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रवीश कुमार के बहाने हिन्दी बुद्धिजीवी और मीडिया

             ( नामवर सिंह)       हिन्दी में अधूरी तस्वीर देखने का रिवाज है। अधूरी इमेजों में भ्रमित रहने वालों को यह भ्रम होता है कि वे ही हिन्दी के पब्लिक इंटलेक्चुअल या जन-बुद्धिजीवी हैं।
 
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तमाशबीनों के देश में लुटेरे-1-

          आज भारत तमाशबीनों का देश है। इसमें नागरिक नहीं तमाशबीन निवास करते हैं। तमाशबीनों की तरह आज हम सब एक-दूसरे को देख रहे हैं। पूरे समाज को देख रहे हैं। माओवादियों ने दांतेवाडा में बम के धमाके किए,निर्दोष लोग मारे गए,
 
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शनि का मिथ और यथार्थ

(शनि पर शोध करता उपग्रह कासिनी, क्या ज्योतिषी बताएंगे उनके यहां शनि पर कौन काम कर रहा है ? )        शनि को लेकर पोंगापंडितों ने तरह-तरह के मिथ बनाए हुए हैं और इन मिथों की रक्षा में वे तरह-तरह के तर्क देते रहते हैं। शनि से बचने के
 
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विज्ञान से भागे हुए ज्योतिषी

(शनि ग्रह पर खोज करता कासिनी अंतरिक्ष यान जिसने शनि के तथ्य बताए )                                हमारे ब्लॉग की एक सुंदर विदुषी और हठी यूजर हैं,वे ज्योतिषी भी हैं
 
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तिथि खबर नहीं होती दीपक चौरसिया

(शनि वलय का अंतरिक्ष यान से प्राप्त चित्र )           स्टार न्यूज चैनल जिस मीडिया ग्रुप का हिस्सा है वह बहुराष्ट्रीय मीडिया घराना है रूपक मडरॉक का। मडरॉक के घराने का सारी दुनिया में कंजरवेटिव विचारधारा के
 
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स्टार न्यूज और दीपक चौरसिया की शनि सेवा

          (शनि ग्रह का असली स्वरूप )     ‘स्टार न्यूज’ वाले अंधाधुंध अंधविश्वास का प्रचार कर रहे हैं। अंधविश्वास के प्रचार का ताजा नमूना है दीपक चौरसिया के द्वारा 11जून 2010 को पेश किया गया कार्यक्रम। इस
 
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प्रेम पाने का नहीं देने का नाम है

       प्रेम पर इन दिनों अनेक कोनों से हमले हो रहे हैं। प्रेम आज विवाद और हिंसा का विषय बना हुआ है। अतःप्रेम के सवाल पर गंभीरता के साथ विचार करना समीचीन होगा। सवाल यह है प्रेमीयुगल प्रेम के अलावा क्या करते हैं ?  प्रेम का
 
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देशप्रेम का पाखंडी चीनी राग

       चीनी जनता में कम्युनिस्ट शासकों के प्रति तेजी से असंतोष बढ़ रहा है। चीन के कॉमरेड साम्राज्यवादी अवधारणाओं के शिकार हो गए हैं। साम्राज्यवादी धारणा में देश प्रेम का अर्थ सरकार प्रेम है। कॉमरेडों का मानना है जो देशप्रेमी है
 
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टेलीविजन में किसान का रोमैंटिक रुप

     टेलीविजन स्वभावत: रोमैंटिक है। इसमें रोमैंटिक भावबोध जितना बिकता है यथार्थबोध उतना नहीं बिकता।कृषि पर घमासान मचा है। किंतु किसान गायब है। कृषि सब्सीडी, किसान की पामाली और भुखमरी के चित्र गायब हैं। किसानों के नाम पर मंत्रियों और
 
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‘ट्विटर’ वाले सावधान जुर्माना हो सकता है

      यह बात साफ है कि रंग ट्विटर रंग दिखाने लगा है। आप जिसे आनंद समझ रहे हैं,खेल समझ रहे हैं,वही ‘ट्विटर’ का संदेश आपके लिए जुर्माने का कारण भी हो सकता है। यह तो शुरुआत है आगे-आगे देखिए होता है क्या ?    आपको
 
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महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जन्मतिथि पर विशेष- सभ्यता और सादगी का महाकवि

    रवीन्‍द्रनाथ की 150वीं जयन्ती के मौके पर उनके वि‍चारों और नजरि‍ए पर वि‍चार करने का मन अचानक हुआ और पाया कि‍ रवीन्‍द्रनाथ के यहां मृत्‍यु का जि‍तना जि‍क्र है उससे ज्‍यादा जीवन का जि‍क्र है। रवीन्‍द्रनाथ ने अपने लेखन से वि‍श्‍व मानव
 
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फिल्मी गीतों में प्रेम और बांसुरी

    फिल्मी गीतों और फिल्म में प्रेम की संरचना का आधार है राधा-मीरा और कृष्ण की त्रयी। प्रेम का रूप राधा-कृष्ण के मिथ का रूपक की तरह उपयोग मिलता है। जब कृष्ण की बांसुरी बजती थी तब राधा और गोपियों को प्रेम की अनुभूति होती थी। बांसुरी के
 
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नपुंसक राजनीतिज्ञों की कारपोरेट गुलामी

(चीन का महाअमीर हुआंग गुआंग्जू )     आईपीएल का नाटक चल रहा है। यह कांग्रेस-भाजपा-वाम मार्का कारपोरेट गुलामी का नग्नतम उदाहरण है। इनमें से किसी भी राजनीतिक दल की कारपोरेट घरानों की कानूनभंजक कार्रवाईयों को रोकने और कारपोरेट अपराधियों
 
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सेक्सकांड पर पोप और केथोलिक चर्च की साख गिरी

           केथोलिक चर्च में समलैंगिक दुराचरण और पादरियों के द्वारा बालकों के शारीरिक शोषण का मामला पोप बेनेडिक्ट और केथोलिक चर्च की इमेज के लिए कलंक का धब्बा साबित हुआ है। हाल ही में विश्व विख्यात मीडिया
 
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फिल्मी संगीत का नया पैराडाइम

 संगीत और समाज का द्वंद्वात्मक संबंध होता है। यह रिश्ता प्रभुत्व की शक्तियों और आम जनता के अंतर्विरोधों को व्यक्त करता है। प्रभुत्वशाली तबकों और वंचितों के बीच के अंतर्विरोधों का इस संबंध के विकास पर गहरा प्रभाव देखा जाता है। सामाजिक विकास की
 
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देशभक्ति चड्डी-बनियान का विज्ञापन नहीं है - सुधा सिंह

हिन्दी फिल्मों के बादशाह शाहरूख खान की नई फिल्म 'माई नेम इज़ खान' 12 फरवरी को प्रदर्शित होने जा रही है। शाहरूख का कसूर है कि उन्होंने अपप सरदेसाई ने पड़ोसी देश के साथ सौहार्द्रपूर्ण संबंध की बात कही है। उन पर आरोप है कि वे पाकिस्तान समर्थक हैं।
 
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सभ्यता की तबाही है सांस्कृतिक चक्काजाम -2-

''सांस्कृतिक चक्काजाम'' ने प्रतिक्रियावादी भाषा के प्रयोगों को केन्द्रीय महत्व दिया है। व्यावसायिकता-कामुकता और अनुदारवाद को आदर्श अनुभव के रूप में पेश किया जा रहा है।  '' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का प्रमुख वैचारिक रूप है '' इज्म'' अथवा ''वाद'' ,नई
 
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सभ्यता की तबाही है सांस्कृतिक चक्काजाम -1-

मीडियाजनित जरूरतें प्रत्येक प्रचार अभियान के साथ बदल जाती हैं। इसी तरह मजूदरों को भी  बांट दिया जाता है। स्थायी मजदूर का अस्थायी मजदूर से भेद किया जाता है। बेकार से दूर रहने को कहा जाता है। ''सांस्कृतिक चक्काजाम''  फिनोमिना के तहत मजदूरों
 
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सांस्कृतिक चक्काजाम में असहाय संस्कृति -

आधुनिक मीडिया ने  '' सांस्कृतिक चक्काजाम'' कर  दिया है। रेडियो, फिल्म, टीवी और इंटरनेट सांस्कृतिक जाम के सबसे बड़े मीडियम हैं। ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' की परंपरा उन सांस्कृतिक जुलूसों की तरह है जो हमारे शहरों में किसी न किसी रूप में निकलते
 
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मंहगा है टीवी गनोरंजन

मीडिया का वर्तमान परिप्रेक्ष्य डिजिटल केन्द्रित है। डिजिटल में दाखिल होने के बाद मीडिया की भूमिका बुनियादी तौर पर बदल गई है। प्रत्येक माध्यम का चरित्र बदला है। बदले रूपों को हमें प्रत्येक मीडिया के संदर्भ में स्वतंत्र रूप से विश्लेषित करने की जरूरत
 
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मासकल्चर का सच -2-

मासकल्चर में सामाजिक ऐक्य का अभाव होता है। यदि ऐक्य का भाव होता तो अमरीका सबसे ज्यादा ऐक्यबध्द समाज होता।असल में, मासकल्चर 'और-और' की लालसा पैदा करती है।वहॉ आकांक्षा की आंधी है ,वहाँ जो कुछ भी मिले आनंद नहीं मिलता।मासकल्चर इकसार पर बल देती है ,एकता पर
 
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मासकल्चर का सच -1-

  लोक संस्कृति और लोक कलाओं का उत्तर - आधुनिक अवस्था में स्वरुप बुनियादी तौर पर बदल जाता है। इन कला रुपों में दैनन्दिन जीवन की गहरी छाप होती है। उत्तर -आधुनिक स्थिति इनका औद्योगिकीकरण कर देती है। उन्हें संस्कृति उद्योग का माल बना देती है। उनका
 
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कामुकता का बदलता चरित्र -4- समापन किश्त

हिंदुत्ववादियों की हिंदू धर्म की व्याख्या मूलत: धर्म को जीवनशैली मानकर चलती है। अस्मिता का जीवनशैली से जुड़ना वस्तुत: विश्व पूंजीवादी बाजार के तर्क की जीत है और हिंदू तत्ववादी इसी चीज का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। वे हिंदू धर्म को जीवनशैली मानते
 
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कामुकता का बदलता चरित्र -3-

एक जमाना था जब सेक्स का प्रजनन से संबंध था। प्रजनन के कारण बड़े पैमाने पर औरतों को अकाल मृत्यु का शिकार होना पड़ता था। एक तरह से स्त्री के लिए सेक्स का मतलब मौत था। किंतु परिवार नियोजन के उपायों के आने के बाद सेक्स का प्रजनन से संबंध विच्छेद हो गया। आज
 
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कामुकता का बदलता चरित्र -2-

19वीं शताब्दी में सेक्स विमर्श के दौरान तीन तरह के दृष्टिकोण सामने आए। पहला, विमर्श स्त्रr की कामुकता को 'हिस्टीरिया' के चिकित्साशास्त्र से जोड़ता है।दूसरा, बच्चों के संदर्भ में कामुकता की व्याख्या प्रस्तुत करता है। इन लोगों ने बताया गया कि बच्चे सेक्स
 
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कामुकता का बदलता चरित्र -1-

कामुकता आज चर्चा के केंद्र में है। इसके बारे में भारतीय समाज में तेजी से मंथन चल रहा है। कामुकता के सवालों पर खुली बहसें हो रही हैं। एक जमाना था जब कामुकता के बारे में बात करना निषिद्ध था। अपराध था। जो लोग बात करते थे उन्हें हेयदृष्टि से देखा जाता था।
 
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मुक्ति की गारंटी है जनोन्मुखी विज्ञान

 अंधविश्वास से लड़ने के लिए विज्ञान के बुनियादी क्षेत्रों में अनुसंधान और विज्ञानसम्मत चेतना के निर्माण पर जोर दिया जाना चाहिए। कुछ विज्ञान संगठन हैं जो सचमुच में अंधविश्वास से लड़ना चाहते हैं किंतु इसके लिए ये लोग लोकप्रिय विज्ञान का सहारा
 
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संस्कृति उद्योग की धुरी हैं अंधविश्वास - 3-

नकल की प्रवृत्ति को पूंजीवाद का प्रधान गुण माना जाता है। इस अर्थ में पूंजीवाद अपने विकास के साथ-साथ सामंती और पूर्व सामंती कला रूपों और मूल्यबोध को बरकरार रखता है।कलाओं में अंधानुकरण आधुनिक काल में नकल में रूपांतरित कर लेता है। इससे जहां कभी न खत्म होने
 
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संस्कृति उद्योग की धुरी हैं अंधविश्वास - 2-

आज हम रोम की महानता के गुण गाते हैं किंतु यह भूल जाते हैं कि रोम की महानता का आधार अंधविश्वास था। रोम की महानता के बारे में पोलिबियस ने लिखा कि मैं साहसपूर्वक यह बात कहूंगा कि संसार के शेष लोग जिस चीज का उपहास करते हैं, वह रोम की महानता का आधार है और उस
 
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संस्कृति उद्योग की धुरी हैं अंधविश्वास - 1-

अंधविश्वास सामाजिक कैंसर है। अंधविश्वास ने सत्ता और संपत्ति के हितों को सामाजिक स्वीकृति दिलाने में अग्रणी भूमिका अदा की है। आधुनिक विमर्श का माहौल बनाने के लिए अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता बेहद जरूरी है। आमतौर पर साधारण जनता के जीवन में अंधविश्वास
 
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मुसलमान,राष्ट्रवाद और युध्द की भाषा

     टेलीविजन के इतिहास में ग्यारह सितंबर मील का पत्थर दिन था।विमान अपहरण और उसके बाद अमरीका के प्रतीक चिह्नों पर आत्मघाती हमलों का सीधा प्रसारण अनेक नए मसलों,अर्थों और संभावनाओं को सामने लेकर आया है।इस घटना के बाद टेलीविजन के
 
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टेलीविजन ज्योतिष और सामाजिक विभाजन-3-

मसलन् एक बेरोजगार इंजीनियर युवक को नौकरी नहीं मिल रही है।ज्योतिष के उपाय के बावजूद नौकरी नहीं मिल रही है।ऐसी स्थिति में ज्योतिषी कुछ इसतरह का तंत्र फैलाएगा कि लगे कहीं न कहीं कुछ बड़ी गड़बड़ी है।इस क्रम में बेकार युवक परेशान होगा और ज्योतिषी इसके लिए उसे
 
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टेलीविजन ज्योतिष और सामाजिक विभाजन-2-

ज्योतिषी फलादेश करते समय हमेशा देश,काल और पात्र का ख्याल रखता है।इसके आधार पर वह सामान्य फार्मूलों के जरिए समाधान देने की कोशिश करता है।ज्योतिषी के लिए भ्रम बनाए रखना जरूरी होता है।साथ व्यक्ति की स्वायत्तता का भी ख्याल करता है।भ्रमों को बनाए रखकर यह आभास
 
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टेलीविजन ज्योतिष और सामाजिक विभाजन -1-

टेलीविजन जनमाध्यम है।सबका माध्यम है।यह धर्म और सम्प्रदाय की सीमाओं को अस्वीकार करता है।इसके बावजूद धर्म के बगैर इसका जिंदा रहना असंभव है।ज्यादा से ज्यादा श्रोता जुटाने के चक्कर में टेलीविजन समाज की अविवेकवादी परंपराओं का इस्तेमाल करता है। अविवेकवादी
 
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ज्योतिषियों की टेलीविजन मूर्खताएं - 2

फलित ज्योतिष का कृत्रिम चरित्र व्यक्ति के अहं को परेशान किए वगैर यथार्थ के साथ मिथ्या संबंध बनाने की ओर ठेलता है। इस क्रम में अविवेक को बड़ी ही चालाकी से छिपा लिया जाता है।ज्योतिष की ओर आम लोगों के बढ़ते हुए रूझान का बड़ा कारण है बौध्दिक ईमानदारी का
 
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ज्योतिषियों की टेलीविजन मूर्खताएं -1-

       फलादेश में कहा जाता है कि व्यक्ति को फलादेश को मानना चाहिए और उसके साथ सामंजस्य बिठाना चाहिए।मसलन् मंगली से शादी नहीं करनी चाहिए।मूल नक्षत्रों में पैदा होने वाला भारी होता है।कहने का तात्पर्य यह कि ज्योतिष में दैनंदिन जीवन
 
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ज्योतिषी के तर्क और अविवेकवाद

फलादेश की संरचना में अविवेकवाद पृष्ठभूमि में रहता है।सतह पर जो भविष्यफल होता है वह तार्किक प्रतीत होता है।भविष्य में आने वाले खतरों की भविष्यवाणियां इस तरह की जाती हैं कि वे पाठक को भयभीत न करें। भविष्यवाणियां इस तरह की भाषिक संरचना में होती हैं जिससे
 
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ज्योतिषी के फलादेश की कला और राजनीति

फलित ज्योतिष मासकल्चर का अंग है। देखने में अहिंसक किन्तु वैचारिक रूप से हिंसक विषय है। सामाजिक वैषम्य, उत्पीडन, लिंगभेद,स्त्री उत्पीडन और वर्णाश्रम व्यवस्था को बनाए रखने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।ग्रह और भाग्य के बहाने सामाजिक ग्रहों की सृष्टि में
 
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ब्राँड संस्कृति और ग्लोबल शोषण चक्र

ग्लोबलाइजेशन का युग ब्रॉण्ड का युग है।आप चारों ओर लोगोज देखते हैं। यहां तक कि आपकी निजी जीवन की अवस्था में भी लोगोज देखते रहते हैं।सार्वजनिक स्थानों से लेकर व्यक्तिगत बाथरुम तक सभी जगह लोगोज का साम्राज्य है।यह ऐसी दुनिया है जिसे ब्रॉण्ड दुनिया कह सकते
 
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डिजिटल युग में मासकल्चर और विज्ञापन

यह फैंटेसी की महामारी का युग है। इस युग में सत्य सबसे दुर्लभ चीज है। इनदिनों बाजार, जीवन, विज्ञापन, मीडिया,राजनीति ,जीवनशैली आदि सभी क्षेत्र में सत्य दुर्लभ हो गया है। सत्य को दुर्लभ बनाने में मासकल्चर की केन्द्रीय भूमिका है। मासकल्चर के प्रभाववश
 
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