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आखिर क्यों जातियां टूट नहीं पातीं?

जातियां अब भी टूटी नहीं हैं। बनी हुई हैं। हर धर्म में। हर समाज में। और हर व्यक्ति के भीतर। जातियों को तोड़ने के अब तक जो भी प्रयास किए गए वे नाकाफी ही साबित हुए। आए दिन कोई न कोई ऐसी खबर हमारे बीच से होकर गुजर ही जाती है कि कहीं कोई जातिय-दंभ का शिकार
 
अंशुमाली रस्तोगी
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क्‍या यह बहस का विषय नहीं ?

गांव रोहिणी, जिला वर्धा, (विदर्भ) महाराष्‍ट्र के समाज सुधार एवं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े वासु परिवार में 4 मार्च 1935 को जन्‍मी प्रभा हमारे बीच नहीं रहीं। प्रभा राव राजस्‍थान में राज्‍यपाल के रूप में काम कर रही थीं। 26 अप्रेल, 2010 को उन्‍होंने अंतिम
 
दुलाराम सहारण
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लिव-इन-रिलेशनशिप बनाम समाज

समाज यह नहीं चाहता। समाज वो नहीं चाहता। समाज को यह पसंद है। समाज को वो पसंद नहीं। समाज यह कह सकता है। समाज वो कह सकता है। क्या आपको नहीं लगता कि समाज अकसर तानाशाह जैसा हो जाया करता है? क्या आपको नहीं लगता कि समाज हमारी निजी जिंदगी में बहुत ज्यादा दखल
 
अंशुमाली रस्तोगी
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बीबीसी मुझे माफ करना, मैं हिंदुस्तानी हूं

मेरा कसूर सिर्फ इतना था कि मैंने बीबीसी की भाषा को लेकर एक सवाल उठाया था। सवाल यह था कि दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकी और इंसानियत का दुश्मन ओसामा बिन लादेन सम्मान का हकदार कैसे? अभी तक तो हमने यही सुना है कि व्यक्ति के कर्म ही उसे महान बनाते हैं। कर्म ही
 
रवीन्द्र रंजन
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क्रांतिकारी भगत सिंह या क्रांतिकारी शाहरुख खान!

आज भगत सिंह जहां कहीं भी होंगे अपनी क्रांति पर रंज अवश्य कर रहे होंगे क्योंकि उनकी क्रांति को टक्कर देने वाला एक नया क्रांतिवीर शाहरुख खान के रूप में हमारे बीच आ चुका है।विगत 12 फरवरी को इस देश में बहुत बड़ी क्रांति हुई। इस बहुत बड़ी क्रांति को करने वाला
 
अंशुमाली रस्तोगी
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आखिर क्यों मिला पद्म ?

हर साल की  तरह इस  साल भी पद्म पुरस्कारों की सरकारी रस्म निभाई गई। जिस तरह पुराने जमाने में, राजा की तारीफ़ में कसीदे पढ़ने वाले चाटुकारो को इनाम के तौर पर सोने के सिक्के, बाँटा करते थे, वही परम्परा आज भी जारी है इस लोकशाही में। ये तो हम सब
 
शशांक शुक्ला
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ये कैसी ज़िंदगी जी रहे हैं हम

पिछले दो दिनों से मन काफी विचलित है। चाहकर भी कुछ लिख न सका। सच पूछिए तो कुछ सोच ही नहीं सका। हर ओर आंसुओं का सैलाब। टेलीविजन पर रोते हुए चेहरे। अखबारों में खून से लथपथ चेहरे, चीखते बिलखते चेहरे। भला ऐसे असामान्य माहौल में कोई भी संवेदनशील व्यक्ति सा
 
Satyendra Prasad Srivastava
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हम ही छीन रहे हैं बच्चों की मासूमियत

मेरी बेटी ने पूछा--पापा, दादा कहां गए? मैंने बताया--भगवान के पास उसने फिर पूछा--नाना कहां गए? मैंने बताया--भगवान के पास। उसने पूछा-भगवान के पास क्यों चले गए? मैंने कहा-दोनों बहुत अच्छे थे, इसलिए भगवान ने बुला लिया शायद हम बच्चों के ऐसे सवालों का ऐसा
 
Satyendra Prasad Srivastava
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मत करो जज्बे को सलाम!

टेलीविजन पर बारूद की गंध नहीं आती लेकिन जेहन पर इसका जबर्दस्त असर है। टेलीविजन के पर्दे पर सिर्फ दिखता है धुआं, गुबार, आग। टेलीविजन के सामने बैठते दम घुटता है। बारूद का धुएं की गंध नाक से होते हुए सीधे दिमाग में उतर जाता है। आसपास कहीं धुआं नही, सिर्
 
Satyendra Prasad Srivastava
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संगठन, लेखकों के कवच-कुंडल बनें

लेखन भले ही ऐकांतिक कार्य हो लेकिन उसकी एक महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका भी है। रचना का पाठक तक पहुंचना निश्चित रूप से एक सामाजिक गतिविधि है। आज हिंदी लेखक बहुत ज्यादा हाशिए पर आ गया है। उसकी प्रासंगिकता का भी संकट खड़ा हो रहा है , जबकि अगर आज की शब्दावल
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क्योतो से कोपनहेगन

क्योतो में जिन मुद्दों पर सहमति हुई थी, उस पर अंकल सैम का अड़ियल रवैया जारी है। चीन जाकर ओबामा ने भी कोपनहेगन से ज्यादा उम्मीदें न रखने की सलाह दे दी है। क्या था क्योतो नयाचार में... ऐसा भी नहीं कि अपनी ही आबो-हवा को जहरीला और तवे की तरह गरम बना दे र
 
गुस्ताख़
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गरम होता धरती का मिजाज़

धरती के गर्म होने की प्रक्रिया ग्रीन हाउस एफेक्ट कहलाती है। दरअसल ग्रीन हाउस ठंडे इलाकों में कांच के घर होते हैं, जिनके अंदर खेती की जाती है। कांच के इस घर की दीवारें धूप को अंदर आने देती हैं, जिसे धरती सोख लेती है लेकिन कांच की छत और दीवारों की वजह
 
गुस्ताख़
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पर्यावरण परिवर्तनः प्रलय की ओर

टीवी का ज़माना है, और रवीश के शब्दो में शाकाल जैसा कोई टकला ज्योतिषी २०१२ में दुनिया में प्रलय का एलान कर जाता है। मुझे नहीं पता कि ज्योतिषी महाराज की भविष्यवाणी का असर होगा या कुछ और लेकिन इतना तय है कि दुनिया पर विनाश का साया पड़ने वाला है। डूबते श
 
गुस्ताख़
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शहीदों के साथ यह कितना भद्दा मज़ाक है!

पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई में हुए आतंकी हमले से अभी देश उबर भी नहीं पाया है। उन हमलों का मुख्य आरोपी आमिर अजमल कसाब मुंबई की ही एक जेल में बंद है। 26\11 की पहली बरसी को महज दो हफ़्ते हैं। और मुंबई की जनता को महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने इ
 
प्रभात शुंगलू
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क्योंकि गांधी ओबामा नहीं हो सकते

यह बहस बेतुकी है। कि ओबामा को शांति का नोबेल मिला गया गांधी को क्यों नहीं मिला? मेरा सवाल है कि गांधी को नोबेल क्यों मिलना चाहिए? गांधी ने ऐसा क्या कर दिया कि नोबेल पर हक उनका बनता है? इस बहसतलब मुद्दे पर दीदारेजी करने से पहले हम यह क्यों नहीं समझने
 
अंशुमाली रस्तोगी
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ब्रेकिंग न्यूज की मजबूरी क्यों?

कुछ दिन पहले कई चैनलों वाले बड़े मीडिया ग्रुप के एक छोटे या फिर कहें मंझोले हिंदी चैनल के संपादक को पढ़ रहा था। वह छोटे और मध्यम श्रेणी के चैनलों की परेशानियां गिना रहे थे। उनका कहना था कि छोटे चैनलों की कई मजबूरियां हैं। बकौल संपादक, छोटे चैनल कितना
 
रवीन्द्र रंजन
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क्या 'ब्राह्मण' और 'पंडित' जातिसूचक शब्द नहीं हैं?

कृपया कोई बुरा न माने. जाति संबंधित विषयों पर लिखना जोखिम भरा होता है.पोस्ट को लिखना का सबब है एक समाचार कि कमीने फिल्म में गुलज़ार के लिखे लोकप्रिय गीत में 'तेली का तेल' अंश को विरोध प्रदर्शन के बाद 'दिल्ली का तेल' कर दिया गया है.इससे पहले एक फिल्म के
 
निशांत
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क्योंकि भ्रष्टाचार परंपरा है

अगर वे कह रहे हैं कि सुनियोजित साजिश के तहत उनके बेटे को फंसाया गया है; तो शायद ठीक ही कह रहे होंगे। हमारे देश में एक नेता ही तो है जो सच के अतिरिक्त कुछ नहीं कहता-बोलता। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि भ्रष्टाचार या रिश्वतखोरी हमारे देश में कोई गंभीर
 
अंशुमाली रस्तोगी
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यह 21वीं सदी का सच है!

पहले सच कड़वा होता था, अब डराने लगा है। डराने वाला सच कड़वे सच से कहीं अधिक खतरनाक होता है। कड़वे सच में हमारा चरित्र ही पतित होता है, लेकिन डरावने सच में तो हमारा जीवन ही संकट में पड़ जाता है। कड़वे सच में अब तक यह संभावना बनी हुई थी कि 'कुछ सच' होता
 
अंशुमाली रस्तोगी
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जिन्हें महिलाओं के पहनावे पर ऐतराज है

कुछ लोग बहस से इसलिए कतराते हैं, क्योंकि उन्हें अपने नंगे होने का डर लगा रहता है। बहस में तर्क भी होते हैं वितर्क भी। मगर उन तंग-दिमाग लोगों के पास न तर्क होते हैं न वितर्क। बहस उन्हें आतंकित करती है। वे दूसरों पर खुलना नहीं चाहते। बंधनों को तोड़ने स
 
अंशुमाली
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बापू कि स्मृतियों के बहाने कुछ द्वंद

माडिसन एवेनुए में ५९५ नम्बर में अमेरिका के जेम्स ओटिस ने बापू के सामानों की नीलामी की... भारत के विजय माल्या ने इसे भारत की प्रतिष्ठा से जोड़ते हुए बापू की सभी उपलब्ध वस्तुओं को ११ करोड़ में खरीदा । इसके पहले भी वो टीपू सुलतान की तलवार भारत ला चुके है
 
मशाल
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पैमाने पर दोहरे मापदंड कितने सही ?

आज  ठहलते-घूमते डाक्‍टर कविता वाचक्नवी के एक ब्‍लाग बालसभा पर पहुँचना हुआ। उनका एक लेख मेरे एक लेख को लेकर लिखा गया था। लेखो पर प्रतिक्रियात्‍मक लेख प्राप्‍त होना बहुत कम लोगो को नसीब होता है। मेरे पिछले लेख पिता बच̴्
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तस्वीरे- मांडवी की मौत, जुआरी के साथ जुआ

मांडवी नदी गोवा के जन-जीवन में वही महत्व रखती है जो हमारे शरीर मे नसों का है। मांडवी और जुआरी नदियों को गोवा की जीवन रेखा कहा जाता है। परिवहन से लेकर पेय जल तक हर मसले पर मांडवी और जुआरी नदियों ने गोवा को जिंदगी बख्शी है। लेकिन खनन और ऐसी ही दूसरे मा
 
गुस्ताख़