सवाल ज़मीन का
सोचो, करो कुछ भी..जमीन हमारी ही है!!अशोक मालवीयसरकार हो या पूंजीवादी ताकतें, इन्होंने कभी भी आदिवासियों को उनका हक नहीं देना चाह है? लेकिन जब जनाक्रोश एक सैलाब का रूप धारण कर लेता तो इसकी दहशत की वजह से इनके हक को दर्शाने वाले कानून तो बना दिये जाते है।
May 30 2010 12:32 PM



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