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एक खत

बडे भैया लौट आओ अब अपना भी गांव कोई बुरा नही बड्की भाभी के पांवो की रुनझुन बडे उदास है तुम्हारी बिन तुम्हे ही ढुंढते है हर पल हर दिन ! गांवभर के बच्चे जवार भर की गाये आंचल मे सहेजे वह ठंडी हवाये कर रही तुम्हारी प्रतीक्षा लौट आओ अब ! हल वे अब भी चडमडा
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तुम याद आई इतना

जिंदिगी का हर पल , सदियों में बदल गया, तुम याद आई इतना ! एक बूंद की प्यास में, मैं सागर पी गया, तुम याद आई इतना ! -प्रवीण
 
प्रवीण
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हिंदी में मनीषी परंपरा की अंतिम कड़ी थे गुणाकर मुले

गुणाकर मुले भी चले गए। दीवाली से एक दिन पहले- शुक्रवार को। उसी दिन उनकी अंत्येष्टि भी हो गई। मुझे अगले दिन, एक हिंदी दैनिक के अंदर के पृष्ठ पर नीचे एक कोने में छपी खबर से जानकारी हो पाई। कई मित्रों से फोन पर दरियाफ्त किया। उन्हें भी कोई सूचना नहीं थी
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