फिर हुआ..
फिर हुआ हम अपनाइयों में घिरेकिरकिरायी कितनीं, टूटे कांच के टुकड़े, किरकिराती थकाती, बनाती रहीं ग़लतफ़हमियां, ज़ाहिर है होना थाआख़िर आदमी की जात हैं, हुआहम चौंके चौंकते रहे, मगर सच्चा डरे, बहुत आसानी से बड़ी रवानी में सीधे एकदम साफ़-साफ़ गिरे.
Apr 06 2010 12:40 AM



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