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प्रो. योगेश अटल की एक कविता

एक कविता : १९ फरवरी २०१० चुभा कर कृतघ्नता की कटार मेरे वक्ष में वे सब चले गए हैं अपने-अपने कक्ष में मैं उनकी अनुकम्पाओं का अहसानमंद हूं चुपचाप घावों को सहलाता कोठरी में बन्द हूं उन्हें जो कुछ लेना था मुझसे, ले गए उन्हें जो कुछ देना था मुझको, दे गए । ****