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सवाल….

सवाल…. जाने कितने सवाल ….. अचानक ही पुरानी यादों में बहते जाते, और एक के बाद एक यादों में खोते जाते… फिर आ खड़े होते वही सवाल…. उसने ऐसा क्यों किया … अब वो कैसा होगा … क्या वो खुश होगा … क्या उसकी ज़िन्दगी में सब
 
Shubhashish Pandey
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सुनो… मुझे तुम्हारी ये बातें अच्छी लगती हैं.

वो शायद जुलाई की शाम थी या अगस्त की…याद नहीं. हम यूँ ही बातें करने की जगह ढूँढते-ढूँढते सरस्वती घाट पहुँच गए थे. वो जगह खूबसूरत है और हमारी मजबूरी भी क्योंकि इलाहाबाद में घूमने-फिरने के लिए इनी-गिनी जगहों में से एक है. उन दिनों मैं जबरदस्त इमोशनल
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अब सब कुछ पहले जैसा है

अब किसी पड़ोसी को इस बात की शिकायत नहीं होगी कि उसने छत पर सूखने के लिए टंगे कपड़ों को खींचकर ज़मीन पर गिरा दिया , कि उसने उनके कमरे के सामने पोटी या सुसु कर दी, अब किसी को छत पर जाने से भौंक-भौंककर कोई नहीं रोकेगा… अब मुझे भी रात में दो बजे [...]
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ऎ बहुरिया साँस लऽ, ढेंका छोड़ि दऽ जाँत लऽ

  आज गिरिजेश भैया ने अपनी पोस्ट से गाँव की याद दिला दी। गाँव को याद तो हम हमेशा करते रहते हैं लेकिन आज वो दिन याद आये जब हम गर्मी की छुट्टियों में वहाँ बचपन बिताया करते थे। अपनी ताजी पोस्ट में उन्होंने पुरानी दुपहरी के कुछ बिम्ब उकेरे हैं। एक बिम्ब
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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खास लम्हें.........

कभी-कभी लफ्ज़ कम पड़ जाते हैं या कहें कि मिल नहीं पाते कुछ एहसासों के लिए, किन्ही खास लम्हों को कलमबद्ध करने के लिए मगर तस्वीरें उस काम को काफी हद तक आसान कर देती हैं और खामोश रहते हुए भी कई बातें कह जाती है उन लम्हों के बारे में जो अपने आप में इतने
 
अंकित "सफ़र"
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क्या इतना सहज होता है सांसद व वरिष्ठ पत्रकार

प्रभात झा बने मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष राज्यसभा सांसद प्रभात झा को मप्र में भारतीय जनता पार्टी का निर्विरोध प्रदेश अध्यक्ष चुन लिया गया है। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं मप्र भाजपा चुनाव पर्यवेक्षक कलराज मिश्र भोपाल में इसकी घोषणा की। प्रभात का प्रदेश
 
lokendra singh rajput
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जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा जी की याद में..

एक दिन मैं अपनी पुरानी डायरियों के पन्ने पलट रही थी कि अचानक मेरे हाथ 1983 की डायरी लगी। मन पुरानी यादों में खो गया। मेरे एक भाई बम्बई में पिताजी के साथ रहते थे और जब भी दिल्ली आते तो रेलवे स्टेशन से ओम प्रकाश शर्मा जी का उपन्यास रास्ते
 
प्रकाश टाटा आनन्द
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... और जीत गए जंग

हम सदा एक ही रोना रोते रहते हैं कि इस समय मैं कौन किसके लिए क्या करता है? सब अपने-अपने लिए जीते हैं। हकीकत में यह पूर्ण सत्य नहीं है आज भी दुनिया में कई लोग मौजूद हैं जो निस्वार्थ भाव से सेवा कार्य करते हैं। असल में उसमें उन्हें जो मजा आता है सुख मिलता
 
lokendra singh rajput
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भागना परछाइयों के पीछे-पीछे…

छुटपन में, जब पेड़ों की परछाइयाँ धूप से लड़ते-लड़ते, शाम को थककर ज़मीन पर पसर जाती थीं, तो हम उनकी फुनगियों पर उछल-कूद मचाते थे और कहते थे “देखो, हम पेड़ की फुनगी पर हैं”—बचपन कितना मासूम होता है, परछाइयों से खेलकर खुश हो लेता है. पर,
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मॉम यू आर टू गुड..............;;

शीर्षक से ही समझ गए होंगे कि मैं बच्चों की बात कर रही हूँ। जी सही समझा। कल मैं अपने कम्प्यूटर पर कुछ टाइप कर रही थी...........पता ही नही चला कि मेरे बेटे मेरे पीछे खड़े बहुत ध्यान से देख रहे हैं। ऐसा आम तौर पर होता नहीं है क्योंकि कुछ मिनट तो क्या कुछ पल
 
Shikha Deepak
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चलत की बेरिया

हमारा देश दार्शनिकों का देश है, दर्शन का देश है. दर्शन यहाँ के जनमानस के अन्तर्मन में समाया हुआ है, जनजीवन में प्रतिबिम्बित होता है. कुछ लोग कर्मवादी हैं, तो कुछ लोग भाग्यवादी. पर समन्वय इतना कि कर्मवादी लोग भी भाग्य पर विश्वास करते हैं…और
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अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (2.)

मेरे और अम्मा के अघोषित युद्ध में अक्सर दीदी शान्ति-स्थापना का असफल प्रयास किया करती थीं. वो एक ओर मुझे समझाती कि अम्मा तुम्हें बहुत प्यार करती हैं, बस दिखाती नहीं हैं, दूसरी तरफ अम्मा से कहती कि ज्यादा मार-पीट से गुड्डू और ढीठ होती जायेगी. न मुझे दीदी
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याद आता है.............

याद आता है.......याद आता हैवो माँ का लोरी सुनानाकल्पना के घोड़े परपरियों के लोक ले जानाचुपके से दबे पांवनींद का आ जानासपनों की दुनियाँ मेंबस खो जाना ...खो जाना...खो जाना..................याद आता हैवो दोस्तों संग खेलनाझूले पर बैठ करहवा से बातें करनाकोमल
 
सुमन'मीत'
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अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (1.)

मैंने जब से होश सँभाला, अपने और अम्मा के बीच एक अजीब सा तनाव पाया. शायद इसका कारण मेरा छोटा भाई रहा हो, जिसकी वजह से मैं “दुधकटही बिटिया” बन गई थी या शायद कुछ और, पता नहीं, पर हम दोनों में कभी पटी नहीं. मैं जब कुछ महीने की थी, तभी मेरा भाई
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उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (3.)

मेरी अम्मा अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थी. सिर्फ़ पाँचवाँ पास थीं. पहले लोग अपनी लड़कियों को अक्षरज्ञान करा देते थे, जिससे कि वे चिट्ठी लिख सकें. अम्मा को भी चिट्ठी लिखने भर की शिक्षा मिली थी. पिताजी जब उन्हें साथ लेकर आये तो पढ़ाना शुरू कर दिया. अम्मा का जी
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मैं, मेरा दोस्त, कॉफ़ी और इलाहाबादी जोड़े : दो दृश्य

जो लोग मेरा ब्लॉग पिछले कुछ दिनों से पढ़ रहे हैं, उन्हें ये टॉपिक अटपटा ज़रूर लगेगा, पर मैं उन्हें आश्वस्त कर दूँ कि अम्मा-पिताजी पर मेरी श्रृँखला आगे की पोस्ट में चलती रहेगी. ये विषय परिवर्तन दरअसल, न्यायालय के एक फ़ैसले और एक विवादित फ़िल्म पर आजकल चल
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yadein

चलो अब यादगारों कीपुरानी कोठरी खोलेंकभी कुछ याद करने कोएक चेहरा हो जाए!कुछ वर्ष पहले लड़कों की शादी में सेहरा लिखा या लिखवाया जाता था । घर का कोई रिश्तेदार या दोस्त यदि कविता लिखना जानता था तो सेहरा वही लिख देता था नहीं तो बाहर किसी और से लिखवा लिया जाता
 
smritiyan
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उनकी ज़िंदगी के वो रूमानियत भरे दिन (2.)

हिन्दी सिनेमा का स्वर्णकाल (पचास और साठ के दशक) पिताजी के जीवन का भी स्वर्णकाल था क्योंकि वे उस समय युवा थे और नयी-नयी शादी हुयी थी. अपने खानदान क्या, पूरे गाँव में अपनी पत्नी को अपने साथ शहर लाने वाले पिताजी पहले युवक थे. नहीं तो उस समय पिया लोग कमाने
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उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (1.)

पिताजी ने पढ़ाई पूरी करते ही घर छोड़ दिया था. वे वहाँ से बाहर निकलकर कुछ करना चाहते थे और अपनी ज़िन्दगी अपने ढंग से जीना चाहते थे. गाँव की कुरीतियों और अन्धविश्वासों से उनका मन भी ऊबा था. फिर तब खेती में बहुत श्रम करने पर भी कम आय होती थी और सिर्फ़ लोगों
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पिताजी का बचपन (2)

पिताजी के बचपन में देश में विद्यालयों की संख्या बहुत कम थी. उन्हें खुद लगभग दस किलोमीटर दूर पढ़ने जाना पड़ता था. रास्ते में एक नदी और उसके किनारे श्मशान पड़ता था. वापस लौटते-लौटते अंधेरा हो जाता था. पिताजी के साथ के लड़के सारे रास्ते हनुमान चालीसा पढ़ते
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पिताजी का बचपन (1)

मेरे पिताजी के बारे में लोग कहते थे कि वे अपने समय से पचास साल आगे की सोच रखने वाले इन्सान थे. बहुत ही खुले विचारों के, तार्किक, बुद्धिवादी, बेहद लोकतान्त्रिक, मस्तमौला और फक्कड़ किस्म के आदमी थे. वे नास्तिक थे. मतलब, ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे. ये
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यूं ही कभी !

कुछ पल दोस्ती के नाम यूं ही कभीइन बन्द आखों मेंआती है सामनेकुछ बीती यादेंकुछ जीये हुए पल;वो हंसना वो रोनाउठकर रातों कोबातें सुनानायाद है आताअब इन दिनों मेंजीकर जो गुजर गयाबीते हुए दिनों में;हर पल दिल मेंकसक सी उठती हैकाश होते पास वोजिनसे अब दूरी है;हर
 
सुमन'मीत'
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रंगोली

अनमना सा मैं। डूबा तो अपने शहर के उन दिनों तक जा पहुंचा जो दिलोदिमाग में जड से गये हैं, पिघला तो पिघलता ही चला गया। होता है कभी कभी ऐसा भी। फिर शब्दों ने नहीं देखा कि उसकी बनावट कैसी है, वो किस रूप में हैं। जब यथार्थ के धरातल पर आकर शब्दों की ओर नज़र गईं
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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बिग बी और मैं !

यह शीर्षक भ्रामक है. इससे यह आभास हो सकता है कि मैं बिग बी यानी अमिताभ बच्चन के साथ किसी फिल्म में काम कर रहा हूं या फिर उनकी किसी फिल्म की पटकथा लिख रहा हूं. ऐसा कुछ भी नहीं है. पत्रकार हूं. लेकिन फिल्म की पटकथा लिखने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है.
 
प्रभाकर मणि तिवारी
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नहीं लडूंगा अब अकेले....

समाज क्या होता है? क्यों समाज में उठना-बैठना चाहिए? क्यों एकांकी जीवन सदा आनंददायक नहीं होता? दो-तीन दिन में सही अर्थ समझा इन बातों का। हमारे बुजुर्ग जो भी कह गए हैं सौ फीसदी सही कह गए हैं। उन्होंने यूं ही धूप में बाल सफेद नहीं किए थे मान गए गुरू। अब
 
lokendra singh rajput
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'मुश्फिक' की फिक्र

जी हां, गज़ल को लेकर पत्र-पत्रिकायें थोडी कंज़ूस तो रहती हैं किंतु गज़ल निर्बाध रूप से बह रही हैं, इसे भी स्वीकार किया जाना चाहिये। मुझे लगता है कि गज़ल को अपनी दिशा का भान है। उसके अपने दीवाने हैं। वर्ग विशेष होने का यह फायदा भी है कि उसके रूप, रंग, उसकी
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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'मुश्फिक' की फिक्र

जी हां, गज़ल को लेकर पत्र-पत्रिकायें थोडी कंज़ूस तो रहती हैं किंतु गज़ल निर्बाध रूप से बह रही हैं, इसे भी स्वीकार किया जाना चाहिये। मुझे लगता है कि गज़ल को अपनी दिशा का भान है। उसके अपने दीवाने हैं। वर्ग विशेष होने का यह फायदा भी है कि उसके रूप, रंग, उसकी
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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मां-बाबा- आज तुम्हारे लिये- रवीन्द्र संगीत

एक पूरी ज़िंदगी के कुछ लम्हों को जी लेना ही कितना मुश्किल होता है, वहीं आज एक बहुत प्यारे जोड़े ने ऐसे कई सुनहरे लम्हों को साथ गुज़ारते हुये अपने ५०वें साल में प्रवेश किया है- मेरे मां-बाबा।  आज २६ जनवरी को उनकी शादी की सालगिरह है। बचपन से ही मां को
 
मानसी
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आखिर कब तलक कहेंगे शहीदों को आतंकवादी....

आज फिर से वो दिन याद आ गया। वही दिन जब मैंने पहली दफा दिल्ली में कदम रखा था। तब मैं सूर्या फाउंडेशन के सौजन्य से दिल्ली दर्शन कर रहा था। दिल्ली दर्शन के दौरान हम पहुंचे त्रिमूर्ती म्यूजियम में। जहां जवाहरलाल नेहरू जी से संबंधित सामग्रियों का संग्रह किया
 
lokendra singh rajput
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कुछ बिछड़े हुए दोस्त!

सियालदाह से मुझे एअरपोर्ट जाना था, बाकियों को हावड़ा स्टेशन।बाकी यानी सौगत, विकास, एमएसआर। सौगत और विकास मुंबई जा रहे थे, एमएसआर चेन्नई। मेरी हैदराबाद की फ्लाईट थी।मुझे एअरपोर्ट की टैक्सी में सौगत ने इतनी जल्दी बिठाया कि ठीक से अलविदा कहने का मौका भी
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बहुत कुछ पाया २६ वें साल में...

Lokendra Singh Rajputमकर संक्राति पर्व के दिन २६ बसंत पार कर चुका हूं। साथी पार्टी लेने की जिद पर अड़ गए। लेकिन, मुझे इस दफा पार्टी देने का कोई कारण नजर नहीं आया। अच्छा मेरा ऐसा कोई ऐसा दोस्त सामने नहीं आया जिसे असल में मेरे जन्म दिन की खुशी हो। अगर ऐसा
 
lokendra singh rajput
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यादें..याद आतीं हें

आज नए साल को शुरू हुए पूरे ११दिन हो चुके हैं.......वैसे तो लोग साल के आखिरी दिनों में ही साल भर का लेखा-जोखा कर लेते हैं.....लेकिन साल के आखिरी दिन मेरे लिए व्यस्तता से भरे हुए रहे.....ऐसा नहीं है कि मैं पार्टी कि तैयारियों में लगी थी....क्यूंकि मैं नए
 
Neha
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चक्रव्यूह..

बेकार सवालों के चक्रव्यूह में फंसे हुए थे हम एक- दूजे से परेशां पर एक- दूजे की आदत बन चुके थे हम खुशियों का काफ़िला हमें कभी मिला ही नहीं और न चाहते हुए भी साथ हो लिए गम बरसों साथ दिया और लिया एक- दूजे का फिर भी लगने लगा था यूँ जैसे अजनबी हैं हम तुम्ह
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राहें जो वफ़ा करती..

तकदीर की चोखट पे बिन दिया जली एक ज्योति राहें जो वफ़ा करती मंजिल न खफा होती थम जायें जो ये आंसू बन जायेंगे ये मोती लम्हे जो संभल जाते सदियाँ न फ़ना होती काँटों भरे रस्ते पर चलना है एक चुनौती सपने न बिखरते तो उम्मीद भी न खोती मिल जाते ग़र हम-तुम तो दाम
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बढ़्ते फासले...(कविता)

ऐसा ही तो कहा था कि बस अभी-अभी आता हूं मम्मी-पापा से लेकिन न जाने 'अभी-अभी' ने कितना फासला बना दिया कि वो जो सफर शुरू किया था खत्म होने का नाम ही नहीं लेता बार-बार पीछे की ओर लौटना चाहता हूं, और सोचता हूं कि खिलौने में भरी चाबी की तरह यह फासला भी खत्
 
राहुल सि‍द्धार्थ
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बना कीर्तिमान समीर लाल जी शीर्ष पर, हम भी बने सात हजारी ब्‍लागर

कल नीरज भाई से बात चीत रही थी, उन्‍होने कहा कि उन्‍हे यह ब्‍लाग बहुत अच्‍छा लगता है। वैसे इस ब्‍लाग को पंसद करने भाईयों की कोई कमी नही है। आम तौर पर अविवाहित भइयों में प्रतीक भाई, श्रीश भाई (आजकल लुप्‍त है) अविवाहितो को छोडि़ये विवाहितों में भी पंकज
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शंकर दा

शंकर दा नहीं रहे मुनिया।" "ओह" शंकरदा की उम्र हो चुकी थी। अभी-अभी मिल के आ रही हूँ उनसे चन्दननगर के इस बार के विज़िट के दौरान। शंकर दा मेरे पिताजी से दो-तीन साल बड़े थे। मेरे परदादा जी डाक्टर थे और प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लिया था उन्होंने। उनकी बाद मे
 
मानसी
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30 साल लंबा इंतज़ार... और आंसुओं की बाढ़

जिंदगी में बहुत-सी चीज़ों को नहीं समझ पाया। प्यार भी इन्हीं में से एक है। प्यार में हमें बेइंतहा तकलीफ होती है, दुनिया-जहान की परेशानियां सामने आती हैं, इस ख्याल के अलावा हर चीज़ बेजान-बेकार-सी लगने लगती है। इस पर भी अंजाम मन-मुताबिक सुकून देने वाला
 
आलोक सिंह भदौरिया
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30 साल लंबा इंतज़ार... और आंसुओं की बाढ़

जिंदगी में बहुत-सी चीज़ों को नहीं समझ पाया। प्यार भी इन्हीं में से एक है। प्यार में हमें बेइंतहा तकलीफ होती है, दुनिया-जहान की परेशानियां सामने आती हैं, इस ख्याल के अलावा हर चीज़ बेजान-बेकार-सी लगने लगती है। इस पर भी अंजाम मन-मुताबिक सुकून देने वाला
 
आलोक सिंह भदौरिया