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पात्र बदल गए हैं ,नाटक तो वहीँ हैं .

सुबह का समय,मैं बादल की किसी टुकड़े पर सवार पूरी दुनिया देख रही हूँ ,सुबह सुबह मेरे घर के चारो तरफ कोहरा छाया रहता हैं,इतना कोहरा की आसपास के घर भी ठीक से नज़र नहीं आते.लगता हैं मेरा घर किसी परी की  कहानी की तरह बादलो के बीच बना हुआ हैं.ठीक नानी की
 
डॉ.राधिका उमडे़कर बुधकर
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