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यात्रा और उसके बाद

'कर्मनाशा' पर लगभग महीने भर बाद वापसी हो रही है. कल सत्रह दिनों की यात्रा के बाद विराम पाया और खूब जी भरकर सोया. २३ मई की सुबह घर से निकलना हुआ था और ९ जून को वापसी हुई.इस बीच लिखत - पढ़त के साथ खूब घुमक्कड़ी भी हुई. जहाँ एक ओर धूप और घाम के साथ लू के
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ऐ लड़की – महेन्द्र नेह – कविता पोस्टर

ऐ लड़की – महेन्द्र नेह ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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"मौसम" पर एक कविता

सूरज तपता, धरती जलती गरम हवा जोरों से चलती तन से बहुत पसीना बहता हाथ सभी के पंखा रहता आरे बादल, काले बादल गरमी दूर भगा रे बादल रिमझिम बूँदें बरसा बादल झम-झम पानी बरसा बादल ले घनघोर घटायें छाईं टप-टप, टप-टप बूँदें आईं बिजली लगी चमकने चम्-चम् लगा बरसने
 
Vibha Rani
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तुम्हारा आना

एक सच्चा प्यार किस तरह से किसी के अन्दर पूरी इन्सानियत के प्रति आस्था पैदा कर देता है...इस बात को व्यक्त करती सात साल पहले लिखी एक कविता...) तुम्हारा आना मेरी ज़िन्दगी में तुम्हारे आने से कुछ बदल गया है बदल गये हैं गीतों के मायने वो मन की गहराइयों तक
 
mukti
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पतझड़ का सिलसिला थमता नही !

चील से उडते हैं मौसम जैसे झपट्टा मारने को हों अलसायी पडी जिंदगी सुखती रहती है टहनी पे, जम्हाई लेती दुपहरी के रोशनदानो से झुलसी हुई हवा का आना जाना लगा रहता है दीवारे तपने लगती है अल्लसुबह से भीतर ही भीतर धाह मारती रहती है भिंगोता हूँ, पानी छिडकता हूँ
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मौसम विभाग से मौसम मजाक कर रहा है

लगता है मौसम और मौसम विभाग में छत्तीस का आंकड़ा है। मौसम विभाग कुछ भविष्यवाणी करता है और मौसम कुछ और गुल खिलाता है। पहले अप्रैल के महीने में मौसम विभाग  ने कहा कि इस बार देश में अच्छी बारिश होगी तो मौसम ने मानसून को ही देश से गायब कर दिया। इधर म
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चाहो तो घर आ जाओ...

"एक बेवफ़ा के नाम..."क्यों खेलते हो? जल जाओगे!इक आग है 'विनय'तरक़ीब पे तरक़ीब खेलते होकुछ और है 'विनय'तुमने अभी 'विनय' को जाना है'विनय' के दर्द को नहीं'विनय' इक आईना है टूटा हुआजिसमें जगह मौसमे-सर्द को नहींदूर रहने वाले भले 'विनय' सेक़रीब आने वालों को दर्द
 
Vinay Prajapati 'Nazar'
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वह कौन है?

जिससे दुनिया ने हर चीज़ छीनीजिसे अपनी चाहत न मिलीजिसके दरवाज़े पर खु़शी आकर लौट गयीजिसकी आँखों से नमी सूख गयीजिसकी तरफ़ कोई नहीं देखताजो महफ़िल में तन्हा बैठता हैजिसके दिल में दर्द का दरिया हैजो बेरोज़गार इश्क़ से घूमता हैअजनबी है जिससे हर मौसमजिसके पास कोई
 
Vinay Prajapati 'Nazar'
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feminist poems

अबकी सावन मेंनहीं आयी हथेलियों सेमेहंदी की खुशबूनहीं बरसे बादलझूले नहीं पड़े पेड़ों परअबकी सावन मेंनहीं जा सकी घररोजी-रोटी के चक्कर में
 
mukti
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सावन की पहली बारिश, चलो थोड़ा रुमानी हो जाएं

बारिश में भीगने का एक अलग आनंद होता है उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता और जो कर पाता है वो कवि बन जाता है। ये एक ऐसी अनुभूति है जो आपको अंदर तक भीगो कर रख देती है। सावन के तीसरे सोमवार को २००९ की पहली बारिश हमारे यहां पर हुई। इससे पहले बारिश तो हुई
 
Nitish Raj
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बारिश थमी तो नक्सली करेंगे अटेक

प्रदेश में इस बार बारिश कम होने की संभावना है। इससे यह अनुमान है कि नक्सली हमलों में बढ़ोत्तरी कर सकते हैं। नक्सल आपरेशन से जुड़ेअधिकारियों का मानना है कि बरसात के तीन महीने नक्सली चुप बैठते हैं। इसके पीछे बस्तर के नदी नालो में उफान और जंगलो में पानी भर
 
bhart yogi
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मौसम किसी का उधार नहीं रखते

ये बारिश कहीं और की थी...बर्फ़ भी शायद यहां की नही थी....किसी और जगह बरसना और बिखरना था इन्‍हें...। तो यहां क्‍यों आए....हां शायद कोई उधार बाक़ी रह गया था किसी का...ज़रूरी नहीं है कि भीगकर और छूकर ही कहा जाए कि मौसम किसी का उधार नहीं रखते...यूं भी सम
 
शायदा
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