दूर बैठे, दूर की सोच
गांव, मेरा गांव। जब भी गांव जाता हूं तो करीब 40-50 किलोमीटर पहले ही वो शहर की पक्की सड़क पीछे छूट जाती है। फिर शुरू हो जाता है सफर कच्ची सड़क का, जिसे बोलचाल की भाषा में खड़ंजा (ईट की सड़क) कहते हैं। फिर शुरू हो जाती है हरियाली और सिर्फ हरियाली। मिट्टी
May 22 2010 06:54 AM



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