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उसने लिखा...................बहुत दिनों के बाद.......................

आज वो लौट आई है ...................बडे दिनों के बाद..........मै खुश हूँ..............
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नक्सली होने का दंभ !

आदर्श की बात वो करते हैं , जीवन की लड़ाई इंसानों से लड़ते हैंवो बात कहाँ हैं इनमे अब ,जिस पर ये नक्सली होने का दंभ भरते हैंइस प्रजातंत्र में भी देखो सरकार तो इनसे डरते हैंवो बात कहाँ हैं इनमे अब ,जिस पर ये नक्सली होने का दंभ भरते हैं |हिंसा का दामन थामे
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आधी बात कही थी |

आधी बात कही थी तुमने और आधी मैं ने जोड़ी |तब जाकर बनी एक तस्वीर सच्ची झूठी थोड़ी थोड़ी|| नटखट सी बातों के पीछे दुनिया भर का प्यार छुपा था |मुस्काती आँखों ने जाने कैसे कैसे स्वप्न बुना था || भींग गयी मेरी भी आँखें भोर का स्वप्न कहाँ पूरा हुआ था |आज उसे हम कह
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रिश्तों की पहचान

उनके खत की सादगी में खुद को अकेला पा रहा था।स्याह में संलिप्त होकर भी खुद को मैं तन्हा पा रहा था॥कभी देखा था तागे बुनने में गांठ नहीं आती थी।रिश्तों में आयी गांठ को मैं मिटा रहा था ॥कोरे कागज़ पर लिखता था कभी उनकी याद को ।आज सूनेपन में फिर से उनको क्यों
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इश्क बदल गया

वो शाम पुरानी लगती है वो जाम पुरानी लगती है | अफसानों के आँगन में अब हर काम पुरानी लगती है || जिन्दा हूं और रोज जीने की कोशिश करता हूं। बद्लते जमाने और इश्क के मर्म में मरने से भी अब डरता हूँ || इश्क की आहट सुन अब क्यों जिन्दा ही मर जाता है | अब जाकर
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एक दिया बुझा हुआ !

ख़ून से जब जला दिया एक दिया बुझा हुआ|फिर मुझे दे दिया गया एक दिया बुझा हुआ||गम लिखूं या कम लिखूं इस खेल में फसा हुआ |अतीत की वो याद है जो मिल गया खुदा हुआ ||जिन्दगी के खेल में अकेलेपन का इन्तहा हुआ |सोचने से पहले उनसे कोई लब्ज था बयाँ हुआ ||सोच कर चला था
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अल्फाजों का आशियाना

चाँद की चाँदनी में भी मेरा साथ बेगाना लगता है | पहले मेरी आँखें मरहम और अब छुअन भी अनजाना लगता है ||साहिल से दूर समंदर सा पीर अपना आशियाना लगता है |प्यार की राहों में एक कंकड़ भी परवाना लगता है |जिस हँसी कों बेताबी से देखा करती थी वो | अब वही खुशी क्यों
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'आज की सरकार'

बनी !आज ऐसी 'सरकार ',चटनी में मिल गयी आचार । दूरदर्शन में देखे ,सदन की कारवाई । देश हित की बात न होती होती बड़े बड़ाई । हम तुम ,हम तुम होते होते बंद होती कारवाई । कारवाई की हालात ,लगती बड़ी अजूबा । लूट खाये देश को ,लगती यही मंसूबा । आज बनी है ऐसी सरकार
 
ज्योति सिंह
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खुद कों बताऊँ कैसे !

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कैसे समझायें उन्हें ?

उनकी एक बात पर पर मैं हैरां हो जाता हूं।मेरे हाल पर जब उन्हें रोता हुआ पाता हूं॥कैसे समझाउं उन्हें,कि मैं उनसे बफ़ा करता हूं।आखें हो जाती है नम जब दर्द ए गम बयां करता हूं॥रूह कांप उठती है जब वो मेरी बफ़ा को कोई नाम नहीं देती।जीवन के उलझन में खुद की तन्हाई
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कवी की कल्पना

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मानवता पर हमला

ये मानवता पर हमला है कुछ और नहीं कह सकते हम |शब्दों का एक सहारा है अब और नहीं चुप रह सकते हम |क्या ऑस्ट्रेलिया सहनशीलता का परिचय दे रही है |छात्रो कों जला कर खुद कों अच्छा राज्य बता रही है |कार्टून से उठी नाराजगी उनकी सभ्यता कों दर्शा रही है |दोनों देशों
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कैसे जीना सीखा

नये परिन्दे से सिखा है मैं ने वक्त को आजमाना।कांटो से सिखा है फूलों के दामन में लिपट जाना॥दुनिया कि कोसती निगाहों ने जिन्दगी को जीना सिखा दिया।मांगकर पीता था पहले, जिसने मैखाना जाना सिखा दिया॥दिल कि जवां धड्कनों ने कभी शायर तो कभी दीवाना बना दिया।तारीफ़
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मै क्या हूँ ?

मनुष्य के स्वभिमानऔर अभिमान जैसी भावनाओ के उलझन में फस कर ये लिख बैठा |अश्रु का मैं धार हूं या कोई प्रहार हूं।मानवता का कोइ दूत हूं या कोई कुम्हार हूं॥वक्त की मैं खोज हूं या कोई पुकार हूं।भूत का मैं गर्त हूं या तुम्हें स्वीकार हूं।।कट रही है जिन्दगी
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गिद्ध

गिद्ध --------- शहीद का शव अभी -अभी घर लाया गया था । शव आया कि गिद्ध आये , नेता -मंत्री आये।हर गिद्ध शव पर चढाने के लिए अपने साथ पुष्प -गुच्छ लाया। पुष्पगुच्छ उठाने के लिए साथ में एक नौकर भी लाया।आंखों में आंसू जैसा कुछ लाया। चेहरे पर उदासी ओढ़ लाया।
 
विष्णु नागर
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अलफ़ाज़ क्या कहेंगे !

आकाश का सूनापन ही हमें तन्हा भी जीना सिखाता है।उद्वेलित मन भी कांप उठता है जब उनकी याद दिल धड्काता है॥विरह कि तपिश आज भी डर का मौहाल बनाती है।जब बेखुदी से होश में आने को जी मचल जाती है ॥लोग कह्ते है मैं यूं ही लिखता हूं प्यार का अफ़साना।बेवजह कलम और
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यह परिदृश्य?

खौफनाक है यह परिदृश्य ,क्या होगा विश्व का भविष्य |कौन जियेगा ,कौन मरेगा मानवता का कैसा रिस्कमानव ख़ुद को मार रहा है हम कैसे इसे बचायेंगे||लोगों की आवयश्कता अब बन रही समस्या|ग्रह ,नक्षत्र और तारे क्या यही बच पायेंगेमानव ख़ुद को मार रहा है हम कैसे इसे
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एक ख्वाब ?

वो जिन्दगी ही क्या, जिसका कोई वजूद ना हो। वो आशियाना ही क्या, जो आंधियों मे मह्फ़ूज़ ना हो॥ गम के आंधियों में, बिखर जाते हैं रेत के घरौंदे। वो जाम ही क्या जिसके पीने में बदनाम पैमाना ना हो॥ हंगामा वाजिब है ,लेकिन थोडी सी पी लेने दो । ए मौत तुम कल आना ,आज
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विरह

दिल की फ़रयाद सिर्फ़ इतनी है, कि मरने से पहले उन्हे देख लें।,विरह कि तपिश मे खुद जलें,और उनकी यादों को लम्हों मे समेट लें॥वो मुझे शायद भुला दें, लेकिन उनकी यादें ही काफ़ी है मेरे जीने के लिये।उनके आने कि आस भी शायद कम पर जाये जिन्दगी को आजमाने के लिये ॥सावन
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उनकी याद

मेरे दिल के आएने में हमेशा उनकी तस्वीर होती थी।खुदा को ये मन्जूर ना हुआ तो इस दिल का क्या करें॥उनकी याद में अब रोते है इसके सिवा हम क्या करें।वो कह्ती हैं मुझे बेवफ़ा अब अपनी वफ़ा का क्या करें॥मैं बेवफ़ा ही सही लेकिन उनकी यादों में तो जीता हूं।तकलीफ़ तो तब
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सड़क

सड़क क्या तुमने किसी सड़क को चलते हुए देखा है ये सड़क कहाँ जायेगी कभी सोचा है ये सड़कें न तो चलती हैं,न कहीं जाती हैं ये एक मूक दर्शक की तरह स्थिर हैं ये सड़कें आजाद हैं कहीं भी किसी भी सड़क से मिल जाने को ये आज़ाद हैं किसी को भी अपने से जुदा कर जाने को
 
रचना दीक्षित
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अश्क भर आते हैं |

इन आंखों में जब अश्क भर आते हैं ।कुछ लोग इसमें डूबते नज़र आते हैं॥शिकवा या शिकायत नहीं किसि सेदिल धड्कने के सवब याद आते हैं|मुश्किल है आज संभलना ए दोस्त क्योंकिमुसीबत मे अब तिनके भी डूबते नजर आते हैं|इस दिल का अफ़साना हम भी सुनाते लेकिनअफ़सोस है कि ये उनके
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काश ऐसे होते !

जिन्दगी नायाब तरीके से हम क्यों जीते हैं। रातें हो जाती है कम , दिन को पीते हैं॥सोचा था कल होगा अच्छा , आज को जीते हैं।अपनों में रह्कर भी हम गैरों से होते हैं॥नयी शहर है नयी चुनौती सोच में हम दूबे रह्ते हैं।उनकी यादों में अक्सर यूं तन्हा खोये रह्ते
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माँ दिवस क्यों ?

" दूरजाकर भी दूर जा न सके , हमें अफ़सोस की हम उन्हें भुला न सके वो लाख कहें मैं दूर हूँ लेकिन हम उन्हें ख़ुद से जुदा पा न सके कल्पनों की दुनिया में हम मानवीय पक्षी कभी ऐसी उड़न भरने को सोचते हैं जिसके न क्षितिज की सीमाओं का पता और न ही धरती का \ विज्ञानं
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आज़ादी के मायने

आज़ादी किसे अच्छी नही लगती वो खूंटे से बंधा पशु हो या फिर पिंजरे में बंद पक्षी , बचपन की यादों को ताज़ा करने के लिए काफ़ी हैं लेकिन क्या सही मायने में हम आजाद हैं |कुछ सवाल ऐसे हैं जो इस मानवता को झकझोरने के लिए काफ़ी हैं आज हम ने आज़ादी के ६२ वें सालगिरह
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जिन्दगी

गम तो सबों को मिलती है लेकिन खुशियाँ किसी किसी को नसीब होती है मौत तो सबों को मिलती है लेकिन एक अच्छी जिन्दगी किस्मत वालों को तह्रिब होती है अपनों के लिए तो सभी जीते हैं हमें चाहिए की हम औरों के लिए जियें गम को भुलाने के लिए शराब तो सभी पीते हैं हमें
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वो सात दिन .....

वो सात दिन उनके साथ बिताये हुए कुछ ख़ुशी कुछ गम आजमाए हुए प्यार और नफरत की वो घडी जिन्दगी को नया रुख दिलाये हुए गम रहा की जब तक दम में दम रहे इस दिल के बिछड़ जाने का गम रहे आज लिखता हूँ उनकी यादों में मैखानें भी जाता हूँ फिर भी दुआ करता हूँ खुदा से की
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जिन्दगी

जिन्दगी एक ख्वाब है जिसे देखने को जीता हूँ |अब गम के आंसुओं को मैं अकेला पीता हूँ ||मैं भी हँसता था कभी औरों की ख़ुशी को देखकर आज अपनी ख़ुशी को भी तन्हाइयों में समेटता हूँ |मैं बंदगी करता खुदा की अच्छाई को पाने कें लिए इल्म है इतना की बातों को जुमलों में
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बचपन

वो दिन कितने अच्छे थे, जब तुम एक नादान बच्चे थे। मुस्काते थे एक परी की तरह, कागज की तरह सच्चे थे॥मन था चंचल, उद्वेलित, लेकिन धुन के पक्के थे।काश कहूं मैं ये सब किससे कि तुम कितने अच्छे थे॥याद करूं मैं निश दिन तुम को जब तुम ओझल हो जाते।खुशी की रेत में,
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किसने बाँसुरी बजायी

जरा और मृत्यु के भय से यौवन के फ़ूल कब खिलने का समय टाल बैठे हैं? जीवित जल जाने के भय से पतंग की दीपशिखा पर जल जाने की जिजीविषा कब क्षीण हुई है? क्या कोयल अपने कंठ का मधुर राग बिखेरना मेढकों के कटु शब्द से विक्षिप्त होकर छोड़ देती है? शायद नही। जीवन का
 
हिमांशु
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रास्ते बन्द नहीं सोचने वालों के लिये

कविता की दुनियां में रचने-बसने का मन करता है। समय के तकाजे की बात चाहे जो हो, लेकिन पाता हूं कि समय का सिन्धु-तरण साहित्य के जलयान से हो जाता है। साहित्य की जड़ सामाजिक विरासत लिये होती है। शब्दों की जड़ें व्यक्ति के मन के सपनों और स्मृतियों में गहरी ज
 
हिमांशु
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कह दूँ उसी से .

सोचता हूं, इतनी व्यस्तता, भाग-दौड़, आपाधापी में कितनी रातें, कितने दिन व्यतीत किये जा रहा हूं। क्या है जो चैन नहीं लेने दे रहा है? कौन सी जरूरत है जो सोने नहीं देती है? कौन-सा मुहूरत है जो अभी मृगजल की तरह अनास्वाद बना है। कुछ प्राप्ति में आनन्द को खो
 
हिमांशु
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