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शहर के पुल

शहर पटा पुलों सेआवाजाही भी बहुत पुलों परशहर को बाँटते नदी-नालेपता भी नहीं पड़तेनदी-नाले पता तो नहीं पड़तेलेकिन इस गुमनाम आवाजाही सेपता भी क्या पड़ता हैआते-जाते हैं लोगपता उनका भी नहीं पड़ताशहर है बड़ादरारें हैं चौड़ीपर पता नहीं चलतापुल पड़े हैं
 
नीरज कुमार झा
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दोमट पर पहली छिड़कन से !

सावन की रिमझिम बरखा ने, बिजली कोई गिराई है, जल की बूंद पड़ी उस तन पर, आँच यहाँ तक आई है। रवि तप से सुलगी वसुधा, आज भस्म है नवयौवन से, दोमट पर पहली छिड़कन से, कुछ जलने की बू छाई है।स्वधा की परतों को छुआ जो, सुर्ख लाल तप्त अधरों ने, अम्बु की शीतलता झुलसी,
 
राजेन्द्र मीणा
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विकास का पैमाना

विकास के कई मानदण्ड हैंसकल घरेलू उत्पादसकल राष्ट्रीय आयप्रति व्यक्ति आयमानव विकास सूचकांकधारणीय विकासऔर न जाने क्या-क्यादेश की ताक़त भी मापी जाती हैमहाशक्तिकामचलाऊ शक्तिबिना काम की शक्तिऔर सबसे ऊपरदेशों का भी श्रेणीकरण हैसफल और
 
नीरज कुमार झा
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अंत की शुरुआत

१वक्त के साथ साथखोते जाते हैं सपने.बेचकर आशायें,खरीद लिये जाते हैं अनुभव.लड़का ठहर जाता हैआदमी होने के बीच में कहीं.और लड़की बन जाती है औरतऔरत हो जाने के बहुत पहले.आशाओं को बेच खरीदा गया अनुभवरहता है ताकता, मूक बधिर सा.२एक टुकडा जीवन में,सच के दो
 
विकास कुमार
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समझ की समझ कोई समझे तो सही

नीरज कुमार झा विद्यालयों और बौद्धिक जगत मेंसीखने की जगहअधिक़तर लोगन सीखने का रियाज करते हैंऔर नासमझी के तमगे कोसीने पर लगा कर घूमते हैंसमझ की नैसर्गिक क्षमता परबेवकूफी की मोटी परत जमाअपने को ये बौद्धिक मानते हैंऔर जन उद्धार का
 
नीरज कुमार झा
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ट्विंकल ट्विंकल लिटल स्टार (दो अनुवाद)

१.झिलमिल झिलमिल नन्हें तारेमैं सोचूँ तुम हो क्या प्यारेदुनिया में उतनी ऊँचाई परलगते नभ में  हीरे की तरह२.झिलमिल झिलमिल नन्हें तारेनभ में लगते कितने प्यारेदुनिया के इतने ऊपरजगमग जगमग हीरे की तरह
 
नीरज कुमार झा
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ईश्वर की अदभुत कृति 'माँ' पर रचित एक रचना - माँ की चाह : ह्रदय छू लेने वाली एक मर्मस्पर्शी कविता - हर माँ को समर्पित

यह कविता अभी कुछ दिनों पहले पोस्ट की थी परन्तु 'मदर्स डे' पर इसे एक बार फिर पेश कर रहा हूँ ...उम्मीद है आपको पसंद आएगीआज फिर वही स्वप्न आया , खुद को कुछ सुनता हुआ पाया ,माँ ने बहुत कुछ कहना चाहा , पर मैं पत्थर बन खड़ा रहा ,नींद खुली तो कुछ समझ आया ,माँ को
 
राजेन्द्र मीणा
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माँ की चाह : ह्रदय छू लेने वाली एक मर्मस्पर्शी कविता - हर माँ को समर्पित

आज फिर वही स्वप्न आया , खुद को कुछ सुनता हुआ पाया ,माँ ने बहुत कुछ कहना चाहा , पर मैं पत्थर बन खड़ा रहा ,नींद खुली तो कुछ समझ आया ,माँ को नहीं बस खुद को पाया ,दोपहर की पहली डाक से माँ की बिमारी का तार आया ।अब तक खुद को समझाता रहा ,पर आज कोई बहाना ढूंढ़ ना
 
राजेन्द्र मीणा 'नटखट'
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वो कुमकुम बिंदी

आज भी लटका है तेरा दुपट्टा खूंटी पर किसी अमिट निशानी की तरह,तेरी लाल चूड़ियों के कुछ टुकड़े मेरे पैरों में चुभते है बीती ख़ुशी की तरह।लगता है जैसे छिटकती हो तेरे रूप की चाँदनी इस घर के आँगन में,आज भी खिलखिलाते है गुलमोहर के फूल छत पर पड़े तेरी हँसी के
 
राजेन्द्र मीणा
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एक अनंत सत्य की तरह

आज भी है नवनिर्मित कुछ नित्य की तरह ,बस वही सुबह , एक अनंत सत्य की तरह ।उकास का कारवां चला आ रहा है ,स्वप्न खग के परों को कुतरते हुए ।आसमां का रंग स्याह हो गया है ,भोर ने जकड़ ली है ,बाहें धुंध की ।समय की लय अनवरत कर रही है ,हवा से मिलकर गुबार की साजिश
 
राजेन्द्र मीणा
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समय वह आ चुका है

समय वह आ चुका हैजहाँ नहीं क्रांति की जरूरतबदलाव भी नहीं चाहिए आमूल-चूलन ही खून बहाने की दरकारऔर न ही करना है सड़कों पर हाहाकार इतना भी बहुत है कि करें इस्तेमाल आप अधिकारों का जो सहज उपलब्ध हैं आपको उनसे
 
नीरज कुमार झा
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झड़ की टोकरी !

मन को झिंझोड़कर हम भी कवि हो गए ,ढूंढ़कर प्रकाशकण हम भी रवि हो गए ।तोड़ कर रख दिया शब्द के दंभ को ,जोड़ कर रख दिया उस स्वप्न छिन्न को ,मोड़ कर रख दिया भय की तरंग को ,मारकर एक कलंक हम शिकारी हो गए ।काट कर रख दिया टूट चुके तान को ,छाँट कर रख दिया नम रेत से
 
राजेन्द्र मीणा
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ये तीन शब्द

जब भी खोलता हूँ जीवन के, शब्दकोष को ,ये तीन शब्द ' कहाँ ,क्यों, कैसे ' मुहं फाड़कर चले आते हैं ।जब भी बोलता हूँ समय से ,जीवन है यहीं ,ये तीन शब्द ' कहाँ ,क्यों ,कैसे ' यूँ दौड़कर चले आते है ।जब भी तोलता हूँ स्यंव को ,सत्य की तुला से ,ये तीन शब्द ' कहाँ
 
राजेन्द्र मीणा
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भाभी तेरे इस भोले चेहरे में , मेरी माँ का चेहरा दिखता है।

मैं दिल्ली में जहाँ रहता हूँ , उसी मकान में मेरे नीचे वाली मंजिल पर एक परिवार रहता है, बहुत सभ्य लोग है , उन्ही में से एक है , ' गीता भाभी ' ...बहुत ही सुन्दर और सुशील औरत है। इतनी गरमी के दिनों में भी मेरे पास पंखा नहीं है ..इसलिए जब देखो पंखा लाने को
 
राजेन्द्र मीणा
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झड़ की टोकरी

मन को झिंझोड़कर हम भी कवि हो गए ,ढूंढ़कर प्रकाशकण हम भी रवि हो गए ।तोड़ कर रख दिया शब्द के दंभ को ,जोड़ कर रख दिया उस स्वप्न छिन्न को ,मोड़ कर रख दिया भय की तरंग को ,मारकर एक कलंक हम शिकारी हो गए ।काट कर रख दिया टूट चुके तान को ,छाँट कर रख दिया नम रेत से
 
राजेन्द्र मीणा
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चाँद कैसा लगता है ?

एक दिन मैं छत पर आया ,चाँद को चमकता हुआ पाया ,अचानक मेरे जहन में ये सवाल कौन्धां,ये चाँद कैसा लगता है ?ढूँढा तो बहुत कुछ पाया।बच्चा "मामा जैसा लगता है "शायर "शायरी जैसा लगता है"कवि "कल्पना जैसा लगता है "विद्यार्थी "पृथ्वी जैसा लगता है"चकोर "महबूब जैसा
 
राजेन्द्र मीणा
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चाह

तुम्हारे साथ सिर्फ़ गीली संवेदनायें नहीं,सुलगते विचार भी बाँटना चाहता हूँ.प्रेम का कोमल, कुचला जा सकने वाला अहसास ही नहींबौद्धिकता का कठोर धरातल भी साझा करना चाहता हूँ.और चाहता हूँ थोड़े हिसाब से खुद को खर्च करनाऔर चाहता हूँ खरीदना - तुम्हें किस्त दर
 
विकास कुमार
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नहीं लड़की, तुम मुझे कवि ना कहना

नहीं लड़की, तुम मुझे कवि ना कहनाकवि मैं दूसरों के लिये रहूँगा.तुम्हारे लिये तो एक पागल आशिक ही हूँ -जो कविताओं में बातें करता है, हरदम करूँगा.पर कवि? मैं दूसरों के लिये रहूँगा.मेरी कविताएँ, तुम्हारे साथ किये गये मूक संवाद हैंशब्द तुम्हारी प्रेरणा से
 
विकास कुमार
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तीन अधूरी लिखवाइयाँ

1एक पल जो नहीं गुजरा - उस पल को जीयूँ कैसे?वो मय जो नहीं ढलका - उस मय को पीयूँ कैसे?तुम जब भी आती हो, एक हूक सी उठती है.तुम पास नहीं हो क्युँ, ये जख्म सीयूँ कैसे?2टुकडा टुकडा दुःख समेट के, फटा हुआ विश्वास लपेटेबेचैनी की चादर ओढे़, तुम भी सोयी - हम भी
 
विकास कुमार
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भेद

अगर तुम यहाँ नहीं हो मेरे पास -तो किसकी बातों में उलझकरउबलता दूध छूट जाता है उबलता. किसकी गरम महक आती है कमरे मेंऔर वो कौन है जो अचानक आकरपकड़ लेती है मुझेऔर काट खाती है मेरे कान? किसकी साँसें मेरी गर्दन पर खेलती हैंऔर किसकी नमी से भींगते हैं मेरे कपोल?
 
विकास कुमार
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विवश शब्द को ऋण कर दो!

विवश शब्द को ऋण कर दो! पत्थरों का प्राण कहता, युग भी निर्माण कहता| कपकपाते होंठ कहतें, पोंछ दो आंसू जो बहतें| जीर्ण-जीर्ण को तृण कर दो, विवश शब्द को ऋण कर दो| आगमन में दसों दिशाएँ, देख तुमको मुस्कुराएँ| फिर बसंती वात बहती, कूक कोयल
 
यायावर
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तालिबान

कोई दलील नहींकोई अपील नहींकोई गवाह नहींकोई वक़ील नहींवहाँ सिर्फ़ मौत हैकोई इंसान नहींकोई ईमान नहींकोई पहचान नहींकोई विहान नहींवहाँ सिर्फ़ मौत हैवहाँ सिर्फ़ मौत हैवहाँ सिर्फ़ धर्म हैधर्म को मानिएया फिरबेमौत मरिए
 
जयप्रकाश मानस
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देखो, ज़िद ना करो

मेरी कल्पना का एक और रूप। लेकिन मैं अक्सर सोचता हूँ कि क्या ऐसी कल्पना सत्य सिद्ध हो सकती है?लेखक: ध्रुवभारत (01 फ़रवरी 2007, बृहस्पतिवार, 1:45 सांय)ज़िद ना करोमुझे बिखर जाने दोइतनी दरारें पड़ चुकी हैंमुझे एक बार तो टूट करबिखरना ही होगातुम ज़िद ना करोकि
 
ध्रुवभारत
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स्वयं “मैं” में मेरा मौन है|

खुरच रहा था उम्र को, ये सोच कर पड़ाव पर| मैं खाली हाथ क्यूँ रहा, लक्ष्य के चढ़ाव पर| समय के इस चक्र का, आवर्तन क्यूँ अब गौण है? मेरी इस आपत्ति पर, स्वयं “मैं” में मेरा मौन है| राह चलता ही रहा, सूत्र के संधान में| मेरी क्या
 
यायावर
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तुम्हारी गलियों में घूमते-घूमते

तुम्हारी गलियों में घूमते-घूमते बहुत कुछ याद आता है। वो कौफ़ी का पहला प्याला, तुम्हारे हाथ का पहला निवाला, तुम्हारी मासूम सी हँसी की गहराई, और तुम्हारे मुहल्ले वाले सूरज की परछाई, और वो हर छोटी चीज, जिससे तुम्हारा नाता है। तुम्हारी गलियों में घूमते-घू
 
विकास कुमार
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हम लोग

हम वृत्त की परिधि पे खड़े हुए लोग हैं और हमारा जीवन - केन्द्र तक पहुँचे जा सकने की अलसाई, मुरझाई जद्दोजहद। फीके अभिमान और बासी अवचेतन के साथ जीते - हम, अपनी लिप्साओं की विकल विवशता और अनुरोधों के मृदु अवरोधों के बीच परिधि से परिधि तक की दूरी तय किए जा
 
विकास कुमार
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तुम बैठी ऐसी लगती हो

मेरी कल्पना का एक और रूप। लेकिन मैं अक्सर सोचता हूँ कि क्या ऐसी कल्पना सत्य सिद्ध हो सकती है?लेखक: ध्रुवभारत (01 फ़रवरी 2007, बृहस्पतिवार, 1:45 सांय)आवाज़: ध्रुवभारत   तुम बैठी ऐसी लगती होइस घने आम की छाँव मेंजैसे कोई पावन मंदिर होइक छोटे से
 
ध्रुवभारत
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हे झील मुझे क्षमा करना

विदेश में एक शाम झील किनारे बैठे हुए जो मैनें अनुभव किया उसे इस रचना में लिख दिया।लेखक: ध्रुवभारत3 मार्च 2007 को लिखितहे झीलमुझे क्षमा करनाआज तुम्हारे पानी कोमैनें जो पत्थर मारा थावह मेरा क्रोध नहींबल्कि मेरी हताशा थीतुम्हारे किनारे बैठा मैंबोलता रहामन
 
ध्रुवभारत
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तुम कल्पना साकार लगती हो!

हालांकि अधिक समय नहीं हुआ लेकिन ऐसा लगता है कि इस रचना को लिखे हुए एक अरसा बीत गया है।लेखक: ध्रुवभारत28 फ़रवरी 2008 को लिखिततुम कल्पना साकार लगती होनभ का धरा को प्यार लगती होफ़सल भरे खेतों के पारहो उड़ती चिड़ियों की चहकारग्रीष्म उषा की ठंडी बयारसावन
 
ध्रुवभारत
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ओ पेड़, तुम गिर क्यों नहीं जाते?

एक समय जीवन में ऐसा आया था जब मुझे स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिये किसी माध्यम की ज़रूरत आ पड़ी थी। शायद हर जीवन में ऐसे समय आते हैं। मैनें खुद को जांचा तो पाया कि मैं तो अभिव्यक्ति के किसी भी माध्यम का ज्ञान नहीं रखता था। नृत्य, संगीत, गायन, अभिनय,
 
ध्रुवभारत
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हम तुम्हे अपने दिल में रखेंगें

लेखक: ध्रुवभारत2003 में लिखितएक बच्चे से पूछो ज़रा ज़ोर सेतुम्हारे हाथ में क्या है?देख सकोगी छलकते आंसूउसकी निर्दोष, प्यारी-सी आंखों मेंउसकी मुठ्ठी बड़े ज़ोर से होगी बंदखोलोगी तो कुछ नन्हे कंचे मिलेंगेंमुठ्ठी में बंद उन्ही कंचो की तरहहम तुम्हे अपने दिल
 
ध्रुवभारत
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तो मैं भी

कलम उठाने से कवितायें लिखी जा सकती या फिर पैदा किये जा सकते विचार या लहलहायी जा सकती एक क्रांति या फिर सहेजा जा सकता कोई चिंतन - तो उठा लेता मैं भी. बस कह भर देने से आ सकता परिवर्तन या उड़ेली जा सकती समझ या बाँटी जा सकती संवेदना या साबित किया जा सकता
 
विकास कुमार
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अपने जन्मदिवस पर

जिंदगी के पच्चीस साल बिता चुकने वाले मित्र -तुम्हें बधाई देता हूँ.उपलब्धियों का पिटारा भले ही खाली मिले,लेकिन उनके ऊपर बधाईयों की रंगीन रिबन का अधिकारतुमने निःसंदेह अर्जित किया है – जीवन को जीते रह कर.और फिर – तुम मेरे सुख दुःख के साथी रहे हो,मेरे संग
 
विकास कुमार
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मेरी खिड़की वाली दुनिया

मेरी खिड़की से जो दुनिया दिखती है -वो गोल नहीं है.उसका आकार अनियमित सा है.(समय के संदर्भ में)एक वक्त ये सपाट सी जमीन बन जाती है,दूर तक जिसका विस्तार होता हैऔर अगले ही क्षण सिमट कर रह जाती हैजिसे देख सकना भी दुश्वार होता है.मेरी खिड़की वाली दुनिया में
 
विकास कुमार
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अभी नहीं करता तुम्हें, अंतिम प्रणाम!

श्वे़त पर ज्यों, श्याम बिखरें हैं, यथावत! श्लेष भावों के वरण में, अन्तः का प्रकल्प लेकर| नित्य प्रतिदिन, मृत्यु करती है आलिंगन, पुनर्जीवन के दंभ का संकल्प लेकर| अट्टहास-सा क्रंदन समेटे, बाहु-पाश में| अलिप्त-सा, अब लिप्त क्यूँ? किसी
 
यायावर
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समझने योग्य

मुझे तुम्हारे कंक्रीट के जंगल से कोई शिकायत नहीं और ना ही नफ़रत है तुम्हारे लगाव से. और ना ही गुस्सा हूँ तुम पर, तुम्हारे चुनाव से. लेकिन मैं ये पेड़-पौधे, ये दूब, ये कांटे नहीं छोड़ पाऊँगा जो कुछ जन्म से मेरा है, प्राकृतिक है वो जमीनी बंधन ’मैं’ नही
 
विकास कुमार
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याद

जब - सब अपने नगमों की नुमाइश लगाते हैं और बदले में औरों की वाहवाही पाते हैं तो - मुझे तुम्हारी जबरदस्त याद आती है क्यूंकि तुम बिन मेरी कवितायें खो जाती हैं और - नज्म हो भी तो नुमाइश का मन नहीं होता तुम बिन तो वाहवाही में भी वजन नहीं होता
 
विकास कुमार
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An offense to readers

Don’t kid yourself!You do not love me.You can not.Loving the poemand loving the poetare two different concepts - you forgot.You are just a confused personwho is ignorant of the differences.And yet you try to judge mewith social stances, moral lenses.Just
 
विकास कुमार
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उसे जानने की यात्रा भर है!

भारहीन! घर्षणहीन! धातु भी नहीं! अधातु भी नहीं! हवा भी नहीं! निर्वात भी नहीं! फिर क्या परिभाषा होगी? जिसे भाषित करने के प्रयास में, हम लुटाना चाहते हैं, अपने सर्वज्ञ को, या फिर अपना सर्वज्ञ लुटा कर ही, परिभाषाविहीन बन जाना, उसे जानने की यात्रा भर है!
 
यायावर
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थमती हुई साँसों के आहट में छुपने को!

थमती हुई साँसों के, आहट में छुपने को| दरिया-सी बहती अखियों के, मौजों में मिटने को| कैसे भला कोई? मौत से इकरार करे, सिमटते हुए लम्हों में, जी-भर के प्यार करे! वक़्त थमता यूँ अगर, हसरतों की आड़ में| फासले सब खत्म होते, उम्र की दीवार में&
 
यायावर