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मौसम 5 मई

दूर बहुत दूरधरती के सुदूर कोनों में बसेज़रा -ज़रा पहचाने लोग,उनकेमृतप्राय रिश्तों में उठाहल्का सा स्पंदन…रोप गया मेरे मन की रुठी मिट्टी मेंउम्मीद का नन्हा हरियाला बिरवा …यहाँआस-पास नहींन सहीमै खुश हूँ कहीं तो मौन पे बौछारे हैंथमे हुए संवादों में बीजकहीं
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मारीच

अंत की ओरभर-भर चौकड़ीचला मारीचसानंदमृत्यु के निमंत्रण परमोक्ष की पुकार पेस्नेहसिक्तभरता कुलाचेराम नेह पगाराम मयराम के लिएसंजोयेअभंग,अखंड प्रेमप्रेमसींचता है,खींचता हैजन्म-जन्मान्तरनिरंतरअपनी ओर ……छली ,पातकी जग जाने……राम कथा सुनते-सुनते…हम जाने-प्रेमी
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घर /कुछ शब्द कुछ चित्र

चालीस कमरे ,चार ड्योढ़ियाँएक बाड़ी ,छह छतों वालेइस सवा सौ साल पुराने घर सेमेरा तेरह वर्ष पुराना नाता है ..यहाँ की देहलीज़ ने कभी किसी सेपरायापन नहीं बरता,उस वक्त भी नहीजब आलता भरे पैरों सेमैदे की रोटियों पे चलकरइसके देवता घर में नई दुल्हनों नेपहला कदम
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ओ छोटी कलियों इतनी नासमझी क्यों

आज बाग़ मे बड़े सबेरेउचक रही नन्ही कलिका कोपूरे खिले,युवा फूल से ज़रा ओट जो सरकायातुरत लचक वह टूट गयीझुक बैठी डाली के बीचगंध,रूप,रंग हीन ओ छोटी कलियोंइतनी नासमझी क्यों ?बीज रूप रोपा था तुमकोअभी समय था,बहुत समय तुम्हे सयानी होने में कल तड़के पूछूँगी फिर मैहाल
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तुम्हारे प्रेम में स्वार्थी हो कहती हूँ

तेज़ी से बदलते माहौल में आस-पास देखते भय लगता है… सायेदार दरख्त भी समय आने पर झुकते ,कमज़ोर पड़ते हैं ……हमनें जिनसे अथाह प्रेम किया उन्हे लाचार देखना पसंद नहीं करते । मुमकिन है उम्र के किसी पड़ाव पर खुद अपने लिये यही दुआ माँगूं ....कुछ दिन पहले लगा तुम ७० के
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मै इसकी पनाह में हूँ

ये दुःखदुःख सा नहीं हैहंसते -मुस्काते करवट दर करवटबड़े भीतर धसाँ साँस लेता है,ये दुख ओढ़ते-बिछाते शाना ब शाना साथ देता है ....ये दुःखदुःख सा नही हैज़बाँ पे मीठा ,तासीर में ठंडाछुअन मखमली,संदली अहसासरूह से पाक-साफ़..ये दुःखदुःख सा नहीं हैअकसर बिना जिस्म
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कुछ चित्र/गहरी होती परछाई

इन दिनों बगीचा पूरे शबाब पर है…मौसम बदल रहा है तेजी से …कुछ दिन पहले तक फूलों को सेंक देने के लिये गमले इधर-उधर किया जा रहे थे्…वहीं उन्हे अब तेज़ धूप से बचाने के प्रयास चल रहें हैं…कोशिश… कि बसंत कुछ दिन और बसा रहे/ठहरा रहे बगीचें में मेरे/आस-पास …धूप से
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हाजरी

पाँच लाख भक्त होते क्या हैदिखते कैसे और उनके इर्द-गिर्द महसूस कैसा होता हैये सारी बातें जहाँ पहली बार जान पाईउसी तीर्थ स्थल की बात करते-करतेएक मित्र बोल पड़ेआपको आधा दिन लगामुझे मात्र बीस मिनट में दर्शन हुएमै ज़्यादा सौभाग्यशाली हूँ ..मैंने सयंत स्वर में
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मौसम 6 सितम्बर 2009

काँच की खिड़कियों के पार दुकानों ,मकानों,घास और बगीचों पर एक ही रफ़्तार में मुसलसल गिर रही है बारिशदो दिनों सेबेहिसाब... हवा न जाने किस तर्ज़ पर काट रही है चक्कर गोल-गोल भेदती हुई दुछ्त्ती के परदे खड़खड़ाती गैरेज की छत… कुछ-कुछ देर में खिड़की से झाँकते हम खबर
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चौथ के चंदा सुनो तुमको हमारी सौंह लगे

दो बरस से बारिशों के कारण करवा चौथ का व्रत हम टीवी देख कर तोड़ते हैं ……हमारे यहाँ दूज,तीज सबका चाँद बड़ी रौनकों के साथ खिलता है…मगर चौथ के चाँद को आँखें तरस जाती हैं……सो एक नज़्म/फ़ितूर उनके नाम आह ! देखो तो खिला है चाँद कैसा तीज का चौथ का होता भला तो इस
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क्या कभी संभव हुआ ?

जहाँ हमे समृद्धि मिलीवहाँ लौटना निश्चित रहाकुछ और नया पा जाने-पी जाने को ……गुरू,माँ ,प्रकृति और ईश्वर के प्रति व्यक्त रहा आभार सदा ही नम आखोँ या मात्र मौन भर से……ऐसे ही लौट-लौट गुनने को विवश रहेकिसी बेकल कर देने वाली कविताया दिलासा देने वाली धुनपर