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मुझे कदम-कदम पर चौराहे मिलते हैं

मुझे कदम-कदम परचौराहे मिलते हैंबाँहे फैलाए !!एक पैर रखता हूँ कि सौ राहें फूटतींव मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँबहुत अच्छे लगते हैं उनके तजुर्बे और अपने सपनेसब सच्चे लगते हैंअजीब सी अकुलाहट दिल में उभरती हैमैं कुछ गहरे मे उतरना चाहता हूँजाने क्या मिल
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भूल-ग़लती

भूल-ग़लतीआज बैठी है ज़िरहबख्तर पहनकरतख्त पर दिल के, चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक,आँखें चिलकती हैं नुकीले तेज पत्थर सी,खड़ी हैं सिर झुकाए        सब कतारें
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विचार आते हैं !

मुक्तिबोध की एक छोटी कविता विचार आते हैं विचार आते हैं – लिखते समय नहीं लिखते समय नहीं बोझा ढोते वक्त पीठ पर सिर पर उठाते समय भार परिश्रम करते समय चाँद उगता है व पानी में झलमलाने लगता है हृदय के पानी में विचार आते हैं लिखते समय नहीं … पत्
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍मदि‍न सप्‍ताह: अलगाव के खि‍लाफ मशाल हैं मुक्‍ति‍बोध

इंटरनेट युग में संपर्क और संबंध पेट नहीं भरते,मोबाइल की बातों से संतुष्‍टि‍ नहीं मि‍लती,आज हमें सभी कि‍स्‍म के अत्‍याधुनि‍क तकनीकी और संचार साधन चैन से जीने का भरोसा नहीं देते, बार बार अलगाव का एहसास परेशान करता है ,चि‍न्ता होने लगती है कि‍ आखि‍रकार
 
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍म दि‍न सप्‍ताह : संघर्ष और वि‍वि‍धता का महाकवि‍ मुक्‍ति‍बोध -मुरली मनोहर सिंह

मुक्तिबोध की रचनाओं के तीन चरण हैं। पहला 1934-35, दूसरा 1953 से 1959 और तीसरा 1959 से 1964 । अगर पहले चरण की कविताओं और कहानियों को साथ-साथ देखा जाए और समान प्र श्‍नों की आवाजाही को रेखांकित किया जाए तो म ौ टे तौर पर यह प्रतीति होती है कि यथार्थ के प
 
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍म सप्‍ताह : आधुनि‍कतावादी नहीं थे मुक्‍ति‍बोध - नि‍त्‍यानंद ति‍वारी

जब मुक्तिबोध ने लिखना शु रू किया था , उस समय राजनीतिक दृ ष्‍टि‍ से समय बड़ा सक्रिय था , निर्णायक था। समाजवादी , मा र्क्‍स वादी और मानव स्वातंत्र्यवादी विचारधाराएँ सक्रिय थीं। स्वाधीनता मिलने ही वाली थी और .. मिल गई। उपलब्धि बड़ी थी , सपने बड़े थे। सम
 
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जनसंस्कृति मंच का 'मुक्तिबोध स्मृति फ़िल्म और कला उत्सव'

१३-१५, नवम्बर, २००९):एक संक्षिप्त रिपोर्ट मुक्तिबोध के जन्मदिवस पर शुरु हुआ भिलाई में जन संस्कृति मंच का 'मुक्तिबोध स्मृति फ़िल्म और कला उत्सव'( १३-१५, नवम्बर, २००९). प्रथम मुक्तिबोध स्मृति व्याख्यानमाला की शुरुआत की जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. मै
 
समकालीन जनमत
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तार सप्तक में मुक्तिबोध का वक्तव्य

मालवे के विस्तीर्ण मनोहर मैदानों में से घूमती हुई क्षिप्रा की रक्त-भव्य साँझें और विविध-रूप वृक्षों को छायाएँ मेरे किशोर कवि की आद्य सौन्दर्य-प्रेरणाएँ थीं। उज्जैन नगर के बाहर का यह विस्तीर्ण निसर्गलोक उस व्यक्ति के लिए, जिसकी मनोरचना में रंगीन आवेग
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍म सप्‍ताह : पंडि‍त नेहरू और मार्क्‍सवाद के हि‍मायती मुक्‍ति‍बोध -चंचल चौहान

मुक्तिबोध का पूरा लेखन विश्व की उन तमाम राजनीतिक शक्तियों जो सर्वहारावर्ग और उसकी विचारधारा –– मार्क्सवाद व लेनिनवाद –– के प्रति समर्पित हैं के पक्ष में खड़ा है और उन तमाम शक्तियों के खिलाफ है जो जनवादविरोधी हैं और साम्राज्यवाद और सामंतवाद की पिट्ठू
 
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दूर तारा / गजानन माधव मुक्तिबोध

दूर तारा तीव्र – गति अति दूर तारा वह हमारा शून्य के विस्तार नीले चला है ! और नीचे लोग उस को देखते हैं, नापते हैं गति, उदय औ’ अस्त का इतिहास ! किंतु इतनी दीर्घ दूरी शून्य के उस कुछ-न-होने से बना जो नील का आकाश वह एक उत्तर दूरबीनों की सतत आलोचनाओं को न
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍म सप्‍ताह - मनुष्‍य का महाख्‍यान है मुक्‍ति‍बोध

नामवर सिंह नि‍र्विवाद रूप से सबसे बड़े आलोचक हैं। लेकि‍न आलोचना में मुक्‍ति‍बोध की छाया का भी स्‍पर्श क्‍यों नहीं कर पाए ? मुक्‍ति‍बोध ने आलोचना को जि‍स जमीन पर ले जाकर छोड़ा था उसके आगे क्‍यों नहीं ले जा पाए ? क्‍या नामवर सिंह जैसे समर्थ आलोचक से यह
 
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मुक्‍ति‍बोध के जन्‍मदि‍न नेट सप्‍ताह पर वि‍शेष: मजदूरबोध का महान कवि‍ मुक्‍ति‍बोध -वि‍श्‍वनाथ त्रि‍पाठी

सबसे पहली बात यह कि‍ मुक्‍ति‍बोध अखण्‍ड भाकपा के सदस्‍य थे। शमशेरबहादुर सिंह ने 'चॉंद मुँह टेढ़ा है' की जो भूमि‍का लि‍खी है , उसमें लि‍खा है , वे मजदूरों के जुलूसों में भाग लेते थे, जुलूस पर जो पुलि‍स के अत्‍याचार होते थे उसे प्रत्‍यक्ष देखा और झेला
 
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मुक्‍ति‍बोध नेट जन्‍मदि‍न सप्‍ताह पर वि‍शेष: नए जनवादी वि‍कल्‍प का आधार हैं मुक्‍ति‍बोध

अरूण माहेश्‍वरी मुक्तिबोध की मृत्यु 1964 में हुई। जीवन में उन्होंने खूब लिखा। नेमीचंद जैन ने छ: खंडों में जो मुक्तिबोध रचनावली संकलित की है , उसके अतिरिक्त भी उनका लिखा का
 
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दिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांगउटांग / गजानन माधव मुक्तिबोध

दिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांगउटांग स्वप्न के भीतर स्वप्न, विचारधारा के भीतर और एक अन्य सघन विचारधारा प्रच्छन!! कथ्य के भीतर एक अनुरोधी विरुद्ध विपरीत, नेपथ्य संगीत!! मस्तिष्क के भीतर एक मस्तिष्क उसके भी अन्दर एक और कक्ष कक्ष के भीतर एक गुप्त प्रकोष्ठ औ
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍मदि‍न नेट सप्‍ताह : धर्मनि‍रपेक्ष नजरि‍या था मुक्‍ति‍बोध का

मुक्‍ति‍बोध ने हि‍न्‍दू धर्म और दर्शन की धर्मनि‍रपेक्ष व्‍याख्‍या नि‍र्मित की है।‍ सबसे पहले हम देवी-देवताओं के संदर्भ में उनकी व्‍याख्‍याओं को देखें। आम तौर पर देवी-देवताओं की देवत्‍ववादी व्‍याख्‍याएं मि‍लती हैं। इस मूल्‍यांकन में मुक्‍ति‍बोध देवत्‍
 
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍मदि‍न नेट सप्‍ताह पर वि‍शेष: जबाबी गदर थे मुक्‍ति‍बोध -चंचल चौहान

मुक्तिबोध को कला को सिर्फ कला तक सीमित करके देखना उन्हें पसंद नहीं था । कला की सामाजिक पक्षधरता का उदघोष उन्होंने किया और इसी नजरिये से उन्होंने अपने समय के सभी साहित्यिक मसलों पर लिखा । कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम के हर नारे का तर्कसंगत जवाब मुक्तिबो
 
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अंधेरे में / गजानन माधव मुक्तिबोध

ब्रह्मराक्षस’ और ’अंधेरे में’ वे प्रतिनिधि कविताएं हैं जिनसे मुक्तिबोध की कविता और उनकी रचना प्रक्रिया को समझा जा सकता है . कुबेरनाथ राय ने लिखा है,जैसे ’टिण्टर्न ऐबी’ और ’इम्मॉर्टलिटी ओड’ को पढ़कर वर्ड्सवर्थ को या ’राम की शक्तिपूजा’ ,’बादल राग’ और ’
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍म दि‍न नेट सप्‍ताह पर वि‍शेष: मुक्‍ति‍बोध ने मार्क्‍सवाद का अति‍क्रमण कि‍या -अशोक बाजपेयी

बड़े लेखक के सामने एक समस्‍या नहीं होती ।अनेक समस्‍याएं होती हैं। यह स्‍थि‍ति‍ मुक्‍ति‍बोध की भी है। समस्‍या बहुलता एक स्‍तर पर छायावादी भाषा संस्‍कार की थी ,उस समय के जो छायावादोत्‍तर कवि‍ कहलाते हैं,बच्‍चन,दि‍नकर इत्यादि‍ इनसे अलग भाषा संस्‍कार की
 
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍मदि‍न नेट सप्‍ताह पर वि‍शेष: ब्रह्मराक्षस

ब्रह्मराक्षस ’ और ’ अंधेरे में ’ मुक्‍ति‍बोध की प्रतिनिधि कविताएं हैं । इनसे मुक्तिबोध की कविता और रचना प्रक्रिया को समझा जा सकता है । कुबेरनाथ राय ने लिखा है , जैसे ’ टिण्टर्न ऐबी ’ और ’ इम्मॉर्टलिटी ओड ’ को पढ़कर वर्ड्सवर्थ को या ’ राम की शक
 
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍मदि‍न नेट सप्‍ताह पर वि‍शेष: स्‍वाधीनता समीक्षा के बड़े आलोचक हैं मुक्‍ति‍बोध

सुधीश पचौरी     मुक्‍ति‍बोध की चि‍न्‍ता के केन्‍द्रीय वि‍षय हैं प्रेम और सौंदर्य। बुनि‍यादी प्रश्‍न मुक्‍ति‍बोध की कवि‍ता में ही आ गया है                  'समस्
 
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ब्रह्मराक्षस / गजानन माधव मुक्तिबोध

ब्रह्मराक्षस’ और ’अंधेरे में’ वे प्रतिनिधि कविताएं हैं जिनसे मुक्तिबोध की कविता और उनकी रचना प्रक्रिया को समझा जा सकता है . कुबेरनाथ राय ने लिखा है,जैसे ’टिण्टर्न ऐबी’ और ’इम्मॉर्टलिटी ओड’ को पढ़कर वर्ड्सवर्थ को या ’राम की शक्तिपूजा’ ,’बादल राग’ और ’
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍मदि‍न नेट सप्‍ताह पर वि‍शेष: धूर्तता और मूर्खता के जीवंत नायक

मुक्‍ति‍बोध के बारे में एक बात जरूर माननी पड़ेगी कि‍ उनकी नजर पैनी थी, और यथार्थ पर गहरी पकड़ थी। यह बात मैंने कल नि‍खि‍ल दा से कही थी कि‍ हि‍न्‍दी में एक ऐसा भी लेखक था जो साहि‍त्‍य की ही नहीं हि‍न्‍दी प्रोफेसरों की भी नब्‍ज अच्‍छी तरह से पहचानता था
 
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हमहूँ मुक्तिबोध

हमहूँ मुक्ति हमहूँ बोध हमहूँ मुक्तिबोध। बोधुआ भी कर रहा मुक्ति पर शोध जो केहु टोके करता है किरोध। हमने कहा छोड़ आगे बढ़ का मुक्तिबोध के बाद कोर्ई नहीं हुआ उठाया जिसने अभिव्यक्ति का खतरा ? उसने देखा हमने जारी रखा अपना फेंका अगर ये सच है कि मुक्त
 
गिरिजेश राव
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मुक्तिबोध की कविता - मैं उनका ही होता

मैं उनका ही होता, जिन में मैंने रूप-भाव पाये हैं वे मेरे ही हिये बंधे हैं जो मर्यादायें लाये हैं मेरे शब्द,भाव उनके हैं, मेरे पैर और पथ मेरा, मेरा अंत और अथ मेरा, ऐसे किन्तु चाव उनके हैं मैं ऊँचा होता चलता हूँ उनके ओछेपन से गिर-गिर, उनके छिछलेपन से ख
 
AlbelaKhatri.com
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सरमस्तों की महफ़िल में गजानन मुक्तिबोध आया

ज़माने भर का कोई इस क़दर अपना न हो जाए कि अपनी ज़िंदगी ख़ुद आपको बेगाना हो जाए। सहर होगी ये शब बीतेगी और ऐसी सहर होगी कि बेहोशी हमारे होश का पैमाना हो जाए। किरन फूटी है ज़ख़्मों के लहू से : यह नया दिन है : दिलों की रोशनी के फूल हैं – नज़राना हो जाए।
 
रंगनाथ सिंह
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मुक्तिबोध राष्ट्रीय नाट्य समारोह /नाटक में दर्शकों का सीधा संवाद- सथ्यू

संजीत त्रिपाठीरायपुर। रेडियो, टीवी और सिनेमा से नाटक को धक्का पहुंचने की बात गलत है। नाटक में कलाकार व दर्शकों का सीधा संवाद होता है। नाटक कभी खत्म नहीं हो सकता। यह बातें प्रसिद्ध फिल्मकार एम एस सथ्यू ने 13वें मुक्तिबोध राष्ट्रीय नाट्य समारोह की शुरु
 
ambrish kumar
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍मदि‍न नेट सप्‍ताह : ऐ इंसानो,ओस न चाटो

छायावादोत्तर प्रगतिशील कविता की एक परम्परा केदारनाथ अग्रवाल,नागार्जुन और त्रिलोचन की है तो दूसरी परम्परा के वाहक हैं मुक्तिबोध . बीसवीं सदी की हिंदी कविता का सबसे बेचैन,सबसे तड़पता हुआ और सबसे ईमानदार स्वर हैं गजानन माधव मुक्तिबोध . मुक्तिबोध की कवित
 
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मुक्तिबोध को उनके जनम दिन पर याद करते हुए एक छोटी सी कविता

कवि का स्वप्न नींद के घोड़े पर सवार किसी स्वप्न की तलाश में जाने को था सुकवि कि बिजली चमकी बादल गरजे आकाशवाणी ‘मुक्ति के रास्ते अकेले में नहीं मिलते !’ (दिलीप शाक्य)
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍म दि‍न नेट सप्‍ताह पर वि‍शेष :- ज़ि‍न्‍दगी में जो कुछ महान् है

ज़ि‍न्‍दगी में जो कुछ महान् है ज़ि‍न्‍दगी में जो कुछ महान है कल्‍पना या भास नहीं है
 
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मुक्तिबोध के साथ तीन दिन : कमलेश्वर

स्व. कमलेश्वर मुक्तिबोध को याद करूँ तो ज़्यादा यादें मेरे पास नहीं हैं पर जो हैं वे अप्रतिम और बहुत कारगर यादें हैं. कई बार ही शंकर परसाई से यह तय हुआ कि राजनादगाँव जाकर मुक्तिबोध से मिलना है. यह प्रोग्राम कभी बन नहीं पाया क्योंकि मैं उन दिनों ‘सारिक
 
Nilofar
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍मदि‍न नेट सप्‍ताह पर वि‍शेष- मुक्‍ति‍बोध ने काव्‍य शि‍ल्‍प के नए मानक बनाए - मैनेजर पांडेय

मुक्तिबोध के लेखन और वैचारिक चुनौतियों के संदर्भ में प्रो मैनेजर पाण्डेय के साथ सुधा सिंह की बातचीत .............. प्रश्न : मुक्तिबोध जब लिख रहे थे तो उनके लेखन में सबसे प्रमुख प्रश्न कौन सा था ? उत्तर : मुक्तिबोध के सामने जो मुख्य समस्या या सवाल उठा
 
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ब्रह्मराक्षस का सजल उर शिष्य : मुक्तिबोध

छायावादोत्तर प्रगतिशील कविता की एक परम्परा केदारनाथ अग्रवाल,नागार्जुन और त्रिलोचन की है तो दूसरी परम्परा के वाहक हैं मुक्तिबोध . बीसवीं सदी की हिंदी कविता का सबसे बेचैन,सबसे तड़पता हुआ और सबसे ईमानदार स्वर हैं गजानन माधव मुक्तिबोध . मुक्तिबोध की कवित
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...गजानन माधव मुक्तिबोध की दो कविताऍं

ब्रह्मराक्षस गजानन माधव मुक्तिबोध शहर के उस ओर खँडहर की तरफ़ परित्यक्त सूनी बावड़ी के भीतरी ठण्डे अँधेरे में बसी गहराइयाँ जल की… सीढ़ियाँ डूबी अनेकों उस पुराने घिरे पानी में… समझ में आ न सकता हो कि जैसे बात का आधार लेकिन बात गहरी हो।बावड़ी को घेर डाल
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍म दि‍न नेट सप्‍ताह पर वि‍शेष : इस युग के सबसे बड़े वि‍चारक हैं मुक्‍ति‍बोध- शि‍वकुमार मि‍श्र

स्‍वतंत्र भारत के सबसे बड़े वि‍चारक हैं मुक्‍ति‍बोध। उन्‍हें न तो देवता बनाने जरूरत है और न पूजने की जरूरत है। व्‍यक्‍ति‍गत और साहि‍त्‍यि‍क ईमानदारी में उनका कोई जबाव नहीं है। उन्‍होंने अपनी आलोचना से हि‍न्‍दी आलोचना का इकहरापन तोड़ा है। आलोचना में स
 
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