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वो कल तक था, और आज नहीं है

मैं जब भी घर जाता हूं मां सवाल पूछती है। बच्चे, बहू और मेरे बारे में सब कुछ पूछने के बाद कहती है मां शहर में सब अच्छे तो है सालो-साल तक शहर भोगने के बाद सवाल से रिश्ता नहीं जोड़ पाता। मां शहर में कोई अच्छा या बुरा नहीं होता शहर में लोग होते है या नहीं
 
mediajantantra
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एक चिट्ठी मां के नाम ....जिसे अब वो कभी भी न पढ पाएगी

मां पता नहीं आज क्यों मन इतना व्याकुल है , मुझे नहीं पता । आज न तो कोई त्यौहार है न ही कोई दुख या संकट की घडी मुझ पर अचानक आई है , क्योंकि अक्सर इन्हीं दोनों समय पर तुम मुझे बहुत ही याद आती थी , मगर फ़िर भी मैं नहीं जानता कि आज तेरी इतनी याद क्यों आ रही
 
अजय कुमार झा
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माँ!

सूरज के जागने से पहले जागतीचिड़ियों के चहकने से पहले,आँगन बुहारतीमुझे नींद से जगाने के लिएदुलरातीअपने पद चिह्नों परचलने को प्रेरित करतीमर्यादा और संस्कार कि धरोहर समेटेआदर और स्नेह कि सीख देतीमैंने,उसे कर्तव्यों का निर्वहन करते भी देखा है--अपने अधिकारों
 
Jyotsna Pandey
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मां के अंतिम दर्शन ही नहीं कर पाया..

मां तुने दिया हमको जन्मतेरा हम पर अहसान हैतेरे ही करम से दुनिया में हमारा नाम हैओ मेरी प्यारी मां तुझे सत्-सत् प्रणाम है वह 7 फरवरी 2003 का दिन था जब हम जगदलपुर में राष्ट्रीय महिला खेलों की रिपोर्टिंग करने गए थे। सुबह-सुबह हमारे समाचार पत्र दैनिक
 
राजकुमार ग्वालानी
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माँ.....

एक खूबसूरत एहसास... जो खुद अपने आप में पूरी दुनिया को समेटे हुए है. जिसके दिख जाने से ही लगता है कि जैसे अब दुनिया की कोई भी मुश्किल आ जाये मेरा कुछ नहीं बिगड़ने वाला. पता नहीं कितनी बार पापा के क्रोध से बचाकर प्यार भरी झिड़की से ही घर का सारा तनाव गायब
 
डा०आशुतोष शुक्ल
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मदर्स डे की पूर्व संध्या पर आप माताओं को नमन.........

दुनिया कहती सब मिलता है माँ-पिता के चरणों में पर मैं कहता हूँ स्वर्ग की अनुभूति तो माँ के आंचल में माँ तो बस माँ है कह नहीं सकता कुछ उसके बारे में मैंने भी तो शब्द लिए, उससे जाना दुनिया के बारे में उंगली पकड़ चलना सीखा, हाथ पकड़ लिखना मैं भी तो अंग उसी का
 
राहुल कौशल
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स्निग्धा तु मेरी सासों में घोल रहीं थी अमिय

स्निग्धातु मेरी सासों में घोल रहीं थी अमियतब से अब तकसिर्फ़ मैंसीख पाया हूंप्यार की बातैंओ चिर छायातुम्हारा आभास लेकर ज़िंदा हूंवरना कब का धुएं के गुबार के साथ जो चिता पर उभरती लौ से भागती नज़र आती हैंअनज़ान दिशा में गुम हो जातालोग तब मेरी पराजित देह पर शोक
 
गिरीश बिल्लोरे
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बचपन से ही किस्मत ने छोड़ दिया साथ

कहा जाता है कि मां बच्चे की पहली गुरु होती है, लेकिन ऐसे लाखों बच्चे होते हैं जिन्हें मां तो क्या बाप की परछाई भी नसीब नहीं होता। असुरक्षा की वजह से ऐसे लोग कुछ ऐसे फैसले ले लेते हैं, जो उनकी जिंदगी को तहस-नहस कर देते हैं। पूर्व आईपीएस अधिकारी किरन ब
 
किरन बेदी
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बेटे से थी उम्मीद, काम आई बेटी

समाज में आज भी लड़कियों को लड़कों से कमतर समझा जाता है। इसी कारण कई परिवारों में न सिर्फ उनकी पढ़ाई, बल्कि दूसरी चीजों में भी उनके साथ भेदभाव किया जाता है। ऐसे ही एक परिवार में जरूरत के वक्त बेटी ही काम आई। पूर्व आईपीएस अधिकारी किरन बेदी सुना रही हैं
 
किरन बेदी
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बेटे से थी उम्मीद, काम आई बेटी

समाज में आज भी लड़कियों को लड़कों से कमतर समझा जाता है। इसी कारण कई परिवारों में न सिर्फ उनकी पढ़ाई, बल्कि दूसरी चीजों में भी उनके साथ भेदभाव किया जाता है। ऐसे ही एक परिवार में जरूरत के वक्त बेटी ही काम आई। पूर्व आईपीएस अधिकारी किरन बेदी सुना रही हैं
 
किरन बेदी
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मां तू बड़ी प्यारी है... मगर बहुत स्वार्थी भी है!

वो ऐड देखा आपने ... ? किसी रिफाइंड ऑइल का ऐड है...एक आदमी अपनी मां के सामने बीवी से कहता है – ‘ रुचि, तुम्हारे हाथ का बना खाना तो मां के खाने से भी अच्छा है... ’ । उसके बाद कैमरा बीवी के चेहरे पर फोकस होता है...वहां दबी-सी मुस्कुराहट है... खुशी है...
 
विवेक आसरी
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माँ -एक याद

माँ नहीं है बस मां की पेंटिंग है, पर उसकी चश्मे से झाँकती आँखें देख रही हैं बेटे के दुख बेटा अपने ही घर में अजनबी हो गया है। वह अल सुबह उठता है पत्नी के खर्राटों के बीच अपने दुखों की कविताएं लिखता है रसोई में जाकर चाय बनाता है तो मुन्डू आवाज सुनता है
 
Admin
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मां (अविनाश वाचस्‍पति)

मां सदा हां कभी न ना देती है जां मां सदा हां मां सुख का गांव ममता की छांव
 
अविनाश वाचस्पति
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