पसंद करें
0
नापसंद करें

नम हैं आज तक यादों के सूखे पत्ते

मुझे क्या हुआ है मुझे कुछ पता नहीं है क्या मेरे दर्दो-ग़म की कोई दवा नहीं है यह उदासियों की शामें बहुत उदास हैं मेरे नसीब में क्या मौसमे-वज़ा1 नहीं है आफ़त यह हम पर टूटकर आयी है इसे देखने को क्या कोई ख़ुदा नहीं है सब आश्ना आज ना’आश्ना2 बन गये हैं ऐ
पसंद करें
0
नापसंद करें

जो इश्क़ की आग भड़क उठी है

जो इश्क़ की आग भड़क उठी है जैसे मैं शोलों में जल रहा हूँ तेरे बदन की कशिश का है जादू देखकर तुझ को मचल रहा हूँ मुझे है ख़ाहिशो-तमन्ना1 तेरी मैं उम्मीद को मसल रहा हूँ एक यह ख़ाब मैं देखता हूँ कि तेरी मरमरीं बाँहों में पिघल रहा हूँ शब्दार्थ: 1.
पसंद करें
0
नापसंद करें

वह जब भी इस गली इस डगर आये

वह जब भी इस गली इस डगर आये मेरी ज़िन्दगी की सहर1 बनकर आये शबो-रोज़2 जलता हूँ मैं इन अंधेरों में वह मेरे लिए कुछ रोशनी लेकर आये आया था पिछली बार अजनबी बनकर अब कि बार वह मेरा बनकर आये हूँ बहुत दिनों से शाम की तरह तन्हा कोई मंज़र-ए-सोहबत3 नज़र आये दरवाज़े पे
पसंद करें
0
नापसंद करें

वह मुझको मुआफ़ रखे दुनिया के मामलों से

वह मुझको मुआफ़1 रखे दुनिया के मामलों से मैं अब कभी किसी और से इश्क़ न करूँगा दिल मेरा चाहे हो जाये टूटकर टुकड़े-टुकड़े इस ग़म में आँखों को तर ऐ अश्क! न करूँगा जो देखा है उस का चेहरा मैंने दो ही रोज़ इस बात का अपने ख़ुदा से रश्क2 न करूँगा मेरे दिल में है
पसंद करें
0
नापसंद करें

जो गुज़र गयी सो गुज़र गयी पुरानी बात थी

जो गुज़र गयी सो गुज़र गयी पुरानी बात थी उन आँखों में छिपी एक उजली रात थी जब देखा था मंज़रे-हसीन-हुस्न1 मैंने उस लम्हा चाँद था और सितारों की बरात थी साहिब हमें दाँव-पेंच नहीं आते इश्क़ में और वह प्यार की पहली दूसरी हर मात थी वह शब2 नहीं भूले जब घर आये थे
पसंद करें
0
नापसंद करें

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही मुझको मोहब्बत है’ तुम से ही नाज़ है तुम्हें’ थोड़ा ग़ुरूर मुझे मैंने दिल लगाया है’ तुम से ही आज न पिघला तो कल पिघलेगा यह बात हम सुनेंगे’ तुम से ही आज दूरियाँ हैं तेरे-मेरे बीच ज़रूर कल मिलेंगे’ तुम