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शीशा और लोहा ------ चार मुक्तक ----- यशवन्त मेहता "यश"

मुक्तक  १शीशे के सपने मत सजाओपल भर में चूर हो जायेंगेलोहे के सपने सजाओतूफानों में भी टूट न पाएंगेमुक्तक २मुकाम हासिल उन्हें ही होते हैंलोहे के सपने जो सजोते  हैंवो अपनी किस्मत पर रोते हैंशीशे के सपने जो सजोते हैंमुक्तक ३शीशे के घर में नहीं
 
यशवन्त मेहता "यश"
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....तेरे प्यार की महिमा हैं.....अब पता चला किस काबिल हूँ मैं....

... सब यूँ देखते हैं जैसे कि कोई कातिल हूँ मैं .........तेरे प्यार की महिमा हैं....अब पता चला किस काबिल हूँ मैं.........तेरे गम के दो जाम लू तो कहते हैं शराबी हूँ मैं........तेरे प्यार की महिमा हैं....अब पता चला किस काबिल हूँ मैं........तेरी तस्वीर को
 
यशवन्त मेहता "फ़कीरा"
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बोतल में घुसने वालो को फ़लक छोटा ही नजर आता हैं

अब क्या कहें उनको वो पी कर बहक जाते हैं मय की खुमारी में बोतल में घुस जाते हैं  ख़ुदी से भरे हुए ख़ुदाई  सिखाते  हैं  जब बोतल से निकल नहीं पातें चिल्ला चिल्ला के सबको बोतल में बुलाते हैं जो बोतल में आ जाये  तो उसे सबका यार बताते
 
यशवन्त मेहता "फ़कीरा"
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अजनबी

अनजानी डगर पर मिला था "अजनबी"दिल तोड़ गया आज शाम को शिकयत करें भी अगर हम उसकी जुबान पर लायें किस नाम कोशर्म कहाँ बची हैं "दिल्ली वाले" मेंचांदनी चौक में बेच कर आ गया मुर्ख प्राणी भटकता भावुकता लिए अन्धकार में"अजनबी" सीने पर गरम लोहा चिपका गया हाय हाय करता
 
यशवन्त मेहता "फ़कीरा"
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तेरे हुस्न ने मोहब्बत को मेरे दिल का पता दिया -------- (फ़कीरा)

तेरे हुस्न ने मोहब्बत को मेरे दिल का पता दिया मेरी उलझी जिन्दगी को तेरी उलफ़त ने सुलझा दिया तेरी मोहब्बत के आफ़ताब ने हर सुबह को खिला दिया मेरी दीवानगी के माहताब ने हर रात को शायराना बना दिया रुख से नक़ाब की बेवफ़ाई ने मुझे तेरा दीदार करा
 
यशवन्त मेहता "फ़कीरा"
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वो इक सिगरेट ओंठो तले दबा लेते हैं ------- ( यशवंत मेहता)

रोज सड़क पर चलते हुए न जाने कितने लोग सिगरेट के कश लगाते मिलते हैं. इतना प्रचार होता हैं, इतने लोग उन्हें सिगरेट के नुकसान बताते हैं. वो खुद भी जानते हैं कि उनके हाथ में धीमे जहर की डंडी सुलग रही हैं जो उनके लिए खतरनाक हैं. फिर भी क्यूँ सुलगाते हैं वो
 
यशवन्त मेहता "फ़कीरा"
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सपने जो मेरे हैं उन्हें हाथो में ले ......नहीं तो पांव तले कुचल दे (फ़कीरा)

नसीब में या तो तू हैं या फिर तेरी जुदाईहाय!!! अगर जुदाई हैं तो मैं जी नहीं पाउँगाऔर अगर तू हैं तो ख़ुशी से ही मर जाऊंगा_________________________________________________________________इतना कहा मैंनेदो लफ्ज़ जानेमन तू भी बोल देसपने जो मेरे हैं उन्हें हाथो
 
यशवन्त मेहता "फ़कीरा"
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मेरा मुट्ठी भर आसमान......फिर फिसल गया

उड़ते हुए पंछी को काला बादल निगल गयामुट्ठी भर आसमान......फिर फिसल गयामरुस्थल में मृग फिर प्यासा ही मर गयासपनो का किला......फिर रेतीला हो गया
 
यशवन्त मेहता "सन्नी"
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मेरा मुट्ठी भर आसमान......फिर फिसल गया

उड़ते हुए पंछी को काला बादल निगल गयामुट्ठी भर आसमान......फिर फिसल गयामरुस्थल में मृग फिर प्यासा ही मर गयासपनो का किला......फिर रेतीला हो गया
 
यशवन्त मेहता "सन्नी"
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अरे कोई डंडा दो इस इश्क को पीटना हैं

अरे कोई डंडा दोइस इश्क को पीटना हैंबहुत घसीटा इसने मुझकोअब इसको घसीटना हैंरोज रात छत्त पर लेकर जायेऔर चंदा हमे दिखाए चंदा को देख हम रोने लग जायेयह किनारे-बाम बैठकर भुट्टे खाएबेवफाई से दुश्मनी हैं इसकीउसके चर्चे हर दम इसकी जुबान परशराबी आता हैं रोज हाथ
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शराब कब से बोतल में बंद पड़ी हैं.......अब वो मजा नहीं रहा पीने में.....

जालिम..... दिल भर सा गया हैं अब तो जिंदगी से....जीने की तम्मना और नहीं सीने में... शराब कब से बोतल में बंद पड़ी हैं.......अब वो मजा नहीं रहा पीने में..... जालिम..... तेरे नूर ने तो अँधा ही कर दिया था.....कुछ कदम न चला तो बच गया गिरने से तेरी चाहत ने दिल
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....तीर इश्क का जब चलता हैं न..... .....तब न तुम समझ आते हो....न ये इश्क समझ आता हैं....

....तीर इश्क का जब चलता हैं न..........तब न तुम समझ आते हो....न ये इश्क समझ आता हैं.......शोख हसीना तेरे हुस्न का नशा जब चढ़ता हैं न........तब न तुम समझ आते हो....न ये हुस्न समझ आता हैं...........सितम भी तेरा जब करम बन बरसता हैं न........तब न तुम समझ आते
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.....इतना ही काफी हैं...लतीफा बन हँसाने लायक तो हूँ.....

कहीं न कहीं तेरे खयालो में अब भी हूँ.........ठुकराया हुआ ही सही...तेरा आशिक तो अब भी हूँ...........तेरी आँखें नफरत से भरी हैं....मेरे लिए........नफरत ही सही....तेरे एहसान के लायक मैं अब भी हूँ..........किस्मत पर नाज हैं मुझे....तेरे चाहने वालो में किसी
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मेरे भीतर का शायर

पैमाना भी खाली मयखाना भी खाली खाली हैं....साकी भी खाली.. .. दीवाना रूठ गया जबसे मोहब्बत से...... तब से हैं सबकुछ खाली. *************************** अगले पल में जीना मानो इस पल की मौत पिछले पल में जीना मानो हर पल की मौत ***************************** बैचैनी
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.....शुक्रिया खुदा का.....कि....तू आयी मेरी जिंदगी में.....मेरी जिंदगी में...

कितनी गहरी तेरी आँखें.....कितनी प्यारी तेरी बातें.........बस इनही में डूबा रहूँ मैं...........शुक्रिया खुदा का.....कि....तू आयी मेरी जिंदगी में.....मेरी जिंदगी में...कितना सुन्दर तेरा चेहरा......कितना सुर्ख रंग तेरे गालों का..........बस इनही को देखकर
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....यहीं तेरे शहर में....

...मुसाफिर हूँ.. ....कुछ दिन के लिए ही रुका हुआ हूँ... ....यहीं तेरे शहर में.... ....दुआ कर... ...कि मौत नसीब हो.... .....खाक हो जिंदगी मेरी.... ....यही तेरे शहर में...... ....जनाजा गुजरे.... ...तो तेरे मकान के सामने से.... ....दो मोती तो गिरे किसी आंख