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गुरूपर्व के परम पावन अवसर पर हिन्दू और हिन्दूत्व के रक्षक दशमेश श्री गुरु गोबिन्दसिंहजी के श्रीचरणों में..

जिकर आफ़ाक़ न हुन्दा,तां धरती दा बिन्दू किंवें होन्दा ?जिकर होन्दा न अक्खां विच पाणी,तां फेर सिन्धु किंवें होन्दा ?हिन्दू अते सिक्ख विच फ़र्क करण वालयो ,तवारीख कैन्दी एजिकर सिक्ख न होन्दा,तां फेर हिन्दू हिन्दू किंवें होन्दा ?
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वह कुछ भी हो, साहित्य नहीं

जो करे उजाला नित्य नहींवो दीपक है, आदित्य नहींजिसमें जन का कुछ हित नहींवह कुछ भी हो, साहित्य नहीं