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एक बार फिर पितृ विहीन हो गया मैं

मैं एक बार फिर पितृ-विहीन हो गया, इसी नौ अप्रेल को। मेरे पूज्य पिताजी श्रीयुत पण्डित द्वारकादासजी बैरागी के देहावसान के कोई साढ़े सोलह बरस बाद।लेकिन आगे कुछ भी कहने से पहले स्पष्ट कर दूँ कि यह पोस्ट मैं पूरी तरह से केवल खुद के लिए लिख रहा हूँ। इसकी
 
विष्णु बैरागी
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हिन्दी का आश्वस्ति पुरुष

भगवान भला करे, कर सलाहकार इन्दरमलजी जैन वकील साहब का जो उन्होंने मुझे आयोजन का निमन्त्रण-पत्र दे दिया और मुझे अनामन्त्रित श्रोता होने से बचा लिया। यह निमन्त्रण-पत्र नहीं मिलता तो भी मैं उस आयोजन में जाता ही। आयोजन था - रतलाम चार्टर्ड अकाउण्टण्ट्स सोसायटी
 
विष्णु बैरागी
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मेरी ‘सच्ची-सच्ची’ भाभी

ईश्वर सब सुख एक साथ कभी नहीं देता। इसे चाहें तो ‘कोई न कोई कसर रख ही देता है’ कह दें या फिर यह कि वह किश्त-किश्त में सुख देता है। ऐसा ही इस बार मेरे साथ हुआ-तीन रात और लगभग सवा दो दिनों तक सुख सागर में गोते लगाने के बाद भी एक सुख की कसर रह गई।बरसों बाद
 
विष्णु बैरागी
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जैन साहब का पत्थर

जैन साहब जिस तटस्थ-भाव और अविचलित स्वर में बोल रहे थे, वह मुझे चकित ही कर रहा था। उनकी जगह मैं होता तो अपनी ‘वैसी’ सफलता पर पता नहीं क्या कर बैठता! पर जैन साहब अपनी व्यक्तिगत सफलता की सूचना सहज भाव से, संयत स्वरों में ऐसे दे रहे थे मानो किसी और के किए की
 
विष्णु बैरागी