* वो, चुप खड़ी... * (~जयंत)
जो, चुप खड़ी, परदे के पीछे, तेरे सपनों को रंगने, ख़ुद को ही पीसती रही, तेरे हिस्से के दुःख सहती रही, तुझे सुखों की छाव में सुलाती रही, तेरे अस्तित्व हेतु, ख़ुद मिट कर मिटटी बनी, और खुद को मिटा, तुझमें जीती रही, रज बन, तेरी ठोकरें खाती रही, आंसुओं में,
May 26 2009 11:47 AM



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