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टोहते

चाहें तो रूख़ कर लें अपनी -अपनी देहरियों काचाहे तो भटकन ही बना लें शेष जीवन का उद्देश्यजो भी हो ,जो भीपर तय कर लेंकर लें सुनिश्चित क्योंकिजीवन में इत्मीनान बहुत ज़रूरी है ......... ...... ... .बरसों बाद ख़ुद को टोहतेअपने निपट एककाकीपन में जाना के तुम्हारे
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रंग डालूँ एक लैंडस्केप

कलेजे में धुआँ-धुआँ सर्दियों का अलावपलकों में चौथ का चाँद होजी में हो कोहरे से नहायी काची- काची धूपहवा में, उड़ती-बिखरती मार्च की मदमाती महीन गंध ..गले में हों सोहनी के उनींदे सुरतबीयत ज़रा-ज़रा गिलहरी सीमन में जलते-बुझते मोरपंख रहेंहोंठों पर व्याकुल हो
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तीस पार

तीस पारपहली बारएकाएक उठाघुटने का दर्दतकलीफ के साथमुस्कुराहट भी खींच लाया चेहरे परके लो ,समय हो गयासम्हलने का
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सुना है मरने से ज़रा पहले---

किस कदर पराये - उदास हो जाते हैं वो दरीचे , वो ज़मीन जिनसे पहरों पहर रही हो आशनाई कभी ... सहर से ज़रा पहले रात के आख़िरी पायदान पर बजे वारिस शाह की हीर कहीं या लहरे वायलन पर राग " सोहनी " दोनो ही सूरतों का हासिल एक- सुरूर एक... बिस्तर पर बेसबब देह क़तरा