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वातावरण की आवाज

अकेले में खुद को हँसते सुनकर वो काँप गया. वो खुद से ही डरने लगा. लेकिन कोई खुद से कैसे बचे? उसे बहुत हड़बड़ाहट हुई. किसी से बात करने की एक अजीब तड़प, जरूरत. जल्दी जल्दी में उसके हाथ से फोन भी नीचे गिर गया. फोन खरीदे हुए उसे एक ही महीने हुये थे. ज्यादातर
 
विकास कुमार
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वो औरत...

औरत अपनी बेटी का हाथ थामे सड़क के किनारे खड़ी थी। बच्ची से ज्यादा उत्सुकता उसकी आँखों में थी। बच्ची अभी इतनी बड़ी नहीं थी कि उसे माँ का आश्चर्य समझ आये। लेकिन औरत अपने अनुभवों की मारी थी। औरतों का काम तो रोटी बनाना होता है। कभी कभी सहेलियों से बातें कर के
 
विकास कुमार
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ऊबा हुआ उत्साह

ऊबे हुए उत्साह से बैठा हुआ इंसान ताकता है अपने लेख की ओर, मोहित होता है खुद ही और फिर खुद ही हँस देता है अचकचा कर शर्मा कर। ठहर ठहर के बढती उम्र अटक जाती है अचानक कहीं, जैसे अटक जाता हो कंप्यूटर धूल और वक्त खाकर। आलमारी पर पड़ी किताबें कभी कभी एक उदास
 
विकास कुमार
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झील वाली कहानी - दूसरा हिस्सा

(...पिछले अंक से जारी)थोड़ी देर तक लड़की झील से दूर चली गयी. किसी अज्ञात अंधेरे में अपने सिरे तलाशने जैसी कोई मुस्कान उसके चेहरे पर आयी. तत्क्षण ही चेहरे से उसे पोंछकर वो फिर से निर्विकार हो गयी. लड़का सहमा हुआ सा अपने बगल पड़े कंकड़ों में अपने हाथ फेरने लगा.
 
विकास कुमार
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झील वाली कहानी

पहले तो वह उसे चोरी से देखता रहा. सावधानी से. ऐसे जैसे उसकी देह को उसके नजरों की छुअन महसूस ही ना हो. फिर धीरे धीरे ढीठ सा हो गया. अब वह सामने पड़ी झील में चीड़ों की परछाई नहीं देख रहा था. वो सुंदर थी. ढलते सूरज की चमक उसके कंधे से झूल रही थी. जनवरी की
 
विकास कुमार
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त्याग अंक में पले प्रेम शिशु...

परीक्षित ने कार को अपने ऑफ़िस की पार्किंग में धीरे-धीरे मोड़ा और उसे निर्धारित जगह पर पार्क कर दिया। कुछ मिनट तक वह यूं ही कार में बैठा शून्य में ताकता रहा और फिर अनमना-सा कार से उतर कर ऑफ़िस की मल्टी-स्टोरी बिल्डिंग की ओर बढ़ गया। ऑफ़िस में अपने कमरे तक
 
ध्रुवभारत
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विश्वास प्रेम की आधारशिला है

सर्वेश सक्सेना समझ नहीं पा रहा है कि आज वैशाली इतना क्यों रोई और वह उससे इतनी नाराज़ क्यों है। लेकिन उसकी अंतरात्मा कारण जानती है और यह भी मानती है कि कारण वाज़िब है।धनाढ्य पिता की इकलौती संतान होने से जो गुण-दोष किसी में उत्पन्न होते हैं वे सभी सर्वेश
 
ध्रुवभारत
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स्लेटी कमीज़...

आज लिखने बैठा तो जो लिखा उसने कुछ-कुछ कहानी जैसा रूप ले लिया।ऊपर की शेल्फ़ पर रखे टिन के एक छोटे-से डिब्बे को दीपा ने उतारा और उसमें से बहुत संभालकर दो सौ रुपये निकाले। डिब्बे में बस इतने ही रुपये थे। ऐसा डिब्बा हर विवाहिता स्त्री के पास होता है
 
ध्रुवभारत