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दिशा बदलें और बदलें शिक्षा का प्रारूप !

               वैसे तो ये रोज की बात है की दो चार हत्या , आत्महत्या के प्रकरण अखबार में न रहे हों. हम पढ़ कर उसको फ़ेंक देते हैं, यह सोचते भी नहीं है की क्या इससे जुड़े लोगों को इसके
 
रेखा श्रीवास्तव
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मनुष्य, जैव रसायन और व्यवहारवाद

इन दिनों ब्लॉग जगत में व्यवहार वाद और जैव रसायन के आधार पर मनुष्य को स्वभाव को परखने का दौर चला हुआ है। मैंने सोंचा इस पर मैं भी कुछ कह लूँ । १९५० के दशक में व्यवहारवाद की आलोचना आरम्भ हुई. जैसा की हम जानते हैं व्यवहारवाद में मनुष्य को वातावरण के
 
लवली कुमारी
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मानावोदय का विज्ञानं - मनोविज्ञान

मानावोदय का विज्ञानं - मनोविज्ञान पृथ्वी पर जीवन के उदय के साथ ही क्रियान्वित हो गया था, यद्यपि इसका भान मानवों को बहुत बाद में हुआ. मनुष्य, चाहे एकाकी चिंतन मग्न हो, चाहे भीड़ के कोलाहल में अपनी प्रतिष्ठा स्थापित कर रहा हो, वह सभी समय मनोवैज्ञानिक खेलों
 
देवसूफी राम कु० बंसल
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मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव - ५ (अंतिम भाग)

पिछली पोस्ट से आगे..आज हम जुंग के आदिमकालीन सादृश्य/प्रतिरूप/अंशरूप (archetype)के विषय में थोड़ी चर्चा करेंगे. जुंग ने इसे कुछ ऐसे परिभाषित किया है - अंशरूप(archetype) एक ऐसी अवधारणा अथवा परिकल्पना है जिनका प्रादुर्भाव मनुष्य की चेतना में सभ्यता के विकास
 
लवली कुमारी / Lovely kumari
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मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव - 4

पिछली पोस्ट से आगे... पिछली शताब्दी के आरम्भ में फ्रायड और josef breuer ने बताया की विशेष परिस्थितिओं में किसी प्रकार का असामान्य व्यवहार अकारण नही होता बल्कि अर्थपूर्ण होता है. यही वह तरीका है जिससे प्रतीकात्मक रूप से हमारा अवचेतन खुद को अभिव्यक्त करता
 
लवली कुमारी / Lovely kumari
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मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव - 2

पिछली पोस्ट से आगे ... कई बार किसी प्रकार की आवाज गंध या दृश्य भी अवचेतन में प्रतीकों की तरह व्यवहार में आते हैं...जैसे आप कहीं जा रहे हो, किसी खाद्य पदार्थ की गंध आपको वैसी लगी जो बचपन में आपकी माता बनाती थी, तब ..श्रृंखलाबद्ध रूप से आपके अवचेतन में
 
लवली कुमारी / Lovely kumari
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मोहे अगला जनम ना दीजो-2

अब उसमें और जगजीत सिंह में कोई फ़र्क नहीं। साथ-साथ बैठे कोरस गा रहे हों जैसे। खुले में जितना छुपना पड़ता है, बंद में ख़ुदको उतना ही खोल देना चाहता है सरल। ‘‘मैं भी कुछ हंू, देखो कितनी कलाएं हैं मुझमें, सुनो...!’’ कैसी है ख़ुदको अभिव्यक्त करने की यह जान
 
sanjaygrover
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मोहे अगला जनम ना दीजो।

क्या करे इन हाथों का ? काट डाले इन्हें ? फेंक आए कहीं जाकर ? या हरदम ढंक कर रखे कहीं ? छुपा दे ! या किसी खुरदुरी चीज़ पर तब तक रगड़ता रहे जब तक दूसरे लड़कों की तरह मर्दाने, खुरदुरे, सख्त या गंठीले ना हो जाएं। तनहाई के छोटे से छोटे वक्फ़े में भी ये हीन भा
 
sanjaygrover
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बच्चों का बदलता मनोविज्ञान

आज यदि अपने आसपास नज़र डाली जाये, आसपास ही क्यों यदि अपने घरों में भी झांका जाये तो साफ़ पता चल जाता है कि बच्चे अब बहुत बदल रहे हैं । हां ये ठीक है कि जब समाज बदल रहा है, समय बदल रहा है तो ऐसे में स्वाभाविक ही है कि बच्चे और उनसे जुडा उनका मनोविज्ञा
 
अजय कुमार झा