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'मैं ज़मी हूँ'

मैं ज़मी हूँ, मेरी मिटटी से तन बनते हैं,घर बनते, शहर बनते, वतन बनते हैं,खेत उगते हैं, बाग़ ओ चमन बनते हैं,बुत बनते , तो कहीं ताज महल बनते हैं,सर उठाये हुए पर्वत , सभी मुझसे हैं बने,लहलहाते हुए दरख़्त भी, मैंने हैं जने, मैं हूँ ज़िंदा, सांस लेती
 
योगेश शर्मा