विद्वानों का मानना है कि कानून बनता ही तोडऩे के लिए है। हालांकि मैं विद्वान नहीं हूं, लेकिन इस दर्शन में सौ फीसदी विश्वास करता हूं। वैसे, इसमें अविश्वास करने लायक कुछ है भी नहीं। सुबह से शाम तक सड़क से संसद तक इस देश में कानून का जितना पालन नहीं होता है,
पिछली पोस्ट से आगे --- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला देखने का अपना द्विदिवसीय कार्यक्रम आख़िर कामयाब रहा। द्विदिवसीय इसलिए की एक दिन तो मेले में एंट्री करने का जुगाड़ करने में ही निकल गया। हालाँकि मैं तो रिसर्च कहूँगा । हुआ यूँ की पहले दिन जब हम मेला प
२१ वीं सदी के पहले दशक के नौवें साल के ग्यारहवें महीने का आज २८ वां दिन है। नए मिलेनियम की इस अवधि में मैंने इतने मुकाम हासिल किये, की कभी कभी ख़ुद को ख़ुद से रश्क होने लगता है । लेकिन दो नाकामियां ऐसी रही की दस बार कोशिश करने पर भी कामयाबी हासिल नही