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इटारसी-भुसावल पैसिंजर : तालबेहट स्टेशन - मध्य रेल्वे

यह पुरानी कविता है। मेरी कविताओं की पिछली पोस्ट पर अपनी टिप्पणी में चन्दन इसे याद किया तो सोचा संजय व्यास की बस के बाद अपनी ट्रेन यहाँ लगा दूँ....शायद पहले कभी लगायी भी हो......इस कविता की ट्रेन यूँ तो झांसी से भुसावल जाती है पर लोग इसे इटारसी-भुसावल
 
शिरीष कुमार मौर्य
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अन्त्योदय और कविता लिखना

पिकासो का यह विख्यात चित्र गुएर्निका यहाँ से साभारमेरी ये दो कविताएं कादम्बिनी के जून अंक में छपी हैं, लेकिन वहाँ कम्पोजिंग के दौरान इनमें काफ़ी फ़ेरबदल हो गया। इन्हें मूल और दुरुस्त रूप में यहाँ लगा रहा हूँ।अंत्योदय आज के जीवन की मुश्किल ये कि स्वप्नों
 
शिरीष कुमार मौर्य
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होरी का पुतला

बस आज फिर होरी दिखा। वह पहले भी कहीं दिखा था। या जो दिखा वह शायद होरी का अपना कोई सगा था। वह बुंदेलखंड से आया था या बिदर्भ से था। उसे किसी ने नहीं देखा। वह चोर की तरह देख रहा था सब कुछ। हारा फटेहाल। उसे मैंने भीनहीं देखा। हम उसे देख कर क्या कर लेते। बस
 
बोधिसत्व
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पुराने दोस्त

वेन गोग़ की पेंटिंग गूगल से साभारपुराने दोस्त याद आते हैं पुराने दोस्त स्मृतियों में रहते हैंमेरा जीवन तीन चौथाई स्मृतियों से बना है और एक चौथाई उम्मीदों सेतीन चौथाई में भी दोस्त एक चौथाई में रहते हों शायद दूसरी कई सारी चीज़ों के साथहो सकता है दूसरी
 
शिरीष कुमार मौर्य
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औरतों की दुनिया में एक आदमी

वे दुखों में लिथड़ी हैंऔर प्रेम में पगीदिन-दिन भर खटीं किसी निरर्थक जांगर मेंबिना किसी प्रतिदान केरात-रात भर जगींउनके बीच जाते हुएडर लगता हैउनके बारे में कुछ कहते कुछ लिखतेदरअसलअपने तमामतर दावों के बावजूदकभी भीउनके प्रति इतने विनम्र नहीं हुए हैं हमइन
 
शिरीष कुमार मौर्य
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आज महिला दिवस है

मां कोजिसने मेरे लिएसहे न जाने कितने दर्द बहन कोजिसने बिना किसी शर्तमेरी सारी बात मानीऔर उन सबको जो बिन चाहे मिलेएक सपना भर गए मेरी अधजगी आंखो मेंदिल में धड़कनें जगाईऔर मेरी थमी थमी राहों को दे गए रफ्तारवो जो बहुत करीब आए बिन चाहेऔर बादल की तरह बरस कर
 
जितेंद्र भट्ट
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एक मेरा दिल था बेशर्म

एक मेरा दिल था बेशर्म(अभिन्न कविमित्र गिरिराज किराडू और उसके "है था हो गया था" के लिए...) है में घटने वाली चीज़ेंअब था में घटने लगी थींहै अब भी थापर मेरा समय कुछ गड़बड़ा गया थामेरे भीतरऔर होगा के बारे में भी मैंथा से पूछता थागली में दो सफ़ेद से धूसर होते
 
शिरीष कुमार मौर्य
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प्रेम के लिए दो मिनट का मौन

कल वैलेंटाइन डे है। कुछ साल पहले जब मैं भोपाल में था तब वहां इसका ताजा-ताजा विरोध शुरू हुआ था। उन दिनों मैंने यह कविता लिखी थी। एक बार ब्लाग पर डाल चुका हूं आज दोबारा पोस्ट कर रहा हूं।फागुन के पागल महीने मेंहम चाह ही रहे थे गाना बसन्ती गीतकी आ गयानए
 
संदीप पाण्डेय
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जानलेवा खेल

रात एक बजेजाने किस मूड में भेजे गए उस इमेल कोसुबह संभलने के बाद उसने ख़ारिज कर दिया हैये जिन्दगी हैलव आज कल नहींवह कहती हैमैं कहना चाहता हूँ की जिन्दगीराजश्री बैनर का सिनेमा भी तो नहींप्यार चाहे मुख़्तसर सा हो या लम्बाउससे अपरिचित हो पाना बस का नहींचाहे वो
 
संदीप पाण्डेय
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नया साल आ गया

एक और नया साल आ गयामैं खुश हूंजी लिया एक और बरसबिना किसी खास परेशानी केऔर शायद...बिना किसी मकसद के भीकितना अच्छा गुजरा बीता सालन तो मैं किसी दुर्घटना का शिकार हुआन फंसा किसी झंझट में बेवजहकिसी ने नहीं देखा मुझे घूस लेते हुएऔर ना ही छेड़ा किसी ने जवान होती
 
संदीप पाण्डेय
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आएगी सुबह

जैसे आज सुबहघने अंधेरे से फूटी थी किरणेंजैसे नन्ही कली... ओस से दबीखिली थी धूप मेंजैसे रात की ठंड में सिकूड़ी नाजुक तितलीचहक रही थी... सुबह-सुबहजैसे अमावस के बादचांद फिर उभरा थावैसे ही उदासी का ये पल भी बीतेगादुख जाएगाखुशियां लौटेंगी ।।
 
जितेंद्र भट्ट
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एक अजनबी शहर में मर जाने का ख्याल

एक नए शहर में जिससे अभी आप की जान पहचान भी ठीक से ना हुई हो मर जाने का ख्याल बहुत अजीब लगता है ये मौत किसी भी तरह हो सकती है शायद ऐ बी रोड पर किसी गाडी के नीचे आकर या फिर अपने कमरे में ही करेंट से ऐसा भी हो सकता है की बीमारी से लड़ता हुआ चल बसे कोई ह
 
संदीप पाण्डेय
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मैं ऐसे बोलता हूँ जैसे कोई सुनता हो मुझे !

रात भर पुरानी फ़िल्मों की एक पसन्दीदा श्वेत-श्याम नायिका की तरह स्मृतियां मंडराती सर से पांव तक कपड़ों से ढंकीं कुछ बेहद मज़बूत पहाड़ी पेड़ों और घनी झरबेरियों के साये में कुछ दृश्य बेडौल बुद्धू नायकों जैसे गाते आते ढलान पर एक निरन्तर नीमबेहोशी के बाद मैं
 
शिरीष कुमार मौर्य
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मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ

मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ जीवन और मृत्यु और इन दोनों के बीच की ढेर सारी अबूझ ध्वनियों से भरी मेरी भाषा रह-रहकर तुमको पुकारती है मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ उन सभी चीज़ों के साथ जो तुमसे बहुत गहरे जुड़ी हैं तुम इसे मेरा बनाया
 
शिरीष कुमार मौर्य
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मेरे समय में रोना

यह कविता प्रतिलिपि में प्रकाशित हुई है तथा पिकासो की यह विख्यात पेंटिंग यहाँ से साभार ! एक बच्चा सड़क पर रोता-रोता जाता था पीछे मुड़कर न देखता हुआ उसकी माँ पहनावे से ग़रीब उसके थोड़ा पीछे-पीछे आती थी न बच्चे को रोकती थी न ख़ुद रुकती थी वो क्यों रोता था को
 
शिरीष कुमार मौर्य
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अगन बिंब जल भीतर निपजै!

यह कविता पिछले दिनों प्रतिलिपि में यहाँ छपी है। एक क़स्बे में बिग बाज़ार की भव्यतम उपस्थिति के बावजूद वह अब तक बची आटे की एक चक्की चलाता है बारह सौ रुपए तनख़्वाह पर लगातार उड़ते हुए आटे से ढँकी उसकी शक़्ल पहचान में नहीं आती इस तरह बिना किसी विशिष्ट शक़्
 
शिरीष कुमार मौर्य
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सुनती हूँ यह सब डरी हुई

बहुत दिनों बाद कोई कविता छाप रही हूँ। कुछ मित्रों को सुनाया तो इस पर मिली-जुली प्रतिक्रिया आई। फिलहाल इसे कुछ और कविताओं के साथ जयपुर के एक अखबार डेली न्यूज में छपने के लिए भेज दिया है। उसके पहले यहाँ पढ़ें।सुनती हूँ यह सब कुछ डरी हुईमैं बाँझ नही हूँनहीं
 
आभा
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एक गड़बड़ कविता ........

दोस्तो / पाठको ! ये एक पुरानी कविता है, जिसे अपनी उलझनों के कारण एक पत्रिका में मैंने छपते छपते रोक लिया था। कविता कई जगह पर टूटी बिखरी है - विचार के स्तर पर भी उलझी हुई है लेकिन इन संकटों के बावजूद ये है कि बस है ! आज सोचा आप सबके साथ इसे साझा किया
 
शिरीष कुमार मौर्य
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कविता खो गई

कविता खो गई मेरी अपनी जिसे लिखा था मैंने बहुत ही निराले अंदाज में खो गई कहीं कहां ढूंढूं कहां खोजूं किस किताब में दबी होगी किताब में होगी भी, या नहीं कहीं मेरे भीतर ही तो नहीं खो गई पता नहीं क्‍या सच में मुझसे खो गई या आंख मिचौली खेल रही है पता नहीं
 
मोहन वशिष्‍ठ
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तुम्हारा होना...

तुम नहीं हो तुम्हारी सीट खाली है दराज में रखा तुम्हारा कप सोच रहा है कि तुम आओगी वह तुम्हारा इंतजार कर रहा है तुम्हारी सीट पर कोई और बैठेगा तो कप को बहुत खराब लगेगा शायद वो मना भी करे या फिर गिरकर टूट ही जाए अगर कप टूट गया तो यहां और भी बहुत कुछ टूटे
 
संदीप पाण्डेय
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इन्दौर वाया भोपाल - एक निजी यात्रा-वृत्तान्त

नीचे तस्वीर में है भोपाल की विख्यात ताजुल मस्जिद यह एक पुरानी स्मृति है। इसे 2005 के शुरू में रायपुर से निकलने वाली देशबंधु समूह की पत्रिका " अक्षर पर्व " ने छापा था । पत्रिका के सम्पादक श्री ललित सुरजन है। --- भोपाल से गुज़रा तो शानी याद आए गो वे नह
 
शिरीष कुमार मौर्य