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प्यारी सी मुलाकात 'शिखा वार्ष्णेय' के साथ

यूँ तो शिखा से मिले एक महिना बीत गया. पर मैं इंतज़ार कर रही थी कि वो वापस लन्दन आकर ब्लॉग की दुनिया में लौटे तभी यह संस्मरण पेश करूँ. अभी लिखने बैठी तो लगा अरे..सब कुछ तो वैसा ही ताज़ा सहेजा हुआ है, मस्तिष्क में ,जैसे कल मिले हो. शिखा को पहले उसके दिए,
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सपनो के शहर मुंबई में सच होता एक सपना

आज Mumbai Mirror (लोकल अखबार) में एक खबर पढ़ी तो सोचा आप सब से बाँट लूँ. आजकल अखबारों में हत्या,लूटपाट,धोखा धडी की ख़बरों से ऐसा पटा होता है कि ऐसी कोई खबर पढो तो लगता है हाँ ज़िन्दगी सांस ले रही है. उम्मीद मिटी नहीं है.ईमानदारी, मानवता सब इस दुनिया में
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मनात आलं ते….

सकाळी फिरायला जातो रोज, तेंव्हा हातामधे बिसलेरीच्या बाटल्या घेउन जाणारे बरेच लोक दिसतात. मुंबईच्या टॉयलेटीकेट्स बद्दल तर न बोललेलेच बरे. मालाडहुन लोकलने निघालो की स्पेशली बांद्रा भागात रेल्वे ट्रॅकच्या कडेने बसलेले बरेच माणसं दिसतात. बांद्रा आलं की
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१०:१६ ची फास्ट लोकल

सकाळचे १०:१५ बस मधून उतरलो आणि स्टेशनकडे तडक निघालो..लेट झाला होता ११ ला अंधेरी चकालाला पोचायच होत. स्टेशनच्या पायर्‍या चढून प्लॅटफॉर्मवर आलो आणि समोर नजर टाकली… बाप रे..एवढी गर्दी (आता मला सकाळचे ऑफीस अवर्सची नवीनच, कारण नेहमी जगाच्या उलट्या
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मैं मुंबई हूं...

मैं मुंबई हूं। मैं पहले एक टापू थी। मुंबादेवी के नाम से मेरा नाम मुंबई पड़ा। पहले मेरी पहचान मछुआरों के गांव से अधिक कुछ नहीं थी। 'कोली' समाज के लोग तब यहां रहा करते थे। तांदले, नाखवा, भोईर, भांजी, सांधे, कलसे वगैरह सब कोली समाज के ही लोग हैं। मछली
 
अवधेश आकोदिया
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मुंबई किसकी? मेरी और क्या!

अफसोस, फिक्र और दुआ। ये तीन अहसास हैं, जो मुंबई के जिक्र के साथ मेरे मन में उठते हैं। मुंबई की फितरत बन गई है खबरों में रहने की और वह भी गलत बातों के लिए। यह मुंबई उन किस्सों का शहर नहीं रही, जिनमें उसे कभी मायानगरी कहा जाता था और कभी ड्रीम सिटी। अब
 
संजय खाती
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एकांकिका- “लक्ष्मी हरवली आहे”

पात्रे : ७०- ७५ वर्षीय आजोबा ४५ वर्षीय वडील: श्री १९ – २० वर्षीय मुलगा: कुमार काळ : आजचा प्रसंग : १ मेचा दिवस, सकाळी तिघांचे पेपर वाचन चालू आहे. पार्श्वसंगीत : “जय जय महाराष्ट्र माझा, गरजा महाराष्ट्र माझा” कुमार : आजोबा, मुंबई
 
आशिष कुलकर्णी
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अब हमें भी लड़ना होगा!

एक बार फिर दहशत और मौत का खूनी खेल! एक बार फिर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप! लेकिन इन सबसे अलग, एक बार फिर हमारे बहादुर जांबाजों की विजय. एक बार फिर हमारे पराक्रम की धूम. एक बार फिर हमारी एकता बरकरार. एक बार फिर इंसानियत के दुश्मनों की करारी शिकस्त. लेकि
 
ज़ाकिर हुसैन
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मत ध्यान बटाओं हमारा...

मुंबई में आतंकी हमले के बाद अंग्रेज दुम दबा कर भाग गये... ७-० से हारने से बेहतर था ५-० से हारना.. पूरा देश नेताओं से हिसाब माँग रहा है और आम आदमी इंसाफ कि उम्मीद में खडा़ है.. हम आक्रोशीत है.. और action चाहते है.. नेता अपना मानसिक संतुलन खो चुके और ’
 
रंजन
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दिल्ली अगर गंदी है तो दोषी आप और हम हैं...

सब इसे गरियाते रहते हैं। हर तीसरा शख्स इसकी कमियां गिनाता दिख जाएगा। बातचीत में जरा-सा छेड़ने भर की देर है, इसकी खिंचाई करते समय हर कोई लाठी लेकर दौड़ पड़ता है। आप कहेंगे - ये कौन? अरे दिल्ली, और कौन। पूछिए, दिल्ली कैसी है? दिल्ली-बॉर्न कहेंगे,
 
पूजा
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दिल्ली अगर गंदी है तो दोषी आप और हम हैं...

सब इसे गरियाते रहते हैं। हर तीसरा शख्स इसकी कमियां गिनाता दिख जाएगा। बातचीत में जरा-सा छेड़ने भर की देर है, इसकी खिंचाई करते समय हर कोई लाठी लेकर दौड़ पड़ता है। आप कहेंगे - ये कौन? अरे दिल्ली, और कौन। पूछिए, दिल्ली कैसी है? दिल्ली-बॉर्न कहेंगे,
 
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मुंबई की अस्मिता से खिलवाड़

मुंबई की अस्मिता से खिलवाड़ पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई में हुये आतंकी हमले से अभी देश उबर भी नहीं पाया है। उन हमलों का मुख्य आरोपी आमिर अजमल कसाब मुंबई की ही एक जेल में बंद है। 26\11 की पहली बरसी को महज दो हफ्ते हैं। और मुंबई की जनता को महाराष्ट्र क
 
पत्रकार
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समंदर न सही, नदी का किनारा ही मिल जाता

मैं वहां अचानक पहुंची थी। पानी के लिए तरसते इस शहर में पिछले महीने 3-4 दिन की बारिश में ही यमुना में उफान आ गया था। वहां पहुंचने पर दूर से ही मुझे काफी भीड़ दिखाई दी। मुझे लगा कोई ऐक्सिडेंट हो गया है , इसीलिए इतनी भीड़ जुटी है। खबर की डीटेल लेने के इ
 
पूनम पांडे
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हाय रे ज़माना, ढहते शहर का फ़साना.. ?

मुंबई में मानसून की झड़ि‍यों को शुरू हुए आज यह तीसरा दिन है, और ध्‍यान दीजिए अभी झमाझम वाली बौछारें, मुसलधारें नहीं शुरू हुई हैं. महज़ झड़ि‍यां हैं ये, मासूम, झड़ी, जैसे बड़ी होती है मैंगलोर स्‍टॉल वाला मेंदू बड़ा नहीं, मगर हाय रे ज़माना वाले फ़साने
 
Pramod Singh
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