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“नाइस-सुमन को सुझाव” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

 "नाइस-सुमन"सुमन स्वयं तुम नाइस हो,नाइस लिखना अब छोड़ो!अपनी शब्दों की माला में,नया शब्द अब जोड़ो!!ऊब गये सब देख-देख यह,कोई नव्य प्रयोग करो!पीछा छोड़ो अब तो इसका,नया वाक्य उपयोग करो!!
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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एक पत्र एका दुरावलेल्या नात्याला.............

प्रिय ठीक आहेस नं? मी फार अस्वस्थ होते. इतकी बोच मला याआधी कशाचीच लागली नव्हती. विशेषतः तुला काय काय आरोपांना तोंड द्यावे लागले असेल या विचारानेच मला फार ताण आला होता.मी तुला समजू शकते. तुझा भावूक, आर्त स्वभाव समजू शकते. तुझ्या या ऋजू वागणूकीचीच तर मला
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लतीफे बज़्म में ना हो, कभी काबिज़ मेरे यारो

परिंदा कह गया हमको, खुदा हाफिज़ मेरे यारो चमन में चह चहे कायम,रहे हरगिज़ मेरे यारो हमारा फ़र्ज़ है महफिल में, केवल शायरी होवे लतीफे बज़्म में ना हो, कभी काबिज़ मेरे यारो
 
किशोर पारीक 'किशोर'
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“एक पुराना मुक्तक” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“आज नेट की चाल बहुत मद्धिम है” इसलिए बस ये मुक्तक ही देख लीजिए!  दुर्बल पौधों को ही ज्यादा, पानी-खाद मिला करती है।चालू शेरों पर ही अक्सर, ज्यादा दाद मिला करती हैसूखे पेड़ों पर बसन्त का, कोई असर नही होता है-यौवन ढल जाने पर
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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मुक्तक : तिरंगा

मुक्तक : तिरंगा भारत की आत्मा का है, रूप यह तिरंगा हमको सदा से लगता, अनूप यह तिरंगा जब तक गगन में होंगे, सूरज चंदा तारे तब तक रहेगा कायम, स्वरुप यह तिरंगा लारा रहा है जग में, चितचोर यह तिरंगा सैनिक के बाजुओं में, बन जोर यह तिरंगाकश्मीर पे गड़ाई,
 
किशोर पारीक 'किशोर'
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मुक्तक : सरताज है हिमालय, कश्मीर नयनतारा

सरताज है हिमालय, कश्मीर नयनतारा चरणों को धोये सागर, नहलाती गंगधाराअवतार ओ पयम्बर, खेले धारा पे जिसकेऐसा अतुल्य भारत, प्राणों से भी प्यारा ! सीरत रही है जिसकी, सद्भाव भाई
 
किशोर पारीक 'किशोर'
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देशभक्ति कुछ मुक्तक

देशभक्ति  कुछ मुक्तक जिसने दी है जान देश हित, उनका वंदन और नमन जिसने रखी शान देश की, उनका करते अभिनन्दन फँसी  के   फंदे चूमे, सीने पर गोली  खाई भारत माँ के वीर सपूतों, तुमको वंदन और नमन गाइये तुम गीत बंधू
 
किशोर पारीक 'किशोर'
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“एक मुक्तक” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

जल रहा स्वेद है चरागों में, पल रहा भेद है समाजों में! सूखती जा रही सजल सरिता, खल रहा छेद है रिवाजों में!
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘प्यार’ पर तीन मुक्तक

१- यह कैसा है प्यार तुम्हारा, तुमने हमको किया नकारा , तेरे खातिर प्राण दे दिए, फिर क्यों मेरा प्यार है हारा? २- साँसों से साँसें टकराई, तब हमने थीं कसमें खाईं, साथ जिऐंगे, साथ मरेंगे, दिल ने दिल से करी सगाई । ३- प्यार हमें तरसाता भी है, प्यार हमें सहलाता
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दीवारों से झाँक रहे हैं

लोगों के घर लूट रहे हैं अपने घर लुटवा के लोगजाने कब ओले पड़ जाएँ बैठे सर घुटवा के लोगतब भी इनको चैन नहीं था अब भी इनको चैन नहींदीवारों से झाँक रहे हैं दीवारें उठवा के लोग ................www.albelakhatri.com
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एक मुक्तक

बहरे मुतकारिब सालिम मक़बूज असलम (१६ रुक्नी) जिस पर इस बार की तरही भी है और गुरु जी ने ढेरों गीत इस बहर पर बता रखे हैं। इसी बहर पर ये ताज़ा ताज़ा मुक्तक गुरु जी के आशीष से....मिलो किसी से तो अपना दिल तुम,ना पूरा पूरा उठा के रखना।वो जैसा दिखता है, हो कि ना
 
कंचन सिंह चौहान
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मुक्तक

दिल दिया जिसको मैंने, मेरा तो मनमीत वही है .गीत लिखे कितने ही मैंने, लेकिन प्यार का गीत वही है.सुने राग मल्हार, भैरवी रास न आया कोई आज,मैं तो प्यार की सरगम छेड़ूँ, मेरा तो संगीत वही है.
 
अखिलेश सोनी
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बहुत जल्दी मुझे भी इसलिए गुस्सा नहीं आता

मुहब्बत में मेरी पत्नी ग़ज़ल का शे'र लगती हैखफ़ा हो जाये तो बारूद का इक ढेर लगती हैबहुत जल्दी मुझे भी इसलिए गुस्सा नहीं आताबड़ा बरतन गरम होने में थोड़ी देर लगती है-खामखाह हैदराबादी
 
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शुभ कामनाएं

दीपिका की ज्योत बस जलती रहे स्नेह की सरिता यूँ ही बहती रहे आप जैसे दोस्तों का साथ हो ज़िन्दगी यूँ ही सदा हँसती रहे दीप पर्व की ढेर सारी शुभ कामनाओं के साथ :
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दो मुक्तक

१. रात इक शबनमी है चले आइये आँसुओं में नमी है चले आइये अब उजाला कहीं दीख पड़ता नहीं चाँदनी की कमी है चले आइये । २. नज़ारे बेमिसाल देखे हैं हादसे और कमाल देखे हैं मैं ढूँढ रहा हूँ हल जिनका तेरी चुप में सवाल देखे हैं ।
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एक मुक्तक

हार कर जो न हारे, जवानी लिखो दिल में गड़ जाये गहरी, निशानी लिखो ख्वाब की आबरु को बचाना ही है उन अधूरे पलों को, कहानी लिखो ।
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पाँच मुक्तक .... तुम्हारे लिये

१. प्रणय की प्रेरणा तुम हो विरह की वेदना तुम हो निगाहों में तुम्ही तुम हो समय की चेतना तुम हो । २. तृप्ति का अहसास तुम हो बिन बुझी सी प्यास तुम हो मौत से अब डर नहीं है ज़िन्दगी की आस तुम हो । ३. सपनों का अध्याय तुम्ही हो फ़ूलों का पर्याय तुम्ही हो एक प
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दो मुक्तक

तुम को देखा तो चेहरे पे नूर आ गया हौले हौले ज़रा सा सुरूर आ गया तुम जो बाँहों में आईं लजाते हुए हम को खुद पे ज़रा सा गुरूर आ गया --- ज़िन्दगी गुनगुनाई , कहो क्या करें ? चाँदनी मुस्कुराई, कहो क्या करें ? मुद्दतों की तपस्या है पूरी हुई आप बाँहों में आईं,
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मुक्तक

गुनगुनी सी हवा है बहूँ ना बहूँ अजनबी वेदना है सहूँ ना सहूँ मुस्कुराते हुए गीत और छन्द में अनमनी सी व्यथा है कहूँ ना कहूँ ?
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मुक्तक

वो लाज को आँखों में छुपाये तो छुपाये कैसे वो मुझ से दूर भी अगर जाये तो जाये कैसे वो मेरी रूह की हर रग रग में शामिल है वो मुझ से बदन को चुराये तो चुराये कैसे ?
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मुक्तक

मुश्किल जब कोई आएँगी तेरे सामने हाथ कोई भी न आयेंगें तुझको थामने याद आएँगी तुझे वो सोहबतें मेरी रोओगी तुम मेरी तस्वीर रखकर सामने
 
अखिलेश सोनी
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रोज की तरह

रोज की तरह हम सुबह उठकर घर से बाहर मोहल्ले की ओर देखते हैं कि आज के सूरज के नयेपन जैसा कुछ हम में भी उगेगा। पर हर ढलती शाम को काम धंधे से लौटते हुए हमने यही पाया है कि सवेरा तो सवेरा हमारी यह शाम भी कल की शाम की तरह ही हजारों साल बासी है। यही बासापन
 
Rajey Sha
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किसी ने अल्लाह कह के मारा किसी ने राम कह के मारा

किसी ने अल्लाह कह के मारा किसी ने राम कह के मारा जो बच गए इससे उन्हें सद्दाम कह के मारा जो आये थे घर छोड़ शहर दो रोटी कमाने को “क्यों छिनने आये हो हमारा काम” कह के मारा कहते हैं जिससे बड़ी नहीं कोई और इबादत दुनिया में हाँ इसी इश्क करने की
 
Shubhashish Pandey
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"सीख गये है कदम बढ़ाना!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

वैवाहिक जीवन की 36वीं वर्ष-गाँठ !! -: कुछ-मुक्तक :- जब करते थे नही बड़ाई, तब होती थी बहुत लड़ाई। प्रेम-प्रीत के घर-आँगन में, अच्छी होती नही कड़ाई।। जीवन का ताना और बाना, हमको आता है  सुलझाना। टेढ़ी-मेढ़ी पगदण्डी पर,  सीख गये है कद
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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प्रपंच और चापलूसी

१- प्रपंच का भी आज आधुनिकरण हो गया है इसलिए चौपाल छोड़ नेट-ग्रुप में हो गया है, यहाँ पर भी है अँधेर नगरी का चौपट राजा, टके सेर भाजी और टके सेर खाजा हो गया है। २- प्रणाम और चापलूसी कर प्रशंसा पा लेते हैं, खुद को महाकवि मान अनुशंसा कर लेते हैं, कूपमण्ड
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हरदम खुद को खो देता हूँ।

बीते बचपन की यादों में, मैं ख्वाबों में रो देता हूँ। मेरे सपने किसी ने पढ़े नहीं, बस लिखता हूं, धो देता हूँ। जाने क्या पाना चाहता हूँ,? हरदम खुद को खो देता हूँ। उनके ख्वाबों के इंतजार में, मैं भी इक पहर सो लेता हूँ। चाहता हूं आम ही लगें मगर, फिर क्यों
 
Rajey Sha
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अजनबी - 2

नहीं ये मेरा शिकवा नहीं है नहीं ये मेरा गिला नहीं है दरअसल अपने में ही अजनबीयत के सिवा मुझे कुछ मिला नहीं है। मैं एक तिनके सा नदी की धार में बह रहा हूँ नदी से खुद से ही अजनबी मैंने लोगों से सुना है आदमीयत की पैदाइश से ही हमेशा ऐसा ही रहा है कि कुछ भल
 
Rajey Sha
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मुक्तक

अपनी पलकों पे आब रखती हूंमैं भी आंखों में ख्वाब रखती हूंबिन तेरे कैसे कटा है ये सफ़रहमसफ़र ये हिसाब रखती हूंसबकी आंखों में एक समन्दर हैंकितना धुंधला हर एक मंज़र हैहंस रहा आदमी बस बाहर सेसच तो कुछ और है जो अंदर हैगर बदी है तो संग शराफ़त हैप्यार है तो ही तो
 
ॠतु गोयल
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मुक्तक

दुःख में पीडा में पले जो उसका अभिनन्दन करेंजब जरूरत हो जले जो, उसका अभिनन्दन करेंयूँ तो चलने को सभी चलते हैं जीवन राह परभीड़ से हटकर चले जो उसका अभिनन्दन करें
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तेज बनकर सच कलम ...................

तेज बनकर सच कलम के साथ चलना चाहिएआज वीणावादिनी यह स्वप्न पलना चाहिएजो मिटा दे हर अँधेरा, कर दे रोशन विश्व कोशारदे माँ ज्ञान का वो दीप जलना चाहिए
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बदल

जेव्हा मी आरशात बघतो तेव्हा समजतच नाही मला हा कोण? की समजतंच नाही मला मी कोण? साहेब, दिवसा दिवसाला, तासा तासाला, सेकंदा सेकंदाला माणूस बदलत असतो? मी बदलत असतो बहुतेक साहेब. कालचा मी मला आज ओळखू येत नाही, साहेब. अनोळखी वाटतो. पहिली ते दहावी प्रत्येक
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आर-पार हो गया

जब से तुम्हारे हुस्न का दीदार हो गया मैं आदमी था काम का बेकार हो गया मारा जो तूने खींच कर अबरू-गुलेल से वो संग इस जिगर के आर-पार हो गया
 
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हाथ पीले हो गए

हुस्न के तेवर नुकीले हो गए इश्क़ के सब जोड़ ढीले हो गए हो गए कुछ लेट हम इज़हार में और उनके हाथ पीले हो गए
 
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तरसता रह गया

आँख से आंसू बरसता रह गया तन-बदन यौवन झुलसता रह गया मिल गया तन को समर्पण और मन एक चुम्बन को तरसता रह गया
 
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आफ़ताब सी लगे

वक़्ते-सहर जो देखूं तो गुलाब सी लगे और शब् को तू विलायती शराब सी लगे घूंघट में जब लजाये, मॉहताब सी लगे चिलमन जो हटाये तो आफ़ताब सी लगे
 
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फाड़ी न जायेगी

हमसे तो तू नज़र से उतारी न जायेगी गोली तो दूर, आँख भी मारी न जायेगी तूने तो इस जिगर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हमसे तो तेरी फोटो भी फाड़ी न जायेगी
 
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पूरा जाम दे दिया

चाहत का इनाम दे दिया कोशिश को अन्जाम दे दिया मैंने एक घूँट मांगी थी तुमने पूरा जाम दे दिया
 
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मैंने इक चुम्बन माँगा था

तुमने कितना प्यार दे दिया जीने का आधार दे दिया मैंने इक चुम्बन माँगा था तुमने हर अधिकार दे दिया
 
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कुछ रिश्तों के लिए

१- तेरे प्यार का यह कैसा भरम है? नहीं पास तुम हो,नहीं दूर हम हैं। नहीं देते हँसने,नहीं देते रोने, [...]
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कुछ मुक्तक

कुछ मुक्तक पारदर्शी तेरा आवरण कर न पाया तुझे संवरण मैंने दर्शन बहुत कुछ पढ़ा पढ़ न पाया तेरा व्याकरण -- ० -- भावना का स्वरुपण हुआ अर्चना का निमंत्रण हुआ फूल क्या मैं धरूँ देवता ! ----०----- आज अपना हूँ मैं संस्मरण तुम भले ही कहो विस्मरण आज स्वीकार कर ल
 
आनन्द पाठक