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पीळियो और लिछमी

वो पल बहुत खूबसूरत रहा होगा, जब लिछमी की आंखों में खोकर पीळिये ने प्यार का इजहार किया था। उसकी उंगलियां लिछमी की कोमल हथेली में थी। हवा का पास से गुजरना भी तब साफ सुन रहा था। जाने क्यों वो तपता सूरज इतना ठंडा हो गया था। उसकी आग कहां खो गई, कोई नहीं जानता
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तेरी दुनिया

आज बहुत दिन बाद फिर अपनी एक छोटी सी रचना आपके सामने लेकर पेश हुआ हूँ आशा है की आप फिर वही और उतना ही प्यार देंगे  आपका पागल दीवाना दोस्त राहुल कुंद्रा जब तक रहे जिस्म बनके मस्सरत को तरसे और जब हुए लाश तो कफ़न-दफ़न को तरसे ऐ खुदा तेरी
 
Rahul kundra
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तन्हाई

नमस्कार दोस्तों मै हाजिर हूँ एक नई रचना के साथ नव वर्ष के बाद सन २०१० की प्रथम रचना मेरे काव्य जीवन की प्रथम रचना है।आज मै अपना मोबाइल नंबर इस रचना के साथ प्रदर्शित कर रहा हूँ कोई अगर मुझ से वार्ता करना चाहे तो वह मुझे ९५२८१९२९२९ या ९८३७५७२९२९ पर कॉल कर
 
अंकुर कुमार 'अश्क'
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व्यवस्था के नाम पर

अगर, मैं लीक पर चलूं तो वो खुश होंगे मेरी पीठ थप थपाएंगे क्योंकि ? ये उनकी व्यवस्था है सड़ी गली ही सही ।। अगर, मैं लीक से उठा लूं कदम तो वो भला बुरा कहेंगे धक्का देकर गिरा देंगे क्योंकि ? वो हमेशा ऐसा ही करते रहे हैं ।।
 
जितेंद्र भट्ट
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प्यार क्या है ?

एक' ----- 'प्यार' देह का आकर्षण है खूबसूरत चेहरा देखती हैं आंखें और दिल धड़कता है दिमाग सोचता है कई तरकीबें नजदीक जाने की कई चालें होती हैं इसमें और फिर... ।। ----- 'दो' ----- 'प्यार' सच है सबकुछ है बहुत खूबसूरत होता है अगर वो खूबसूरत नहीं तो भी सबसे
 
जितेंद्र भट्ट
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कुछ नहीं तुम कुछ नहीं करोगे

कुछ नहीं तुम कुछ नहीं करोगे  तुम केवल विष पीओगे और  आने वाली पीडियों को अपाहिज करोगे     कुछ नहीं तुम कुछ नहीं करोगे  तुम केवल कर बांधे खड़े रहोगे और दासता के अध्याय में एक पृष्ठ नया जडोगे           कु
 
Rahul kundra
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ये जो लिख रहा हूं मैं

क्या? ये गहरा प्रेम मेरा सार्थक हो पाएगा या यूं ही सदा शब्दों के फूल खिलाने होंगे।। क्या? तुम समझोगे इनके अर्थ ये जो लिख रहा हूं मैं इसका कुछ तो मतलब होगा या यूं ही अनजाने से पड़े रहेंगे / कागज पर चुपचाप।। मेरे मन के भावों की सीमा को नाप सकोगे क्या?
 
जितेंद्र भट्ट
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बस यूं ही...

कई दिनों से कुछ नहीं लिखा, तो बस यूं ही...उस घर लगी थी आग, और मैं यहां डरा था।तेरा दिया था जख्म, वो जख्म भी हरा था।छिप गया मैं जाकर, पीपल की आड़ में,अब भी वहीं खड़ा हूं, तब भी वहीं खड़ा था।।मद्धम है आंच उसकी, ठंडी है बिजलियां।शायद संभल भी जाए, वो पगली
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बादल पूछते हैं / मन का हाल

वहां बादल पूछते हैं / मन का हालहवा सहलाती है गालबारिश की हल्की-हल्की बूंदेंगीला कर देती हैं मनकोहरा ढक लेता हैमन के सारे ग़मपहाड़ों से ढलकती हुईगाय, भैंस और बकरियांबजाती हैं टुन-टुन, टन-टनबच्चे दौड़ते हुएचिल्लाते हैं हंसी की धुनवहां.... दूर.... पहाड़ की
 
जितेंद्र भट्ट
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सब याद है

ज़िंदगी के उन पुराने पन्नों मेंतुम भी होतुम्हारी यादें भीसारे पल सिमटे हैंकविता की शक्ल मेंचंद शेरों मेंतुम्हारे होने का अहसास है।।कुछ हंसते पल हैंकुछ बिखरते आंसू खूशबू है तुम्हारे होने का अहसास दिलाती हैज़िंदगी के उन पुराने पन्नों में ।। तुम हंसी बनकर
 
जितेंद्र भट्ट
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अभी बेबस हूँ

मेरी मौत की दुआए मांगी जा रही है पर जीना है मुझको कज़ा आने तक मुझ पर लगाने के लिए इल्जाम ढूंढे जा रहे है और कैद रहना है मुझे सज़ा पाने तक दोस्तों के बिच दम मेरा घुट रहा है साँस लेकिन लेनी है मुझे दुश्मनी की हवा आने तक ज़ख्म खाके अश्क पीके मै जिन्दा हू
 
Rahul kundra
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कभी यूं करना !

एक' झूठी चादर से ढककर क्यों ? पाप छिपाते हो क्यों ? सच को अंदर कर झूठ दिखाते हो क्यों ? गम के चेहरे पर हंसी लगाई है क्यों ? हंसते हो दिल में तन्हाई है ।। 'दो' बदला, उन सभी से लूंगा एक दिन जिनके कारण मिली रात मिली तनहाई ।। उनको दूंगा प्यार और चमकीली स
 
जितेंद्र भट्ट
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शब्द ऐसे हों

शब्दों, आडंबर छोड़ो अपने सच्चे-सरल-सीधे रुप में उतरो सरल अर्थ सादगी से भरे हों सीधे ह्रदय को छू लो।। शब्दों, घृणा त्यागो प्रेम रस बहाओ मधुरता भरकर कड़वाहट हर लो।।
 
जितेंद्र भट्ट
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मुझे मेरा माज़ी दिखता है

कुछ दिखता तो है जब देखता हूँ अपने माज़ी की तरफ़ कुछ टुकड़े है एक दिल के शायद कुछ ख्वाब है आधे जल कर बुझे शायद कुछ मरासिम भी है मरे हुए कुछ रंग भी है चेहरों पर आधे उतरे आधे चडे हुए कुछ अपने है कटघरे में खड़े हुए कुछ पराये है मुह फेर कर खड़े हुए इक चाँद है
 
Rahul kundra
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ये भी सबको कहां मिलता है ?

चलो जीतने दो उसको आज नहीं दौड़ना मुझको उसे खुश होने दो आज मुझे हार जाने दो ।। चलो रंग भर दो उसके फलक पर मेरे हिस्से के भी सारे मुझे थोड़ा सा काला और सफेद दे दो ।। सुर उसके कानों में भर दो सारेगामापा सारे मुझे सुनने दो वक्त की कड़वी तान ।। उसकी सुबह क
 
जितेंद्र भट्ट
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इंतज़ार

वक्त है... चलने दो उसकी आज नहीं तो कल ही सही कर लूंगा इंतज़ार सदियों तक देखूंगा राह बस एक बार कह दो आओगी तुम... एक दिन सौ साल बाद मेरे लिए ।।
 
जितेंद्र भट्ट
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क्या चुनोगे तुम ?

तुम गलत हो तुम सही नहीं क्या बात करते हो ? तुम्हें तमीज़ ही नहीं ! मेरी बात सुनो ध्यान से ऐसा करो, वैसा नहीं कान खोल कर सुन लो... तुम मैं जो कह रहा हूं। तुमसे कौन सा काम सही होगा ? इतने ढेर सारे शब्द हैं इससे भी अधिक हो सकते हैं लेकिन देते तो बस... द
 
जितेंद्र भट्ट
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'अभिलाषाओं' तुम धीरे चलना

अभिलाषाओं' तुम थम जाओ अपने पंखों को सीमा दो इक जीवन पथ पर दौड़ाओ तुमको देखा है खुले गगन में ऊंचा-ऊंचा उड़ते हो कभी-कभी तो टूट बिखर तेज़ी से तुम गिरते हो ।। 'अभिलाषाओं' तुम रुक जाओ अपनी सांसों पर हाथ रहे इतना चल कि / वापस घर की याद रहे अक्सर होता है द
 
जितेंद्र भट्ट
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पहाड़

पहाड़ / जब भी धूसर से नज़र आते हैं सोचता हूं / किसने किया ये सब ? किसने काटे पेड़ ? किसने हिलाए पहाड़ ? किसने मोड़ दिए नदियों के रास्ते ? एक दिन में नहीं हुआ / ये सब सबने थोड़ा-थोड़ा कुरेदा है इनको फिर दरक गए पहाड़ जहां कभी हरियाली थी आज धूसर उदासी ह
 
जितेंद्र भट्ट
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भीड़ तो बहुत है

भीड़ तो शहर में बहुत थी पर लोग दौड़ रहे थे दूर कहीं एक दो लोग दिखे वो सुस्ता रहे थे मैं भी वहीं बैठ गया शाम हो गयी कुछ उठकर चले गए और.... अब तक देखो हम दो ही हैं ।।
 
जितेंद्र भट्ट
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कैसा था कल का दिन ?

सुबह उठकर अख़बार खोला महिला को ज़िंदा जलाया था लोगों ने बांधकर । एक बच्ची जो सात साल की थी उस पर भी, वहशी नज़रें फिसल गयी अपनी वासना उतार दी बेदर्दी से मार डाला । दो सभ्रांत महिलाएं जो बूढ़ीं थी उन्हें भी मारा गया था जायदाद का चक्कर था, शायद लोगों ने
 
जितेंद्र भट्ट
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रास्ते नहीं बदलते

ये जो ज़िंदगी है हर रोज़ दिखाती है नए नए आदमी । रास्ते नहीं बदलते बदलते हैं आदमी ।।
 
जितेंद्र भट्ट
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अब कहां जाऊं ?

सोचकर घर से निकला, कि सैर दुनिया की कर आऊं पर चौक से घर लौट चला।।
 
जितेंद्र भट्ट
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जब मैंने प्यार किया

जब मैंने प्यार किया मैंने नहीं देखा वो कैसी थी ? पतली थी मोटी थी नाटी थी या फिर बहुत लंबी ? मैंने नहीं देखा जब मैंने प्यार किया। आंखे उसकी कैसी रही होंगी ? नीली हरी या गहरी काली ? मैंने नहीं देखा जब मैंने प्यार किया। वो कैसे चलती थी ? बलखाकर या लहराक
 
जितेंद्र भट्ट