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किस से कहें ?

तू कि इक गम था अब तलक मुझ को तू ने खुद ही बुझा दिया मुझ को तेरी हर बात मुबारक हो तुझे कहा कि इश्क ! और मिटा दिया मुझ को !! तेरी दुनिया ... जिन दोस्तों के लिए जीती है चलो मुबारक वो दो दोस्त आज से तुझ को वो जो हर बात पे तुझ को कहें कि मेरे "अज़ीज़" चलो अ
 
अमिताभ मीत
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बिंधे पँख में पँख सखी री

सुबह सुबह बगीचे का दरवाजा खोला तो ये कपोत बगल वाले घर के एसी की छत पर नज़र आये ...ये खेल रहे थे, स्नेह में थे अथवा झगड़ रहे थे इसकी व्याख्या न करते हुए मै बहुत देर तक इन्हें देखती रही ..कुछ देर बाद एक परिंदा उड़ गया ...मगर एक घंटे के बाद फिर मैने इन्हे
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क़िस्मत

अपनी नाकाम तमन्नाओं पर और इन टूटे हुए ख़्वाबों पर मैं भला रोऊँ क्यों, कि ये ही तो मेरे जीने के कुछ सहारे हैं तुम मुझे अपना प्यार दे न सकीं दौलत-ए-ग़म तो दिया है लेकिन और मुझे जन्नतों से बढ़ कर थे चंद वो लम्हे, तेरे साथ जो गुजारे हैं आरज़ूओं के ख्वाब वीराँ
 
अमिताभ मीत
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जानिब-ए-काबा चलो या सू-ए-मयखाना चलो

आज सात दिनों के बाद दफ़्तर गया .... तबीयत नासाज़ थी. वहाँ भी मन नहीं लगा ....... एक अजीब सी उदासी थी, जैसे किसी चीज़ की कमी हो. अजब सी बेखयाली का शिकार रहा, उसी बेखयाली में कुछ लिख गया ....... किसी क़ाबिल है या नहीं ..... इस का फ़ैसला आप पर .......सुन / पढ़
 
अमिताभ मीत
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शम्मः की मानिन्द जलते जाइये

शम्मः की मानिन्द जलते जाइये ज़ीस्त है आख़िर, पिघलते जाइये उनकी आंखों में कभी गर देखिये अश्क़, तो मोती में ढलते जाइये बारहा गिरिये मगर इस शर्त पर बारहा ख़ुद ही संभलते जाइये ज़िन्दगी कुछ इस तरह करिये बसर आग में सोने-सा जलते जाइये उनकी नज़रों को बदलता
 
अमिताभ मीत
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इबादत

एक काग़ज़ पे अयाँ नाम की सूरत देखा -तुझ को इस तरह भी देखा है बारहा मैं ने जैसे तू चंद लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं ....जैसे - जब चाहूँ, तुझे लिख सकूं, मिटा भी सकूं ...जैसे - जब चाहूँ, तुझे पढ़ सकूं, पढता ही रहूँ ..जिस तरह चाहूँ, तुझे समझा करुँ, तेरे वो
 
अमिताभ मीत
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ज़रा कर के दिखाये तो

ज़रा कर के दिखाये तो मुझे दिल से भुलाये तो चलो झूठे बहाने से ही आये, पर वो आये तो नई बातें तो की उसने ग़ज़ल भी पर सुनाये तो हज़ारों हाथ आयेंगे वो पत्थर को हटाये तो लड़े है सब मगर कोई नया मज़हब चलाये तो मैं उसको आँसू दे दूँगा मेरा मातम मनाये तो तमन्ना है सौ
 
Manoshi