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फिर हुआ..

फिर हुआ हम अपनाइयों में घिरेकिरकिरायी कितनीं, टूटे कांच के टुकड़े, किरकिराती थकाती, बनाती रहीं ग़लतफ़हमियां, ज़ाहिर है होना थाआख़ि‍र आदमी की जात हैं, हुआहम चौंके चौंकते रहे, मगर सच्‍चा डरे, बहुत आसानी से बड़ी रवानी में सीधे एकदम साफ़-साफ़ गिरे.
 
Pramod Singh
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संझा एन्‍सांब्‍ल..

पहचान की वह जाने कैसी रेल होगी जिसके खटर-खटर बेमेल म्‍यूज़ि‍कल मुगालतों में दिल बहलता होगा, कभी सुन पड़ती होगी कोई दबी-दबी सी चीख़, मगर बेख़याली की बेसबब कहानी थी सा भूलकर उसे फिर कोई लतीफ़ा सुनता होगा, कोई जो आकर चुपके बताये कभी कि जनाब, यह ज़ि‍न्‍दगी
 
Pramod Singh
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बस्‍ते के भीतर रोज़..

तालाबंद नल और अटकी हवा की तरह सब ठहरा होता है , उधारी के सस्ते जूतों पर धूल चढ़ती होती है, फ़ोन देरतक मुंह सिये आख़ि‍रकार हारकर बुदबुदाता है, हमें बजाओ , नई किताब का चमकीला कवर कबतक त्या़ज्य तिरस्कार झेलता फिरेगा, हुमसकर उमगता है, फिर, फिर, फिर, ऐ सु
 
Pramod Singh