो हूं मैं तुम्हारेऔर तुम मेरे साथसुनो,जब मैं चली जाऊंगीतुम उदास मत होनारोना भी मतन घंटों बैठ करडूबते सूरज को निहारने
 
शिवराज गूजर.
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हर काम की एक उम्र

यह विचार हमें योगेन्द्र पिन्टू ने जयपुर से भेजे हैं
 
शिवराज गूजर.