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जीवन ही एक नाटक बन गया है - (विश्व रंगमंच दिवस पर)

आज विश्व रंगमंच दिवस है, ऐसा हमें हमारी उरई इप्टा के कुछ साथियों ने बताया। रंगमंच का नाम आते ही सामने आता है एक बड़ा सा मंच और उस पर कुछ सार्थक प्रस्तुतियाँ करते कलाकार। इधर पिछले कुछ सालों से हमने नाटकों के प्रति लोगों में रुझान कम से कमतर की स्थिति तक
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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आत्महत्या से बचें, कॉन्डम को चुनें?

मेक लव नॉट वॉर - 70 के दशक में उभरे हिप्पी आंदोलन ने इसे अपना घोष वाक्य बनाया था। अब 2010 में मुंबई के दो यंग बिजनेसमेन युवाओं से कह रहे हैं, - फंदा नहीं, कॉन्डम अपनाओ। उनका कहना है फंदा जीवन का अंत है, जबकि कॉन्डम (यानी सेक्स) असफलता से उपजी निराशा
 
प्रणव प्रियदर्शी
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अंधाधुंध लालच में भागने का दुष्परिणाम है ये सब

बाबा और महिलाएँ, मौलाना और महिलाएँ, धर्मगुरु और स्त्रियाँ.... ये किसी तरह का समीकरण नहीं वरन् वर्तमान में समाज में व्याप्त स्थिति है। पिछले कुछ दिनों से किसी ढोंगी बाबा और उसके चंगुल में फँसी अनेक लड़कियों की कहानी, किसी धर्मगुरु द्वारा महिलाओं को बच्चे
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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ये युवा 'नेचुरलिस्ट' है

गेजेट्स के साथ पहाड़ों और झरनों से भी प्रेम कर रहे हैं येआज का 'युवा" जबरदस्त पढ़ाई कर रहा है। कैरियर को भी गंभीरता से ले रहा है और खूब रुपए भी कमा रहा है। लेकिन इसके साथ-साथ क्या वो प्रकृति माँ से जुड़े अपने कर्तव्यों को लेकर भी गंभीर है? दोस्तों, इसी
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वेलैंटाइन डे- कायरों, कामुकों और नपुंसकों के लिये नहीं

वेलैंटाइन डे- कायरों, कामुकों और नपुंसकों के लिये नहीं वीरेन्द्र जैन हर वर्ष की भांति एक बार फिर वेलैंटाइन डे आने वाला है और एक बार फिर कार्ड बेचने वाले कार्ड बेचेंगे, गुलदस्ते बेचने वाले गुल्दस्ते और फूल बेचेंगे, अखबार वेलैंटाइन सन्देश छापने के नाम पर
 
वीरेन्द्र जैन
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ये स्वामी विवेकानंद कौन हैं?

आज 12 जनवरी है, युवा हृदय सम्राट स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती। महाविद्यालयों, स्कूलों को मौका मिलता है किसी भी जयन्ती पर अवकाश घोषित करने का। आज भी हुआ होगा, जहाँ नहीं हुआ वहाँ दबा-छिपा आक्रोश जैसा है।जब भी देश के महान पुरुषों की चर्चा होती है तो हम उनके
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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आलस की निशानी है ब्रैंड पर निर्भरता

आज के युग में लोग और खासतौर पर हमारा युवा वर्ग ब्रैंड को कंस्यूम करने का आदी हो गया है। ब्रैंड के आवरण के फेर में वह यह भी नहीं समझ पाता कि उसके अंदर छिपी वस्तु की असलियत क्या है। युवा किसी भी चीज को लेने या देखने से पहले ही उसके प्रति एक विचारधारा ब
 
प्रसून जोशी
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बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग "एक चिट्ठी देश के नाम"

  [प्रेम परिहार] दिल्ली दूरदर्शन.सदियों से हमारी फिजा में संवाद की प्रक्रिया विद्धमान है. एक चिट्ठी देश के नाम लिखना असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर है, फिर भी अपनों से संवाद बनाना मनुष्य की आदत का एक अंग है. चिट्ठियों के इतिहास काफी पुराना है.
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उम्मीद

अश्कों में जैसे धुल गए हैं सब मुस्कुराते रंग, रास्ते में थक-कर सो गई मासूम उमंग। दिल है कि फिर भी ख़्वाब सजाने का शौक है, पत्थर पर भी गुलाब उगाने का शौक है। बरसों से एक अमावस कि रात है, अब इनको हौसला कहो या जिद कि बात है। दिल कहता है अंधेरे में एक रोश
 
अलोक द्विवेदी
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