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भास्‍कर समूह की मासिक पत्रिका अहा जिंदगी और लक्ष्‍य के नये संपादक होंगे आलोक श्रीवास्‍तव।

कभी धर्मयुग, साप्‍ताहिक हिंदुस्‍तान जैसी पत्रिकाएं हिंदी क्षेत्र में जो सांस्‍कृतिक प्रभाव रखती थीं, वैसे ही कुछ इरादों के साथ भास्‍कर समूह ने अहा जिंदगी का प्रकाशन छह साल पहले शुरू किया था। अहा जिंदगी यशवंत व्‍यास के संपादन में शुरू हुई थी और लोकप्रियता
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विन्डोज मीडिया प्लेयर में आटो प्लेलिस्ट बनायें! (Auto Playlists)

हजारों-लाखों संगीत फाइल्स में से अपने विशिष्ट पसंद के संगीत को सुनने के लिये आटो प्लेलिस्ट्स (Auto Playlists) बहुत ही उत्तम सुविधा है। मान लीजिये आपके कम्प्यूटर में पुरानी फिल्म संगीत के डेढ़-दो हजार गाने हैं और आज आपकी इच्छा केवल किशोर दा के गाये गानों
 
जी.के. अवधिया
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विन्डोज मीडिया प्लेयर, कुछ विशेष जानकारी! (Windows Media Player)

ऐसा कोई भी कम्प्यूटर प्रयोगकर्ता नहीं होगा जिसने विन्डोज मीडिया प्लेयर! (Windows Media Player) का प्रयोग न किया हो। चाहे संगीत का आनन्द लेना हो या फिर मूव्ही देखना हो, हमें इसकी सहायता लेनी पड़ती है। विन्डोज मीडिया प्लेयर! (Windows Media Player)
 
जी.के. अवधिया
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मल्टीमीडिया के विषय में जानें! (Multimedia)

मल्टीमीडिया की परिभाषा मल्टीमीडिया (multimedia) अंग्रेजी के multi तथा media शब्दों से मिलकर बना है। Multi का अर्थ होता है ‘बहु’ या ‘विविध’ और Media का अर्थ है ‘माध्यम’। मल्टीमीडिया एक माध्यम होता है जिसके द्वारा
 
जी.के. अवधिया
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मनमोहन के फंदे में मीडिया

मीडिया के पेड न्यूज की कहानी सत्ता के लिये लॉबिंग और कॉरपोरेट घरानों के मुनाफे के लिये बिचौलिये की भूमिका तक पहुंचेगी, यह किसने सोचा होगा। खासकर उस दौर में जब पूंजी ही एक नयी सत्ता बनकर लोकतांत्रिक सत्ता को चुनौती दे रही हो। वैसे मीडिया का राजनीति से
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कश्मीर घाटी के लोग आज़ादी चाहते हैं! यह कैसी रिपोर्टिंग?

बीबीसी की हिन्दी सेवा की आज की मुख्य खबर है - भारत प्रशासित (यह ब्रिटिश सेवा है इसलिए ऐसा लिखती है) कश्मीर घाटी के लोग आज़ादी चाहते हैं. यह खबर एक सर्वे पर आधारित है जिसे एक ब्रितानी कथाकथित अकादमिक ने किया है. इस खबर पर नज़र डालें तो इसमें तथ्यात्मक भूलें
 
पंकज बेंगाणी
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अपराध रिपोर्टिंग का “अपराध”

समाचार चैनलों में अपराध की खबरों को लेकर एक अतिरिक्त उत्साह दिखाई पड़ता है. आश्चर्य नहीं कि चैनलों पर अपराध की खबरों को काफी जगह मिलती है. हिंदी के अधिकांश समाचार चैनलों पर अपराध के विशेष कार्यक्रम भी दिखाए जाते हैं. लेकिन अगर अपराध की वह खबर
 
आनंद प्रधान
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तीसरा रास्ता...

मोदी, आई.पी.एल और फीलगुड पत्रकारिता का घना होता अँधेरा “पत्रकारिता का पहला नियम है: कोई भगवान नहीं होता है. और अगर कोई भगवान की तरह दिखता है तो आमतौर पर उसके पैर कीचड़ में सने होते हैं. कुछ यही हुआ, तेजतर्रार, सरपट बोलनेवाले एक ४६ वर्षीय व्यक्ति के साथ जो
 
आनंद प्रधान
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तीसरा रास्ता...

तमाशा मेरे आगेअंधराष्ट्रवादी और पैपराजी चैनलों के दौर में सेलिब्रिटी शादी कहते हैं कि आदतें मुश्किल से छूटती हैं. बुरी आदतें और भी मुश्किल से छूटती हैं. अपने समाचार चैनलों के साथ भी यह बात सौ फीसदी सही लगती है. मुश्किल यह भी है कि समाचार चैनलों में अच्छी
 
आनंद प्रधान
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तीसरा रास्ता...

भूख और सुर्खी भूख पहली सुर्खी क्यों नहीं है? ऐसा अब बहुत कम दिखता है लेकिन प्रमुख अंग्रेजी दैनिक ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने देश में भूख के व्यापक साम्राज्य पर केंद्रित खबर को 24 मार्च को अपनी पहली लीड के बतौर पर छापा. उसके बाद उसने धारावाहिक रूप से देश के
 
आनंद प्रधान
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मीडिया में आदिवासी कहां हैं?

दंतेवाड़ा की घटना के बाद माओवाद को लेकर मुख्यधारा के समाचार मीडिया में जारी पूरी बहस में लगभग एक सुर से उसे कुचल देने की वकालत की जा रही है. अखबारों और चैनलों में बिना किसी लाग-लपेट के कहा जा रहा है कि ‘बहुत हुआ, अब और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता’(एनफ इस
 
आनंद प्रधान
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भारत की सबसे बड़ी समस्या

इंडियन प्रीमियर लीग का सही मैच अब शुरू हुआ है। क्रिकेट के मैदान से राजनीतिक गलियारे में अब खूब चौक-छक्के लगने लगे हैं। कल तक जो विपक्षी दल नक्सलवाद, महंगाई, गुदरात दंगों में नरेंद्र मोदी से जवाब-तलब, लिब्रहान आयोग, रंगनाथ कमीशन आदि मुद्दों को लेकर संसद
 
चन्दन कुमार
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सिर्फ टैम नहीं, रेटिंग की तानाशाही का विकल्प खोजिए

टी.आर.पी की मौजूदा व्यवस्था को लेकर जारी विवादों और बहस के बीच खबर है कि टेलीविजन प्रसारकों की संस्था- आई.बी.एफ और सरकार के बीच एक वैकल्पिक टी.वी रेटिंग प्रणाली शुरू करने पर सहमति हो गई है. इसके लिए टी.वी प्रसारणकर्ताओं ने खुद की कंपनी- ब्राडकास्ट आडिएंस
 
आनंद प्रधान
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तीसरा रास्ता...

माओवाद, मीडिया और सत्य की शक्ति देश के पूर्वी राज्यों- छत्तीसगढ़, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल में केंद्र और राज्य सरकारों ने माओवाद/नक्सलवाद के सफाए के लिए आपरेशन ग्रीन हंट शुरू कर रखा है. यू.पी.ए सरकार मानती है कि माओवाद देश की आतंरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा
 
आनंद प्रधान
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सरकार की पार्टनर मीडिया?

बॉलीवुड फिल्म ‘रण’ से लेकर ‘माय नेम इज खान’ और ‘गजनी’ से लेकर ‘थ्री इंडियट्स’ । कोई भी चर्चित फिल्म, जो बीते तीन-चार वर्षो में लोकप्रिय और हिट रही हो या फिर आने वाली हो, वो बिना मीडिया पार्टनर के आपको नजर नहीं आयेगी। पार्टनर बनने को लेकर होड़ भी कुछ इस
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आई पी एल से टक्कर तौबा तौबा..

यूँ तोह हर साल फरवरी और मार्च महीना फिल्म निर्माताओं की परेशानी का सबब होते हैं। क्योंकि इन महीनो में बच्चो को परीक्षाओं के चलते बोक्स आफिस पर नई फिल्मों का आगमन शुभ नहीं माना जाता। इस समय फिल्म निर्माताओं के साथ साथ सिनेमा घरों की खिड़कियाँ भी दर्शकों
 
Season..
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खबरदार करते न्यूज चैनलों में खबर कहां है?

संसद के अंदर-बाहर महिला आरक्षण बिल को लेकर हंगामा था। तमाम न्यूज चैनलों में बहस चल रही थी कि आरक्षण बिल पास होगा या नहीं। रिपोर्टरों से लेकर विशेषज्ञ इस मुद्दे पर जूझ रहे थे। अचानक हिन्दी के तीन टॉपमोस्ट राष्ट्रीय न्यूज चैनलो के पर्दैं पर ब्रेकिंग न्यूज
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हमारे सपनों का मर जाना

पाश एक पंजाबी कवि हैं। इनकी एक बेहतरीन रचना याद आ रही है। दरअसल यह लागू तो हर क्षेत्र और हर मायनों में हो सकती है। पर यहां मैं खासकर इसका इस्तेमाल मीडिया के संदर्भ में करना चाहता हूं। मीडिया वालों की जिंदगी भी कुछ इसी तरह की हो गई, जैसा कि अपनी इस कविता
 
चन्दन कुमार
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लोकविमर्श, असहमति का निषेध और षड्यंत्रपूर्ण शांति

दिलीप मंडलमुंबई को कोई मुंबई न कहे या चेन्नई और कोलकाता को उनके पुराने नाम से पुकारे तो क्या ऐसे शख्स को देश या इन शहरों में रहने का हक नहीं होना चाहिए? इसी तरह किसी महिला के कपड़े की लंबाई कम हो या घेरा पतला तो क्या इस बात के लिए उस पर पत्थर फेंके जाने
 
दिलीप मंडल
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अकेलेपन का रेगिस्तान है पोर्न फैंटेसी

पोर्न यथार्थ नहीं है। बल्कि फैंटेसी है। ऐसी फैंटेसी जो मर्द और स्त्री दोनों को नष्ट करती है। संबंध भी नष्ट करती है। इस फैंटेसी से बचने के लिए जरूरी है कि वास्तविक सामाजिक सबंधों में जीने का प्रयास किया जाए। आप अपना ज्यादातर समय इंटरनेट की बजाय वास्तव
 
jagadishwar chaturvedi
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धँधे की अँधी दौर में घायल होता ‘लोकतंत्र’ का ‘लोक’!

पुणे में हुए धमाके ने बहुत कुछ बदल कर रख दिया है जिसमें एक क्षणिक बदलाव शायद मीडिया के धँधे में भी दिखाई पड़ा, तभी तो आम तौर पर बड़बोलेपन की आदत के विपरीत थोड़ा संतुलित व्यवहार दिखाया गया। इस बदलाव का कारण शायद मुंबई धमाकों की गूँज का वह भूत है जो मीडिया
 
शशि शर्मा
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आमची मुम्बई-ग्रंथि का इतिहास-भूगोल

पुण्य प्रसून बाजपेयीमुंबई पर महाराष्ट्रीय गर्व करता है और अधिकार जमाना चाहता है, असल में उसके निर्माण में उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध के उन स्वप्नदृष्टा पारसियों की निर्णायक भूमिका रही, जो अंग्रेजो के प्रोत्साहन पर सूरत से मुंबई पहुंचे। लावजी
 
रंगनाथ सिंह
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खबरों का आतंक

कलम का जादूगर या कलम का सिपाही जैसे लफ्ज़ आज अपना मतलब खो चुके हैं. पत्रकारिता से क्रांति का गवाह रहा है हमारा देश. फिर एक लम्बा इतिहास रहा स्वतंत्र, निर्भीक और निष्पक्ष समाचारपत्रों का. और आज का दौर है इलेक्ट्रोनिक मीडिया का. ये समाचार "देता" नहीं
 
SAMVEDANA KE SWAR
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सिलसिला जो चल पडा है

शाह आलमजुड़वा शहर अयोध्या-फैजाबाद में सन २००४ में छोटे परदे के निर्माता अशोक जतिन का पूरी टीम के साथ आना हुआ। उन्होंने यहाँ की साझी परम्परा पर एक वृत चित्र 'शक्तिपुंज' बनाया। उनके साथ इस विधा को नजदीक से देखने का मौक़ा मिला। २००५ अवध की गंगा-यमुना तहजीब को
 
रंगनाथ सिंह
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कुछ भी गलत-सलत मत लिखो प्लीज

आपके साथ यही समस्या है, झट से किसी नतीजे पर पहुँच जाते हो और किसी को भी दोष देने लगते हो. आप ठहरे अज्ञानी. महान पत्रकार, चिंतक, सेक्युलर मीडिया कर्मी हमारी आँखे हमारी आँखे खोलने वाला लेख लिखा है...
 
संजय बेंगाणी
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तीसरा रास्ता...

मीडियानामा पुलिस नहीं, तथ्यों का प्रवक्ता बने मीडिया      मानवाधिकार संगठनों की समाचार मीडिया से एक पुरानी लेकिन जायज शिकायत रही है। यह शिकायत हाल के दिनों में कम होने के बजाय और बढ़ी है। शिकायत यह है कि
 
आनंद प्रधान
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कोई कैसे बताए कि मीडिया बिका हुआ है

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चार साल के शासन के दौरान अपने सुशासन के प्रचार-प्रसार में सौ करोड़ रुपये फूंक दिये। हरियाणा के सीएम ने पिछले साल चुनाव के ऐलान से ऐन पहले के ढाई महीने में अपनी सफलता के गीत गाने में अस्सी करोड़ रुपये फूंके थे।
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किस ओर जा रहा है हमारा ’मीडिया’!

आजकल हर तरफ हो रही चर्चाओं में मीडिया एक ‘हॉट टॉपिक’ बना हुआ है। कॉलेजों की कैंटीन से लेकर चाय की गुमटियों तक ये चर्चा पीछा नहीं छोड़ती, और तो और खुद मीडिया भी यही करता नजर आ रहा है। समाचार चैनलों पर आसानी से कोई संपादक टीआरपी का रोना रोता नजर आ जाएगा तो
 
शशि शर्मा
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पत्रकार की छंटनी पर हल्ला क्यों नहीं

पत्रकार की छंटनी पर हल्ला क्यों नहीं मृत्युंजय कुमार झा अनिल चमड़िया की महात्मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में नियुक्ति रद्द किये जाने को लेकर ब्लॉग पर हाय तौबा मची हुई है। इतना ही नहीं अब इसको लेकर ह्स्ताक्षर अभियान भी चलाया जा रहा है।
 
संदीप पाण्डेय
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मीडिया की रणभूमि

पत्रकारिता के नए मापदंड गढ़े जा रहे हैं। हर मालिक संपादक बनता जा रहा है। संपदाक किसी कंपनी का सीईओ। रण फिल्म अभी तक देखी नहीं है. लेकिन इसको लेकर जितनी बहस हुई और हो रही है, वह काफी कुछ कहता है. मीडिया के लोग कह तो रहे हैं कि हम आत्ममंथन कर रहे हैं. पर
 
चन्दन कुमार
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पत्रकार होना पाप है क्या

दीपक शर्मासाप्ताहिक अवकाश समाप्त होने के बाद अलीगढ़ से वापस आगरा जा रहा था। बस में चार पांच वृद्ध लोग मिल गए। सभी पवन कुमार वर्मा के ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास के सच्चे प्रतिनिधि थे। पता नहीं किस बात से बात शुरू हुई और जल्द ही मेरे काम के बारे में पूछ
 
pankaj mishra
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तीसरा रास्ता...

साठ का गणतंत्र दोराहे पर मीडिया क्या यह सिर्फ एक संयोग है कि जिस समय गणतंत्र साठ का हो रहा है, देश में 'पेड न्यूज' यानि पैसा लेकर खबरों की शक्ल में विज्ञापन छापने पर तीखी बहस चल रही है? क्या यह भी सिर्फ संयोग है कि जिस संविधान में अभिव्यक्ति की
 
आनंद प्रधान
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किताबें बहुत सी पढ़ी होंगी तुमने...

बड़ी गरम बहस छिड़ी है दुनिया भर के अख़बारों के सामने। क्या करें- लोग काग़ज़ी अख़बार से दूर इंटरनेट पर, टीवी पर भाग रहे हैं। इस गरम बहस को ज्वालामुखी के लावे सा बहाने में मदद की है किंडल ने। अमेज़न का ई बुक रीडर- किंडल, जिसने इस दफ़ा क्रिसमस के तोहफ़ों
 
प्रबुद्ध
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ख़बर बन रहे ख़बरनवीस

ख़बर बन रहे हैं अब ख़बरनवीस,ख़ुद पर बहस कर रहे हैं...क्या दिखाएं, क्या न दिखाएं,इस ऊहापोह में फंसे हैं हमारे ख़बरनवीस...ख़बर बनाते बनाते थक गएचले हैं अब ख़ुद ख़बर बननेन कोई राजा न कोई रानीन स्वर्ग की सीढ़ी और न ही दिखाएंगे हम भूत प्रेतप्रण कर लिया है
 
चन्दन कुमार
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टीआरपी और मीडिया पर नई बहस.......

इसके पहले वाला लेख मैंने महंगाई पर लिखा था...उसके बाद वाला भी महंगाई पर ही तैयार किया है...लेकिन उसे ड्रॉप करना पड़ रहा है....कोई मजबूरी नहीं है...दरअसल मीडिया का विद्यार्थी हूं....बहस भी आजकल मीडिया पर शुरू हो गई है...जाने माने पत्रकार, जिन्हें हम आदर्श
 
चन्दन कुमार
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विनोद दुआ की धारणा का खंडन करता प्रियदर्शन का लेख

आतंकवाद को रोकने के उपायों पर देष में बहस चलती रहती है। इसके लिए सबसे कारगर उपाय देष में सुरक्षा को बढ़ना, प्रमुख स्थलों पर जांच के नियमों को कड़ा करना आम तौर पर गिनाए जाते हैं। दिल्ली के अनेकों स्थानों पर ऐसे उपाय अपनाये भी जा रहे हैं। पर इन जांचों से कोई
 
Hemant Pandey
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पत्रकारों को जूतियाने का सही समय...

अलग-अलग अखबारों में मुंबई के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट को लेकर खबरें थीं। सभी खबरों का मजमूनं एक सा था लेकिन आप एक खबर की शुरूआत देख लीजिये"जो दशा देश में बाघों की उसी दशा में मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट भी पहुंच गये है। सारे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट आज या
 
mediajantantra
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कमाल खान...युवा पत्रकारों का भगवान्

"कमाल खान''...ये नाम ज़हन में आते ही एक ऐसे पत्रकार का चेहरा नजरों के सामने घूमने लगता है, जो दिखने में तो शांत नज़र आता है लेकिन जब वो बोलता है तो दुनिया सुनती है...शांत आवाज़, धीमे अल्फाज़ और पीटीसी के शहंशाह के तौर पर इन्हें पत्रकारिता जगत में जाना और
 
संकेत पाठक...
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आओं अपनी बहुएं जलाये, मीडिया से दहेज विरोधी कानून बदलवाये

सर मेरी बहन को जिंदा जला दिया। पुलिस ने केस दर्ज नहीं किया। कह रही है पहले जांच करेंगे। लेकिन हम ये खबर नहीं कर सकते।क्यों सर क्यों कवर नहीं कर सकते।क्योंकि हमारे चैनल में दहेज हत्या की खबरें अब कवर नहीं होती। उनमें दहेज विरोधी कानूनों का कई बार बेजा
 
mediajantantra
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पियरे बोर्दिओ और नव्य-उदारतावाद - 10- समापन किश्त

11 सितम्बर के बाद ग्लोबलाइजेशन की नीतियां बदली हैं। सारी दुनिया में अमेरिका ने ग्लोबलाईजेशन विरोधी ताकतों को आतंकवादी ताकतों के साथ एकमेक किया है। ग्लोबलाईजेशन विरोधियों को पूंजीवाद के शक्तिशाली प्रतीकों पर हमले के लिए जिम्मेदार ठहराया जाने लगा है।
 
jagadishwar chaturvedi