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नक्सलवाद और सरकार के अंतर्विरोध

देवाशीष प्रसूनभारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा हर साल प्रकाशित वार्षिक रपटों के मुताबिक़ नक्सलवादी, प्रशासनिक और राजनैतिक संस्थानों की अकर्मण्यता द्वारा सृजित माहौल में कार्य करते हैं, स्थानीय मांगों को भड़काते हैं और जनसंख्या के शोषित वर्गों के बीच
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शुड वी एब्यूज आर......

खड़गपुर की पटरियों से रेलगाड़ियाँ फिर से गुजरने लगी हैं........ देश की सरकार ने लासों की कीमत अदा करनी शुरु कर दी है..... हर मरने वाले के जिंदगी की कीमत छः लाख रूपये, छः लाख की रकम का मतलब, वह रकम है जिसका आधा भी देश के ८० प्रतिशत लोगों द्वारा उनकी जिंदगी
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संसद की बातें और युद्ध का सच --- अनिल चमड़िया

लाल कृष्ण आडवाणी ने नवंबर 1999 में जब ये कहा कि आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का सामना करने के लिए सैनिक बलों की संख्या पर्याप्त नहीं है तो राज्यसभा में इस बाबत एक सवाल किया गया।तब सरकार ने जवाब दिया था कि इस समय जम्मू कश्मीर में मिलिटेंसी से प्रभावित
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सरकार अपना भरोसा खो चुकी है

जिंदगी की कीमतें रुपयों से नहीं चुकायी जा सकती। चाहे वह 40 लाख हो या उससे भी अधिक। आदिवासियों की जिंदगी की भी और सेना के जवानों की भी। न ही किसी की जिंदगी को कम करके आंका जा सकता है – पर यह होता रहा है। स्थान, व्यक्ति, वर्ग के लिहाज से घटनाओं की महत्ता
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दंतेवाड़ा से भोथरी होती संवेदना

दंतेवाड़ा में ऑपरेशन ग्रीन हंट को अंजाम देने निकले सीआरपीएफ के 75जवानों का माओवादी हमले में मारा जाना माओवादियों पर भारी पड़ने वाला है. गृहमंत्री पी चिदंबरम अब सवाल करने पर यह बता रहे हैं कि वे छत्तीसगढ़ के उस हिस्से में वायु सेना का इस्तेमाल नहीं करने
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जब देश की सरकार बर्बर हो जाय.

छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा में माओवादीयों द्वारा किया गया हमला अब तक का सबसे बड़ा हमला है, कुछ महीने ही बीते हैं राजनांद गांव के उस हमले को जिसे सबसे बड़ा हमला माना गया था, उसके पहले गड़चिरौली में हुआ हमला सबसे बड़ा हमला था और उससे पहले बिहार का जहानाबाद जेल
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सरकार की बढ़ती असुरक्षा

हमारी सरकार हमे सुरक्षित रखना चाहती है, यह कोई कल्याणकारी काम नहीं बल्कि वह अपनी जिम्मेदारी निभा रही है. इस सुरक्षित रखने की प्रक्रिया में एक व्यक्ति की आजादी छिनती जा रही है आज के समय में यह लोकतंत्र को व्यापक बनाने का एक संकट है. यात्राओं, सार्वजनिक
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ज़मीन गरम है

नारायणपटना इलाके में इन दिनों दहशत का माहौल है . असल में पिछले महीने की 20 तारीख को उड़ीसा के कोरापुट जिले के इस नारायणपटना थाने में हुई पुलिस फायरिंग में चासी मुलिया आदिवासी संघ के नेता वाड़ेका सिंगना समेत दो आदिवासियों की मौत के बाद से ही इलाके में
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गोयबल्स (पी.चिदम्बरम) के झूठ

गोयबल्स (पी.चिदम्बरम) अपने झूठ को दिनों दिन बदल रहे हैं और आज इन्हें सौ बार नहीं बल्कि एक बार बोलने की जरूरत है. बाकी, संचार माध्यम १०० के आंकड़े से कई गुना आगे निकल जाते हैं. पी. चिदम्बरम का अभी हाल में बयान आया कि ग्रीन हंट मीडिया द्वारा फैलाया गया
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लोकतंत्र का नेतृत्व करेगी सेना

अनिल चमड़िया भारत के पड़ोसी देशों में जिस तरह के राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल रहे हैं उसने एक बहस लोगों के बीच खड़ी कर दी है। संसद के लिए चुनाव तो होंगे लेकिन उसका नेतृत्व सेना के हाथों में होगा? श्रीलंका में लिट्टे का सफाया करने वाली सेना के प्रमुख स
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सीपीआई (माओवादी) पोलित ब्यूरो किशनजी का साक्षात्कार

मल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी बिना झिझक, गर्व के साथ खुद को देश का दूसरा सर्वाधिक वांछित व्यक्ति बताते हैं। सीपीआई (माओवादी) की पोलित ब्यूरो के इस 53 वर्षीय सदस्य की तुषा मित्तल के साथ फोन पर हुई बातचीत के मुख्य अंश: सबसे पहले अपनी निजी जिंदगी क
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नक्सलवाद के बहाने असहमतियों पर निशाना

देवाशीष प्रसून (महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के मीडिया विभाग में शोधार्थी व स्वतन्त्र लेखन संपर्क- prasoonjee@gmail.com ) नक्सलवाद के नाम पर सरकार तमाम तरह की असहमतियों के स्वर पर निशाना साध रही है। सरकारें कुछ ऐसे चीजों का हौव्वा
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न्याय के लिए एक पहल : नंदिता हक्सर

शांति के लिए नागरिकों की पहल द्वारा तैयार किए गए प्रस्तावों (मेनस्ट्रीम में प्रकाशित, ” आक्रमण बंद कर निःशर्त बातचीत की शुरूआत करो ” शीर्षक से प्रकाशित) को बहुत ध्यान से पढ़ा। ” नक्सल समस्या ” से क्रूर सैन्य बल द्वारा निपटने की भारतीय राज्य की योजना स
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नागरिक समाज के लिए लालगढ़ आंदोलन से जुड़ी एक ज़रुरी बहस

लालगढ़ में जारी आंदोलन ने कई चीज़ों को जन्म दिया है। इसने जनआंदोलन को एक ऐसे ऊंचे स्तर पर पहुंचाया है जहां विभिन्न रूपों में राज्य के दमन के ख़िलाफ़ चल रहा आंदोलन आदिवासी भाषा तथा लिपि के विकास, जनोन्मुखी विकास के एक नए मॉडल तथा ’औद्योगीकरण’ के नाम पर जा
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सत्ता तंत्र और माओवाद से निपटने के तरीके

पी. चिदम्बरम को मैं भाषा और शब्दों के मायने समझाने की जुर्रत नहीं कर सकता. क्योंकि हमारे और उनके बीच में बहुत बडा फर्क है. क्योंकि वे एक राष्ट्र के शीर्ष पद पर हैं और मैं एक राष्ट्र की तलाश में, बिना राष्ट्र का नागरिक. मैं उनकी मजबूरी भी समझता हूं और
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पश्चिम बंगाल के बुद्धिजीवी माओवादी हैं.?

कृपाशंकर चौबे पश्चिम बंगाल शासन द्वारा मार्क्सवाद का एक विकृत पाठ तैयार किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में सिंगुर-नंदीग्राम-लालगढ़ में सरकार की नीति का प्रतिरोध करने वाले वामपंथी बुद्धिजीवियों से राज्य शासन प्रतिशोध लेने को व्याकुल हो उठा है। नंदीग्राम