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मुड़ मुड़ के देखता हूँ-राजेंद्र यादव

मुड़ मुड़ के देखता हूँ.... राजेंद्र यादव जी की ये आत्मकथा पढ़ने का मन हुआ मेरा मन्नू भंडारी की आत्मकथा एक कहानी ये भी पढ़ने के बाद। चूँकि राजेंद्र यादव की आत्मकथा पहले लिखी गई थी और मन्नू जी की बाद में तो सोचा पहले इस की चर्चा कर लें। मगर ये भी सच है कि
 
कंचन सिंह चौहान
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पुस्तक एडविना और नेहरू के बहाने गाँधी विमर्श

बहुत दिनो से ये पोस्ट लिखनी थी, लेकिन आज लिख ही गई इस लिये क्योंकि डॉ० अनुराग की पोस्ट पढ़ने के बाद इस किताब का बहुत कुछ अलिखित समझ में आया.....! चार दिन के वैचारिक उथलपुथल के बाद आज ये पोस्ट लिखने को मजबूर हूँ। अनुराग जी की पोस्ट पर कमेंट नही दिया, क
 
कंचन सिंह चौहान